RANGVARTA qrtly theatre & art magazine

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Monday, September 17, 2012

जिंदगी से जुड़े बगैर अच्छा नाटक नहीं लिखा जा सकता


महेश दत्ताणी भारतीय नाटककारों में अग्रणी स्थान रखते हैं। 'फाइनल सॉल्यूशंस', 'डांस लाइक अ मैन', 'तारा' और 'थर्टी डेज इन सेप्टेंबर' जैसे नाटकों ने न सिर्फ उन्हें दुनिया भर में ख्याति दिलाई, बल्कि भारतीय रंग परिदृश्य पर गहरा असर भी डाला है। अभी कुछ दिनों पहले वह भोपाल नाट्य विद्यालय, मध्यप्रदेश के दीक्षांत समारोह में भाग लेने के लिए भोपाल गए थे। उनसे राजेश चन्द्र की बातचीत:

पिछले 20-25 वर्षों में आपकी नजर में भारतीय रंगमंच ने क्या खोया और क्या पाया है?

भारतीय रंगमंच एक बहुत बड़ा क्षेत्र है। हर प्रदेश में कई तरह के काम हो रहे हैं। मैं अपने नजरिए की बात करूंगा। इधर एक कोशिश रिवाइवल की मुझे जरूर दिखाई पड़ती है। जो फॉर्म लुप्त हो रहे हैं, उन्हें बचाने की कोशिश हो रही है, पर इतना करना ही काफी नहीं है। हम अपनी लोक नाट्य परंपराओं को आगे नहीं बढ़ा पा रहे। बैले जो पचास साल पहले था, हम उसमें किसी तरह का बदलाव नहीं ला सके। यह उनकी सेहत के लिए अच्छा नहीं है। परंपरा रिवाइव हो रही है, उसमें निरंतरता है, यह बात मुझे बहुत अच्छी लगती है।

पिछले 50 वर्षों के रंगमंच को भारतीयता की खोज का रंगमंच कहा जा रहा है। इस विषय में आप क्या सोचते हैं?

यह सब मुझे बहुत बनावटी नजर आता है। असल में भारतीयता की खोज एक राजनीतिक मुद्दा है। यह सांस्कृतिक मुद्दा नहीं है। भारत, अफगानिस्तान या पाकिस्तान की सांस्कृतिक पहचान क्या अलग-अलग है? मुझे यह विचारधारा काफी पिछड़ी हुई लगती है। आज दुनिया भर में देशों की सीमाएं खत्म हो रही हैं। असल में भारतीयता का नारा देश को हिंदुत्व की लाइन पर आगे बढ़ाने के मकसद से ही लगाया जा रहा है। और लोग हैं कि बिना उसकी असलियत को समझे ही उसकी रौ में बहे चले जा रहे हैं।

नाटक लिखते वक्त क्या आप किसी विशेष दर्शक वर्ग को ध्यान में रखते हैं? या सब स्वाभाविक ढंग से होता चला जाता है।

यह बहुत ही मुश्किल सवाल पूछा आपने। आप अगर यह सोचते हैं कि आप अपने दर्शक को सचमुच जानते-समझते हैं, तो यह आपकी एक बहुत बड़ी गलतफहमी है। यह कहना भी कि मैं तो सिर्फ अपने लिए लिखता हूं, बिलकुल गलत होगा। मेरी व्यक्तिगत इच्छा तो यह है कि मैं अपनी अभिव्यक्ति की आजादी का ज्यादा से ज्यादा जनता के मुद्दों को उठाने में उपयोग करूं। मुझे भी अच्छा लगता है जब मेरे नाटकों को देखने बड़ी संख्या में दर्शक पहुंचते हैं और उनकी सराहना भी करते हैं।

नाटक लिखना आपके लिए कविता, कहानी या उपन्यास जैसी दूसरी विधाओं में लिखने से किस तरह अलग है?

यह बहुत अलग है। सच बात यह है कि नाटक की अंतिम यात्रा कागज पर नहीं मंच पर है। यह याद रखना पड़ता है कि आपके बाद भी कई लोग आएंगे जो उसमें काफी कुछ जोड़ सकते हैं। इसलिए आप उसे किसी बंदरिया के बच्चे की तरह चिपटाकर नहीं रख सकते। नाटककार नाटक के लिए मां की तरह है, जिसकी सोच यही होती है कि उसका नाटक फले-फूले, विकसित हो, उसका निरंतर विकास होता रहे। नाटक लिखते समय इन चीजों का ध्यान रखा जाना जरूरी होता है।

पारंपरिक नाट्य रूपों के तेजी से बढ़ते इस्तेमाल पर क्या कहना चाहेंगे?

यह सब ग्रांट मिलने की वजह से हो रहा है। लोग अनुदान में मिलने वाले पैसों के कारण किसी परंपरागत नाट्य शैली को पकड़कर काम करना चाहते हैं। इसके मूल में सिर्फ व्यावसायिकता है। यह बात अलग है कि वे ऐसा भ्रम जरूर फैलाए रखते हैं मानो सांस्कृतिक परंपरा को बचाने का महान काम कर रहे हैं।

आज भी अच्छे और गंभीर नाटकों के लिए हमें दुनिया की दूसरी भाषाओं की तरफ जाना पड़ता है। नाटक की ओर हमारी हिंदी के लेखकों का झुकाव क्यों नहीं है?

मुझे यह कहते हुए शर्म आती है कि मैं अंग्रेजी में नाटक लिखता हूं। पर यह मेरी मजबूरी है। दूसरी भाषाओं में लिखने वालों को उतना महत्व नहीं मिलता। सामाजिक क्षेत्र में जो बाधाएं हैं, उन्हें मिलकर ही समाप्त किया जा सकता है। यह समझना होगा कि हमें जड़ों के साथ शाखों और पत्तों की भी उतनी ही जरूरत है। लेखक के लिए जरूरी है कि वह खुद को अपने समाज का साक्षी समझे, उसका भागीदार समझे, उसके संस्कारों से जुड़े। जब तक हम जनता की जिंदगी से, उस जिंदगी की सच्चाइयों से खुद को नहीं जोड़ेंगे, अच्छा नाटक कैसे लिख पाएंगे? गुफाओं में बैठकर कविता तो लिखी जा सकती है, नाटक नहीं।

अभी किस विषय पर काम कर रहे हैं?

इन दिनों दो नाटक लिखे हैं - एक लिंलेट दुबे को दिया है जो नवंबर में शुरू होगा। एक और नाटक है जो मैं खुद निर्देशित करूंगा। एक निर्देशक के तौर पर मुझे उसमें बहुत दिलचस्पी है। मुंबई में जो हालत है, लोग यह दिखाने की कोशिश करते हैं कि वे सफल हैं, पर असलियत कुछ और ही होती है। 'द बिग फैट सिटी' नाटक नवंबर में शुरू करूंगा, जिसे फरवरी तक मुंबई में ओपन करने की योजना है। मैं एक फ्रीलांसर हूं। मुझे किसी के साथ बंधने में घुटन होती है। बंधकर आप संगठन की सेवा कर सकते हैं, नाटक की नहीं।

(नवभारत टाइम्स | Sep 8, 2012 से साभार)

Saturday, February 18, 2012

Can we talk about black theatre?


The debates surrounding ethnicity and theatre are alive and kicking, as shown by a range of current London plays.

It's an interesting time for black theatre in London at the moment. Stop. Rewind. Is that actually a useful thing to say? This is the question posed by the playwright Bola Agbaje on the Facebook group for her Olivier Award-winning play Gone Too Far!, which returns to the Royal Court in July as part of its Upstairs Downstairs season. The discussion topic "If a black person produces something such as a play, a film or music should it be associated with the word black?" has received almost 4,000 words in reply, passionately arguing both for and against, while examining the wider issues that surround the question.

Across town at the Arcola, Femi Oguns's play Torn has just opened. Like Gone Too Far!, Torn also deals with the split in the black community between African and West Indian cultures. The blurb for the show reads: "'You got the Whites - they're a collective. Then there's the Asians - they're unified. And then there's us. Divided. It's deep.' Two London lovers. One African. One West-Indian. What's the problem?" Leaving aside the questionable suggestions that whites are a collective (unless you count, uh, class, nationalism, Protestantism/Catholicism and even sexuality) and that the Asian community is unified (sure, Muslims, Hindus and Sikhs all get on like a house on fire - not), it is significant that here again is a play by a (black) playwright dealing with issues that directly affect the black community. And one which presents the situation as unique to black communities. Rather than using the situation to explore wider questions of segregation common to all human societies, Torn's publicity presents the divisions as specific and unique.

Perhaps even more interestingly, this week Look Back in Anger opens at Jermyn Street theatre starring Jimmy Akingbola. It remains to be seen whether this is "colour-blind casting" in a traditional, literalist, 1950s setting, or whether any adaptation or modernisation has taken place. Writing on the discussion of Gone Too Far!, one actor writes "...I don't want to be DE-ETHNITISED in my work. Meaning that I am colourblind cast all the time. In this sense I want my background/skin colour/ heritage to be part and parcel of what I bring to acting/writing because that is the frame of reference in which I am working. I would NEVER want to be asked to 'imagine to be white'. Which incidentally I HAVE been asked to do... BUT I don't want to be known as a 'BLACK ACTOR' rather than just an actor NOR do I want to be asked to deny my life's experiences when it comes to creating my art."

Meanwhile, over the river, the second leg of the LIFT festival's two-part season, which started in Stratford, continues on the South Bank. Here again, questions of identity are raised, both explicitly - with discussions like "The Responsibilities of Representation" chaired by Ruth Holdsworth with Paolo Favero - and implicitly: looking down the list of events you see label after label: "Deaf artist and Graeae Artistic Director Jenny Sealey"; "a staged meeting between the audience and leading Maori activist, Tame Iti"; "inspirational music from Australia's black protest movement"; "renowned English actor Pete Postlethwaite... Patrick Dodson and Bill Johnson, an old English school friend whose indigenous son Louis died tragically" ... The list goes on.

The question of identity concerns us all. Writing on the Gone Too Far! discussion, the playwright Duncan MacMillan notes: "It disturbed me greatly that many critics of my last play couldn't get over the fact my central character was black, as if our default starting position for characters is white ... I wonder whether it surprised so many people because I wasn't black, as if I couldn't possibly relate to or have empathy for someone who was ... There will be many people who will feel that, as a white man, I have no right to write a black character. You could also say I shouldn't be able to write women, old people, firemen, people who have different names, ages, opinions or experiences etc to my own. This particular line of argument ends up at a dead end where we are only able to write one-person shows about ourselves, performed by ourselves ... but then why even bother, if our capacity for empathy doesn't stretch to engaging with and being moved by the experiences of others."

It is a beautifully eloquent point. While identity and taxonomy can be important, it is our reaction to the labels that causes the problems. There should be no problem identifying a writer as black, but identifying a play as "black" (as in "black theatre company" and the like) seems to suggest exclusion, in the same way as "disabled theatre company" almost appears to start with special pleading, each modification seeming to enforce the idea that theatre companies are, unless otherwise stated, white and able-bodied. In seeking to fight against dismissive attitudes, is there a danger that the labels actually enact a far more definite sense of segregation? How do we retain identity without implying separatism?

Photo : Zawe Ashton (Armani) and Marcus Onilude (Blazer) in Gone Too Far!, 2007. Photograph: Tristram Kenton

Courtesy : The Guardian Daily, London

Saturday, January 28, 2012

जैकुब स्जेला की अमूर्त कहानी


भारत रंग महोत्सव में शनिवार को एक लाजवाब पोलिश प्रस्तुति ‘इन द नेम ऑफ स्जेला’ देखने को मिली। जैकुब स्जेला उन्नीसवीं शताब्दी का किसान विद्रोही था, जिसने पड़ोसी देश आस्ट्रिया की मदद से पोलैंड के ताल्लुकेदारों के खिला रक्तरंजित विद्रोह किया था।

प्रस्तुति की निर्देशिका मोनिका स्त्रजेप्का के मुताबिक आज का पोलिश मध्यवर्ग उसी जैकुब स्जेला का वंशज है। लेकिन जैसा कि शीर्षक से भी जाहिर है, प्रस्तुति का उसके किरदार से कोई लेना-देना नहीं हैं। यह उसके नाम के बहाने इंप्रेशनिज्म का एक प्रयोग है। प्रस्तुति में एक अमूर्त सिलसिले में बहुत-सी स्थितियां लगातार घट रही हैं। यह एक बर्फानी जगह का दृश्य है। पूरू गांव पर ‘बर्फ’ फैली हुई है। बिजली या टेलीफान के खंबे लगे हुए हैं। पीछे की ओर टूटे फर्नीचर वगैरह का कबाड़ पड़ा है। दाहिने सिरे पर एक कमरा है जो नीचे की ओर धंसा हुआ है। पात्रा उसमें जाते ही किसी गहरे की ओर फिसलने लगते हैं। मंच के दाहिने हिस्से के फैलाव में पड़ा गाढ़े लाल रंग का परदा है, जो बर्फ की सफेदी में और जयादा सुर्ख लगता है। यह घर से ज्यादा घर के पिछवाड़े जैसी जगह है। बर्फ पर एक सोफा रखा है, और एक मेज।

कोई कहानी नहीं है, लेकिन कहानी के सारे लक्षण हैः रोना-बिसुरना, प्यार-झगड़ा, गुस्सा, कलह, भावुकता, आवेग, वगैरह। प्रस्तुति बहुत सारी यथार्थ और एब्सर्ड स्थितियों को समेटे हुए हैं। इसमें आकस्मिकता भी है और ह्यूमर भी। शूरू के दृश्य में एक औरत आँधी बर्फ में नामालूम-सी पड़ी है। उसी पीठ में बर्फ हटाने वाला पाना धंसा हुआ है। फिर बाद में वह उसी घुंपे पाने के साथ सामान्य रूप से पात्रों में शामिल हो जाती है। इन पात्रों में कुछ घर के लोग हैं, कुछ बाहर के। एक पात्रा धंसे कमरे से निकलात है। किसी हाथापाई में मुंह से खून निकला हुआ है। एक दृश्य में जैकुब पाना लेकर दूसरे पात्रा के सीने में भोंक देता है। उसके सीने पर बेतरह ‘खून’ उभर आया है। वह निष्चेट गिर पड़ा है। लकिन कुछ कुछ दृश्यों के बाद वह कमीज उतार कर अपना खून पोंछ लेता है। और बच रहे निशान के बावजूद स्वस्थ रूप से मंच पर वक्रिय दिखने लगता है। पीछे की ओर स्थितियों के शीर्षक लिखे हुए दिख रहे हैं। मसलन- ‘क्रिसमस ईवनिंग’ या ‘आत्महत्या की रात या यह स्पष्टीकरण कि ‘यह दृश्य कुछ लंबा हो रहा है, लेकिन कुलीनों के पास कुछ ही तर्क है, इसलिए वे उन्हें ही दोहरा रहे हैं।’ जैकुब खुद एक चाकू बेचने वाला है। वह बाकायदे इसका प्रदर्शन करता है। मीट का एक विशाल टुकड़ा उसने मेज पर रख लिया है। और दो चाकुओं से वह इसे काट-काट कर बर्फ पर फेंक रहा है। एक मौके पर एक पात्रा बेहद तेजी से कुछ बोल रहा है। वहीं मौजूद लड़की गुस्से में दृश्य के पीछे की ओर जाकर एक मोटा डंडा उठा लाई है, और गुस्से में पूरे प्रेक्षागृह में घूम-घूमकर किसी को ढूंढ रही है। वह इतने गुस्से में है कि पास बैठे दर्शक थोड़ा सतर्क हो उठते हैं। लड़क के पीछे-पीछे पुरुष पात्रा भी चला आया है। वह दर्शकों से उनका पैसा मांग रहा है। कुछ दर्शक उसे कुछ नोट देते हैं। फिर वह वहां बैठे राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के छायाकर त्यागराजन से उनका कैमरा मांगता है।

वे कैमरा नहीं देते तो कैमरे का स्टैंड लेकर वह मंच पर चला जाता है। इसके थोड़ी देर बाद गुस्से वाली लड़की आंसुओं से लबालब भरी आंखों के साथ कोई कहानी बता रही है। प्रस्तुति में संवाद लगातार बोले जा रहे हैं, लेकिन अक्सर वे इतने अटपटे और सरपट है कि उनके अर्थ पकड़ पाना मुश्किल है, हालांकि उनमें साकेतिकता का एक ढांचा अवश्य है। मसलन ‘स्मार्ट किसान भी आखिरकार किसान ही होता है’, कि ‘वे मुझे जंगल में ले गए और मेरे शरीर को जला दिया, पर मुझसे पहले वे खिड़कियां और दरवाजे ले गए’।

पूरी प्रस्तुति किसी जटिल पेंटिंग की तरह है, जिसमें बहुत कुछ सर्रियल एक क्रम में घटित हो रहा है। थिएटर जैसी सामूहिक कला में यह ढांचा निश्चित ही एक दुष्कर चीज है। इस लिहाज से यह प्रस्तुति अपने प्रभावों में विलक्षण है। चरित्रांकन से लेकर अपने स्थापत्य तक में यह इतनी शिद्दत लिए है कि तमाम ऊबड़-खाबड़पन के बावजूद दर्शक बैठा रहता है।

- संगम पांडेय

जनसत्ता, 25 जनवरी 2012

पूंजी और परंपरा की छवियाँ


एचएस शिप्रकाश का कन्नड़ नाटक ‘मस्तकाभिषेक रिहसर्लु’ परंपरा और पूंजी की दो स्थितियों को दिखाता है। एक नाट्य मंडली बाहुबली गोम्मटेश्वर के जीवन पर नाटक तैयार कर रही है, जिसपर एक उद्योगपति का पैसा लगा हुआ है। लेकिन उद्योगपति भाइयों की मुकदमेबाजी में एक हार जाता है और दूसरा नाटक के प्रसारण अधिकार एक अमेरिकी टीवी चैनल को बेच देता है। जिस बीच नाटक का रिहर्सल चल रहा है, उसी दौरान गोम्मटेश्वर की मूर्ति का महामस्तकाभिषेक भी हो रहा है। निर्देशक सुरेश अनगल्ली की इस प्रस्तुति में हर बारह साल में आयोजित होने वाले जैन धर्म के इस उत्सव के वास्तविक वीडियो फुटेज भरपूर मात्रा में इस्तेमाल किए गए हैं। इनमें परंपरा में शामिल बीहड़पन के दृश्य अपने में ही एक कथानक है। पूर्णतः नग्न साधु.. उनक चक्कर लगाती स्त्रिायां। टीवी चैनल के पत्राकार पूरे जोशखरोश से आयोजन को कवर कर रहे हैं। मंच के बैंकड्रॉप में लगे परदे पर खुद ही अपना केश लुंचन करते साधु दिखाई देते हैं। सिर और दाढ़ी-मूंछो का एक-एक केश खींच-खींचकर उखाड़ने की दर्दनाक प्रक्रिया को अपनी आस्था से फतह करते हुए। लेकिन साधु के लिए जो आस्था है, टीवी की दर्शकीयता के लिए वह एक उत्तेजक ‘विजुअल’ है। टीवी कैमरे अपने तरीके से इनका दोहन कर लेने पर आमादा है। एक कैमरेवाला आयोजन में आए नवविवाहित दंपती से पूछता है कि वे हनीमून पर जाने के बजाय यहां क्यों आए हैं। पर नवविवाहिता को तो हनीमून का अर्थ ही नहीं पता। वह तो अपने बड़ों के कहने पर बाहुबली का आशीवार्द लेने आई हैं।

उधर रिहर्सल में बाहुबली की कहानी चल रही है। बाहुबली तीन लोक विजित कर चुके बड़े भाई भरत के आगे झुकने को तैयार नही है। ऐसे में युद्ध होता है, दृष्टि युद्ध, जल युद्ध। हर बार बाहुबली की जीत हो रही है। अंतिम मल्ल युद्ध में उसके नामानुरूप बाहुबल के आगे भरत की मृत्यु संभावित है। पर ऐन वक्त पर उसे राज्य के लालच में भाई की हत्या में निहित अविवेक का बोध होता है। वह लालची भरत को धराशयी कर धरा का अपमान नहीं कर सकता। पर उसके पीछे हटने पर भी भरत का प्रतीक चक्र रुक गया है। शाही चक्र धर्म चक्र से हार गया है। लेकिन वही बाहुबली गोम्मटेश्वर के मिथ में हिनित निग्रह या वैराग्य पूंजी के तंत्रा से हार रहा है। चैनल का प्रोड्यूसर रिहर्सल टीम को अपनी तरह से नचा रहा है। बाहुबली बने अभिनेता ने शायद किरदार को आत्मसात कर लिया है। चरित्रा की अनासक्ति उसमें प्रोड्यूसर के प्रति चिढ़ पैदा कर रही है। वह कई बार उससे भिड़ चुका है। वह कास्ट्यूम खोल रहा है। क्या वह सारे वस्त्रा खोल देगा?‘नहीं, तुम नंगे सत्य के लायक नही हो’ वह प्रोड्यूसर से कहता है।

शुक्रवार को एलटीजी प्रेक्षागृह में हुई निर्देशक सुरेश अनगल्ली की प्रस्तुति जितना अपनी गति में उतना ही दृश्यात्मक अवयवों में दर्शकों को बांधे रखती है। वीडियो दृश्यों के अलावा उसमें दर तक चलने वाला नर्तकी नीलांजनी का नृत्य है, रिहर्सल में पात्रों की टकराहटें हैं। चाय लेकर आने वाला मुंडू कई बार पात्रों से टकराता है और उसकी सारी गिलासें गिर जाती हैं। इनके अलावा बैटरी के आधार पर रखा भरत का चक्र भी अपने में चाक्षुप असर बनाता है। प्रस्तुति स्थितियों से लबालब भरी हुई है। दर्शकों के लिए उसमें कोई मोहलत नहीं है। सुरेश अनगल्ली मानते हैं। कि उनकी यह प्रस्तुति पाठ का हूबहू मंचीय अनुवाद नहीं है। बल्कि इसका खिलंदड़पन पाठ और प्रस्तुति में एक संवाद बनाता है शायद इसी वजह से वे इस प्रस्तुति मंे पाठ के साथ-साथ उसी केऑस का भी पुट देते हैं। जो हमारे वर्तमान की एक सच्चाई है।

- संगम पांडेय

जनसत्ता, 23 जनवरी 2012

अभिमंच में एंटीगनी


शुक्रवार को अभिमंच में प्राचीन ग्रीक नाटककार सोफोक्लीज के नाटक ‘एंटीगनी’ की प्रस्तुति की गई। इडीपस की बेटी एंटीगनी के जन्म में भी एक त्रासदी निहित थी और मृत्यु में भी। लेकिन उसके किरदार में निहित प्रतिरोध ने उसे विश्व रंगमंच का एक महत्वपूर्ण पात्रा बनाया। उसके दोनों भाई सत्ता के लिए हुए युद्ध में मारे गए। लेकिन मौजूदा राजा क्रेयान ने दोनों में से एक भाई पॉलिमिस को दुश्मन घोषित कर उसे दुनाने पर रोक लगा दी है। एंटीगनी को मंजूर नहीं कि उसके भाई को गिद्ध नोच-नोच कर खाएं। राजा क्रेयान के हुक्म के खिलाफ अपने भाई के शव का दफनाने वालली एंटीगनी के चेहरे पर यहां-वहां बेतरतीबी से रंग पुता हुआ है। तुर्की के स्टेट थिएटर की इस प्र्रस्तुति में क्रेयानए जो एंटीगनी का मामा भी है और होने वाला ससुर भी-एक तानाशाह की तरह दिखाई देता है। उसके बाल आधुनिक ढंक से कढ़े हुए है। उसे अपने फैसलों पर कोई संदेह नहीं है। निर्देशक केनान आइजिक इस तरह व्यक्ति और सत्ता के द्वंद्व को एक ऊंचाई पर ले जाते हैं।

एंटीगनी की गुस्ताखी के लिए क्रेयान ने उसे धरती के भीतर एक कंदरा में बंद करवा दिया है। वह अंधे जयोतिषी टेयरिसियस की भी एक नहीं सुनता और एंटीगनी को छोड़ देने ओर उसके भाई को दफनाने की उसकी सलाह के लिए उस राज्य का विश्वासघाती मान लेता है। उसके इस फैसले और अड़ियलपन से आहत उसका बेटा फिर कभी न लौट कर आने के लिए उसे छोड़ कर चला जाता है और एंटीगनी के फांसी लगा लेने के बाद अंततः खुद को ही खंजर भौंक कर मार लेता है। बेटे की मौत से आहत मां भी यही रास्ता चुनती है। और आखिर में रह गया है अपने प्रायश्चित को भोगने के लिए अकेला क्रेयान।

नाटक का व्यक्तिगत त्रासदी का क्लासिकल पाठ यहाँ सत्ता की निरंकुशता के पाठ में बदला हुआ है। इसीलिए क्रेयान मंच पर सबसे ज्यादा दिखता है। यह एक शब्दबहुल नाटक है। लगातार संवादों और एक स्थिर दृश्य संरचना में आगे बढ़ता हुआ। विंग्स को हटा कर मंच के पूरे स्पेस में यह दृश्य बनाया गया है। पीछे की ओर सक प्लेटफॉर्म है, जिस पर नाटक का कोरस उपस्थित है। यह एक भव्य दृश्य है, जिसमें वेषभूषा सबसे ज्यादा दिखती है। इस वेशभूषा में प्राचीन ग्रीम नाटकों की शास्त्राीयता के साथ समकालीनता का भी पुट है। क्रेयान के बैठने की बीच चेयर भी आज के जमाने की है। ग्रीक ट्रैजेडी का यह समकालीन पाठ है। क्रेयान एक मौके पर बिल्कुल ‘द ग्रेट डिक्टेटर’ के तानाशाह की तरह भाषण देता है। इस बीच आतिशबाजी की डिजिटल छवियां भी मंच को घेरे हुए हैं। इस तरह बिल्कुल शुरूआत के दृश्य में टेयरसियस एक बच्चें के साथ लंबे समय तक बिल्कुल निश्चल मूर्तिवत खड़ा है। चेहरे पर रंग पोते उसकी निश्चलता एक लाजवाब छवि है। बाद के दृश्य में वह एक गिद्ध लिए है। पूरी प्रस्तुति इसी तरह की कुछ युक्तियों से एकरसता को तोड़ती है। फिर भी उसका बाहरी पाठ भीतरी पाठ से बीच-बीच में कुछ छिटकता मालूम देता है।

- संगम पांडेय

22 जनवरी 2012, जनसत्ता

सटीक अभिव्यक्तिवाद का रंग


भारतीय थिएटर में माया कृष्ण राव एक अलग ही शैली की कलाकार हैं। वे अकेली मंच पर होती हैं अपनी बहुत-सी तत्पर भंगिमाओं और मुद्राओं के साथ उनके संवाद ध्वनियों की शक्ल में होते हैं। कई बार फुसफुसाते हुए से। करीब एक दशक पहले जब उनकी पहली प्रस्तुति देखी थी, तो यह एक किंचित रूखा संयोजन था। लेकिन तब से अब तक उन्होंने अपनी शैली में क्रमशः काफी सुधार किए हैं

मंगलवार को भारत रंग महोत्सव में हुई प्रस्तुति ‘रावन्ना’ में उनका अभिव्यक्तिवाद ज्यादा व्यवस्थित दिखाई देता है। मंच पर प्रस्तोता के रूप में उनका आत्मविश्वास देखते ही बनता है। उनकी देहभाषा मे एक आक्रामक लय है। लेहकिन उसमें वे खालिस देहभाषा के भरोसे नहीं हैं, उन्होंने मंच पर ‘दृश्य’ के कुछ प्रावधान भी किए हैं। दाहिने छोर पर एक आलमारी जैसी चीज में कुछ छोटे-छोटे कपड़े लटके हैं। बीच-बीच में वे इन कपड़ों को अपने पहलने हुए कपड़ों में इस तरह खोंस लेती हैं। कि उसका अलंग रंग दृश्य के पूरे फ्रेम में एक छोटा सा प्रभाव लिए शामिल हो जाता है। एक दृश्य में वे अपने स्वेटर को ऊपर सिर तक ले जाती है। स्वेटर में से निकले सफेद बाल एक रहस्य की तरह दिखते हैं। पीछे की ओर एक दरवाजा है। प्रस्तुति के दौरान दो और दरवाजे लाकर खड़े कर दिए जाते हैं। बीच के दरवाजे से वे प्रस्तुति में दाखिल होती हैं, मंच की गहराई का शायद यह अंतिम छोर है। एक बार वहां से धुआं निकलता दिखाई देता है।

दृश्यों के इस संयोजन के अलावा स्वरों और ध्वनियों की भी एक अहम भूमिका है। वे स्वरों के अनुरूप ‘मूव’ लेती हैं। उनकी देहभाषा में कथकली की मौखिक-आंगिक व्यंजना से लकर पाश्चात्य ढंग से थिरकने का कौशल है। यह एक सटीक अभिव्यक्तिवाद है। इसमें रोशनियों के बहुतेरे प्रभाव हैं। माया अपने धवल केशों का दृश्यों में कई बार कंट्रास्ट के तौर पर अच्छा इस्तेमाल करती हैं। उनकी देहभाषा का आत्मविश्वास मानो सारे असमंजसों को धूल चटा चुका है। उसमें एक गहरी संलग्नता है। यह आत्मविश्वास किरदार में बहुत गहरी पैठ से बना मालूम देता है। माया की मुखमुद्राओं में दर्शकों के होने का कोई असर नहीं है। दर्शक ऊबें या सुखी हों-- यह कोई मसला नहीं है। वे बुदबुदाते हुए मंच के एक छोर की ओर जा रही हैं। यह बुदबुदाना रावण के किरदार की कभी-कभीसुनाई देने वाली कमेंट्री का एक हिस्सा है। सुनाई दे तो ठीक, न सुनाई दे तो भी क्या फर्क। यह सैकड़ों रामकथाओं में से किसी एक का प्रसंग है। सीता का रावण की मृत्यु का कारण बनना नियत है। क्योंकि रावण कुछ ऐसा भूल गया है, जिससे उसकी नियति जुड़ी है। माया पूछती है-- क्या यह स्मृतिविहीनता की कथा है। क्या रावण जैसे विद्वान और कलाप्रेमी की स्मृतिविहीनता एक रूपक है।

माया कृष्ण राव की रंग-शैली को लेकर नाक-भौं सिकोड़ने वाले दर्शक भी हैं। लेकिन माया इससे निस्संग रहते हुए निरंतर इसके भीतर कई प्रयोग करती रही हैं। मसलन, एक जगह कोई कपड़ा खोंसते हुए वे कुछ बोल रही हैं, और काफी तल्लीनता से अपना काम भी कर रही हैं। मानो यह काफी उपयोगी कोई काम हो। माया कृष्ण राव का अभिव्यक्ति के अपने तरीकों पर हमेशा भरोसा रहा है। इस प्रस्तुति में उनके इस भरोसे को दर्शकों का भी पूरा अनुमोदर हासिल हुआ।

- संगम पांडेय

जनसत्ता, 19 जनवरी, 2012

जुले वर्न का कल्पनालोक


थिएटर में कुछ भी नामुमकिन नहीं है। जुले वर्न के 19वीं शताब्दी में लिखे गए फ्रांसीसी उपन्यास ‘ट्वेंटी थउसेंड लीग अंडर द सी’ की प्रस्तुति इसे साबित करती है। रविवार को कमानी में हुई इस प्रस्तुति के पात्रा समुद्र के अंदर एक पनडुब्बी में हे, जिसे एक ऐसे शख्स ने दुनिया से छुपाकर बनाया है जो तत्कालीन सभ्यता से क्षुब्ध है। पनडुब्बी को समुद्री दैत्य समझा जा रहा है। अमेरिका ने इस दैत्य को मार गिराने के लिए एक दल को भेजा है। लेकिन कहानी के नैरेटर प्रोफेसर पियरे सहित दल के तीन लोग पनडुब्बी बनाने वाले कैप्टन नेमो की गिरफ्त में आ गए हैं।

मंच पर परदे को पूरा खोला नहीं गया है। इस तरह बीच की खुली जगह एक फ्रेमकी तरह इस्तेमाल की जा रही है। इस खाली जगह पर एक रूीना परदा है जिस पर समुद्र के अंदर एनिमेटेड संसार उभर रहा है। तरह-तरह की मछलियां और जीव। इस दौरान परदे के पीछे भीतर की ओर मौजूद पात्रा भी दिखते रहते हैं। पात्रागण कभी इस झीने परदे के आगे कभी उसके पीछे हाते हैं-- इस तरह पनडुब्बी के भीतर या बाहर की स्थितियों को दर्शाया गया है।

कुल मिलाकर यह डिजिटल तरीकों से तैयार किया गया एक जटिल और कल्पनाशील संयोजन है जिसमें एनिमेशन और कैमरे से शूट किए गए वास्तविक सचल चित्रों- दोनों का इस्तेमाल किया गया है। ध्वनि प्रभावों के जरिए इसे पुरअसर बनाने की कोशिश की ई है। पानी के बुलबुले कई बार इतरे करीब से और इतने विस्तार में है कि एक एक घेरने वाली दृश्यात्मकता बन जाती है।

इटली के टिएट्रो पॉटलैक थिएटर की इस अंग्रेजी प्रस्तुति में प्रभावशाली डिजिटल संयोजन के अलावा चरित्रांकन कुछ मजाकिया तरह का है। इसके पात्रा कॉमिक्स किरदारों की तरह दिखाई देते हैं। समुद्र के भीतर यहा-वहां गुजरते हुए वे अटलांटिक और प्रशांत महासागरों में पानी के घनत्व के फर्क को लेकर चर्चा करते हैं। उनकी चाल-ढाल में भी यह चीज है। यह ढंग एनिमेशन में दर्शाए गए जीवों के नक्श आदि में भी है। प्रस्तुति के निर्देशिक पुनो दि बूडो ने एक मुश्किल ढांचे में एक तरह की शैली का कुशल निबाह किया है। जुले वर्न का यह उपन्यास तब लिखा गया था, जब इस किस्म की पनडुब्बी एक काल्पनिक चीज थी। प्रस्तुति के दृश्यों में पानी के जहाज की छवि का इस्तेमाल भी किया गया है। इस तरह जुले वर्न के 140 साल पुराने कल्पनालोक को बूडो मंच पर संभव बनाते हैं।

कमानी में सोमवार को सई परांजपे लिखित और निर्देशित मराठी प्रस्तुति ‘जसवंदी’ का मंचन किया गया। यह एक यथाथर्ववादी प्रस्तुति है, जिसकी केंद्रीय पात्रा धनाढ्य घर की एक स्त्राी है। पति के पास अपनी व्यावसायिक व्यस्तताओं में उसके लिए समय नहीं है। एकाकीपन से जूझती नायिका का खुद को आंटी कहने वाले एक नौजवान स संबंध जुड़ता जाता है। घर के काम करने वाली रंगाबाई और ड्राइवर दो अन्य पात्रा हैं। रंगाबाई की पैतृक जायदाद के लिए वे एक हत्या करने पर चर्चा कर रहे हैं। इनके अलावा प्रस्तुति में दो बिल्ले भी है, जिनकी आपसी बातचीत और हरकतें निरंतर एक रोचकता बनाए रखती हैं।

प्रस्तुति की विशेषता है कि यथार्थ के दुर्द्धर्ष पक्ष भी उसमें दिखाई देते रहते हैं। हालांकि बिलौटों की उछलकूद कुछ मौकों पर प्रसतुतिको अनावश्यक लंबा बनाती है। घर के भीतर के दृश्य का यह एक सुंदर सेट डिजाइन था जिसमें आंगर के पेड़-पौधों के अलावा दो दरवाजों के जरिए भीतर के कमरों को दर्शाया गया है। बिलौटों का अभिनय करनेवाले पात्रों का कोई मेकअप नहीं किया गया है, सिर्फ उनहें अपनी हरकतों से ही खुद को बिलौटा साबित करना है। प्रस्तुति की यह युक्ति काफल चर्चित रही है।

- संगम पांडेय

जनसत्ता, 18 जनवरी 2012

उदास और रहस्मय सौंदर्य


भारत रंग महोत्सव में शनिवार को हुई प्रस्तुति ‘वाटर स्टेशन’ की विशेषता उसकी विलक्षण धीमी गति है। यह एक ऐसी गति है जो स्थिरता की दोस्त मालूम देती है मंच के बाएं छोर की ऊंचाई पर प्लेटफॉर्म से एक रास्ता शुरू होता है। एक मोड़ लेकर यह रास्ता स्टेज के मध्य तक पहुंचता है। यहां तक पहुंचता है। यहां एक नल लगा है जिससे लगातार पानी बह रहा है। यह जगह एक पड़ाव है। यात्रियों का रास्ते से आना और नल से पानी पीना- यही प्रस्तुति का कथ्य है।

इसमें एक उपकथा भी है दाएं किनारे पर कबाड़ का ढेर है, जहां एक किरदार बिल्कुल स्थिर खड़ा ये गतिविधियां देख रहा हैं प्रस्तुति में कोई संवाद नहीं है। दर्शक कुछ न होने को देख रहे हैं। कुछ न होना शायद उन्हें किंकर्तव्यविमूढ़ बना रहा हो, पर इसमें एक बड़ी राहत है। हर गतिविधि को पूरे विस्तार से महसूस करने का इत्मीनान। निर्देशकीय से शब्द उधार लें तो ‘यह खामोशी’ धीमापन और स्तब्धता- ये सब मिलकर एक उदास और रहस्यमय सौंदर्य की रचना
करते हैं, जो हमें अपने जीवन और अस्तित्व को देखने के लिए एक नई दृष्टि देता है।’

स्लोमोशन दर्शक को अचानक एक नए समय बोध में ले जाता है। समय के हर टुकड़े की बहुत सी कोशिकाएं हैं। नल की ओर हाथ धीरे-धीरे आगे बढ़ रहा है। धार मुंह में जाने से गिर रहे पानी की आवाज रुक गई हैं। आवाज का रुकना भी दृश्य की एक गतिविधि है।.... कई तरह के पात्रा रह-कर उपस्थित होते हैं। एक औरत आती है, एक बच्चागीड़ी लिए दंपत्ति,... पीठ पर टोकरी बांधे एक कामगार औरत।

जापानी नाटककार शोगो ओटो लिखित यह प्रस्तुति एक त्रायी का हिस्सा है। शेगो के बारे में उल्लेखनीय है कि वे 14वीं सदी के जापानी सौंदर्यर्शास्त्राी जियामी मोटोकियो की अकर्मकता की अवधारणा से प्रेरणा लेते रहे हैं। केरल के थिएटर ग्रुप थिएटर रूट्स एंड विंग्स के लिए इस प्रस्तुति का निर्देशन शंकर वेंकटेश्वरन ने किया है। उनके मुताबिक इस प्रस्तुति में धीमापन ‘पात्रों की आदि छवियों’ और ‘मानव अस्तित्व के सार’ को समझने में मददगार है। एक दृश्य में पति-पत्नी के अंतरंग क्षणों का एक टुकड़ा भी है, जो धीमेपन को थोड़ा बाधित करता है’

शनिवार को ही कमानी प्रेक्षागृह में बांग्ला प्रस्तुति ‘ब्योमकेश’ का मंचन किया गया। ब्योमकेश शारदेंदु बंद्योपाध्याय रचित बांग्ला साहित्य का प्रसिद्ध जासूसी किरदार है। इस प्रस्तुति में वह एक हत्या की गुत्थी को सुलझाता है। हत्यारे ने बहुत तरकीब से जायदाद के लिए हत्या की, लेकिन कुछ हल्की-फुल्की चूकें उसे ले डूबी। नाटक की विधा में यह जासूसी का एक सीधा-सादा नैरेटिव है। साहित्यिक उत्सुकता थिएटर के लिए कोई बहुत उपयोगी चीज नहीं मानी जाती।

ब्योमकेश के रहस्योदघाटनों में कोई बड़ा रोमांच नहीं है। बल्कि अपनी सादगी में यह प्रस्तुति एक नॉस्टैल्जिक रूमान पैदा करती है। बृत्य बसु निर्देशित इस प्रस्तुति मेें कुछ अपने किस्म के खांटी किरदार है, और हत्या उसमें सिर्फ लालच की वजह से नहीं बल्कि नफरत की वजह से भी की गई है।

- संगम पांडेय

जनसत्ता, 17 जनवरी 12012

नाट्य प्रस्तुतियों में कौंध और गूंज


गुरुवार को अभिमंच में त्रिपुरारी शर्मा निर्देशित प्रस्तुति ‘बीच शहर’ का मंचन किया गया। निर्देशिका के मुताबिक यह प्रस्तुति अधूरे वाक्यों, छवियों, कौंध, कविता, चीखों और चुप्पियों से बनी हैं कुछ अर्थों में यह एक नाटक नहीं हैं, इसमें स्मृति, अहसास, आवेग, अवधारणा और घटनाओं के अंशों को एक जगह इकट्ठा किया गया है और प्रस्तुति में वास्तविक और अवास्तविक, स्वप्न और अस्तित्व, सजीव और निर्जीव की कार्रवाइयां समय के एक ही स्पेस और परिदृश्य का हिस्सा है और किसी निश्चित फ्रेम के लिए बाधा खड़ी करती हैं। मंच पर बहुत से ब्लॉक्स हैं। दर्शकों के बीच से गुजरने वाला एक प्लेटफॉर्म हैं, जहां से रह-रह कर पात्रा प्रकट हाते हैं। बहुत सारे पात्रा हैं पर उनके आपसी संवादों के सूत्रा जोड़ना दर्शकों के लिए आसान नहीं है। मंच के दोनों छोरों पर दो परदे लगे हैं जिन पर उभरी वीडियो छवि में लिखा है, 1984, फिर कुछ कटे हुए बाल गिरते हैं। इसके कुछ देर बाद एक तारीख उभरती है, 6.6.2002, आशय की इसी सूत्रा के सहारे दर्शक को कड़ियां जोड़नी हैं। यह गुजरात दंगों के दौरान एक आम आदमी की कहानी है, जिसने मुसीबत में पड़े लोगों की हिफाजत की। मंच पर बहुत सारा सूक्ष्म और स्थूल एक साथ मौजूद हैं। कुछ पात्रा मंच पर बातचीत में लगे हैं,। उसका इस तरह वहां होना एक औचक उपस्थिति है। प्रस्तुति में मंच सज्जा में एक नियोजन और डिजाइन दिखता है लेकिन स्थितियों के किसी व्यावहारिक समीकरण में नहीं होने से मंच पर बहुत कुछ फालतू भरा हुआ दिखता है। निरंतर संवाद बोले जा रहे हैं, पर यह सारा कुछ संप्रेषित भी हो रहा हो ऐसा नहीं है।

शुक्रवार को ही प्रदर्शित एक अन्य प्रस्तुति ‘मेईध्वनि’ में तरह-तरह की देहगतियों का प्रदर्शन किया गया है। शरीर के ज्यामितीय लय। तीन गागर लिए स्त्रिायां गागर एक सहयोगी हैं। वे कभी उसके ऊपर होती हैं कभी उनके पैर गागर में। लेकिन उनकी गतियों में एक सभ्यता है जिससे एक लय बनती हैं। मेईध्वनि का अर्थ है शरीर की गूंज। इसके निर्देशक जयचंद्रन पालझी हैं। निर्देशकीय के मुताबिक ब्रह्मांड और मानव शरीर के वास्तुशिल्पीय और ज्यामितीय अमूर्त प्रत्ययों से सूत्रा लेकर यह प्रस्तुति प्रयास करती हैं अशांत परिस्थितियों में बंदियों द्वारा अनुभव किए गए बाध्यकारी एकाककीपन को समझने की। भारतीय चिंतन में उपस्थित ब्रह्मांडीय घटकों- शरीर और द्रव-की अवस्थाओं के इतिहास में खोज करते हुए यह नाटक उनकी मूर्ति सदृश आकृतियों, स्मृतियों और मनोभावों में निहित गुणों की एक यात्रा है। इसके मुताबिक प्रस्तुति में दिखाए गए धातु कलशों क आकृति एक संयमित मगर फिर भी अयोध्य स्त्रिायोचित अनंतता की ओर इशारा करती है। ऐसे गूढ़ भावों से भरी इस प्रस्तुति को बंगलूरू की अट्टाकलरी रेपर्टरी ने तैयार किया है।

- संगम पांडेय

(जनसत्ता, 16 जनवरी 2012 से साभार)

चीनी परंपरा की कहानियां


गुरुवार को कमानी प्रेक्षागृह में हुई पीकिंग अंपिरा की प्रस्तुति कई छोटी-छोटी प्रस्तुतियों का एक संग्रह थी। चीनी सोंदर्य- बोध मंे रंगों को एक खास तरह से बरतने की परंपरा है। तीखेपन से मुक्त और क्रमशः गाढ़े से हल्के होते हुए। यह प्रस्तुति भी प्रथमदृष्टया इसी वजह से ध्यान खीचती है। मंच पर एक ही कलाकार है, लेकिन उसकी वेशभूषा और मेकअप में शांत, राहत देने वाले रंगों का एक विशिष्ट आकर्षण है। प्रस्तुतिकर्ता की भाव-भंगिमाएं संगीत स्वरों के मुताबिक आकार ले रही हैं, और यही इसकी नाटकीयता है। कथ्य के नाम पर चीनी परंपरा की कुछ कहानियां हैं, लेकिन यह कथ्य इतना साकेतिक तरह से घटित होता है कि घटनाएं अपने में रुचि का विषय नहीं बन पातीं।

एक कहानी में नायिका बताती है कि वह सुबह उठी तो जाने क्यों बहुत भावुक महसूस कर रही थीं फिर कुछ काम न होने से वक कढ़ाई- बुनाई करने लगी। फिर वह शानदार मौसम का जिक्र करती है। मंच पर इस दरमियान कढ़ाई किए हुए कपड़े के कवर वाली दो कुर्सियां और एक मेज रखी हैं। यह एक प्रेमकथा है। इसके अलावा ‘परी द्वारा फूलों को बिखेरना’, ‘उत्सवी लालटेनों की सूची’, ‘बांस के उपवन में’ आदि शीर्षक प्रस्तुतियां भी हैं।

‘बांस के उपवन में’ शीर्षक प्रस्तुति में पात्रों की तादाद सबसे ज्यादा थी। चार पुरुष पात्रा इसमें पीले वस्त्रों में हैं और इतने ही स्त्राी पात्रा आसमानी परिधान में आसमानी कपड़ों में। इनके बीच काले परिधान में एक पात्रा जोरदार कलाबाजी करता हुआ मंच पर प्रकट होता है। चीन के सेंट्रल एकेडमी ऑफ ड्रामा की इस प्रस्तुति के निर्देशक ज्यांग यू ज्यांग हैं। चीनी ऑपेरा अपनी प्रस्तुति में भले ही जितना भी परिष्कृत हो, पर इसकी सामग्री चीनी परंपराओं से ही ली जाती रही है।

- संगम पांडेय

(जनसत्ता, 14 जनवरी 2012 से साभार)

Monday, January 16, 2012

सिद्धांत भी एक नाटक है


भांरगम 2012 में मंचित नाटकों पर ‘जनसत्ता’ में संगम पांडेय लिख रहे हैं. ‘रंगवार्ता’ के साथियो के लिए साभार प्रस्तुत है ‘ग्रोटाव्स्की एन एटेंप्ट टु रिट्रीट’ पर उनकी रंग टिप्पणी. //

भारत रंग महोत्सव में पोलैंड के थिएटर ग्रुप कोरेया की प्रस्तुति ‘ग्रोटाव्स्की एन एटेंप्ट टु रिट्रीट’ का प्रदर्शन सोमवार को कमानी प्रेक्षागृह में किया गया। जर्जी ग्रोटोव्सकी पिछली सदी के उत्तरार्ध में सक्रिय रहे पोलैंड के रंगकर्मी और रंग-सिद्धांतकार थे। उनकी पूअर थिएटर की अवधारणा रंगमंच को सिनेमा के प्रभावों से बरी रखने के अर्थ में थी। उनकी राय में थिएटर को वह नहीं होना चाहएि, जो यह नहीं हो सकता। उनका कहना था कि रंगमंच अगर सिनेमा से ज्यादा वैभवशाली नहीं हो सकता, तो इसे गरीब ही रहने देना चाहिए।

हमारे यहां मोहन राकेश भी अभिनेयता की तुलना में लाइट्स, मंच-सज्जा आदि के जरिए अतिरिक्त प्रभाव निर्मित किए जाने के खिलाफ थे, पर ग्रोटोव्स्की ने इस विचार को ज्यादा मुकम्मल शक्ल में पेश किया। उन्होंने अभिनेता और दर्शक के रिश्ते में अन्यमन्स्कता पैदा करने वाली हर चीज को खारिज किया। उनके लिए मंच पर किया जा रहा अभिनय ही बुनियादी चीज थी। लेकिन वे ‘मैथड एक्टिंग’ के नपेतुलेपन के पक्षधर भी नहीं थे। अभिनय उनके लिए स्तानिस्लाव्स्की और स्ट्रासबर्ग पद्धतियों का हुनर मात्रा न होकर अभिनेता की मानसिक और शारीरिक प्रतिक्रियाओं का एकीकरण था। इसके लिए वे अभिनेता में गंभीरता, एकाग्रता और प्रतिबद्धता को आवश्यक मानते थे। स्वयं में से उद्भूत स्वर और देह की स्वाभाविकता उनके लिए ज्यादा अहम थी। और इसके लिए कसी तकनीक की तुलना में आत्मचेतस होने की प्रक्रिया को वे ज्यादा महत्त्वपूर्ण मानते थे।

निर्देशक टॉमस्ज रोडोविक्ज निर्देशित इस प्रस्तुति में इस प्रक्रिया का जिक्र अभिनेता बार-बार करते हैं। दरअसल यह पूरी प्रसतुति ऐसी कई प्रक्रियाओं के जिक्र का ही एक विस्तार है। प्रस्तुति का मंच बर्गर बिंग्स के एक चौकोर हॉल की शक्ल में है। इसके एक कोने पर एक मेज रखी है, जिसके अंदर की गहराई में शीशों से रोशनी दिख रही है। शुरुआत में छह अभिनेता इसके इर्द-गिर्द खड़े हैं, जिनमें एक कुछ हकलाता है। निर्देशक के वक्तव्य के दौरान वह थोड़ा बेसब्र है। कहीं कुछ ऐसा नहीं है जो योजनाबद्ध लग रहा हो, पर योजनाहीनता की कोई चेष्टा भी नहीं है। निर्देशक के बाद अभिनेतागण अपने अनुभव और राय बता रहे हैं। इनमें कुछ सवाल भी हैं कि ‘अपने अकेलेपन के साथ इंसान क्या कर सकता है’ कि ‘एक गैर-अनुकुलित शरीर जानवर की तरह है’ कि ‘एक पापी ही संत हो सकता है’, ‘कुछ नही हो रहा- यह सिर्फ भावनाओं का खेल है’ कि ‘लेकिन कुछ कैसे रचें’, जबकि आप दूसरों से नियंत्रित हैं’ कि ‘जीने और रचने के क्रम में आपको खुद को स्वीकार करना होगा’। इसी क्रम में तरह-तरह की देहगतियों का मुजाहिरा भी अभिनेतागण करते हैं। यह एक सिद्धांत के आत्मसातीकरण की प्रक्रिया है, जिसमें प्रदर्शनप्रियता जैसी खराबियों से बचने का मशविरा निहित है।

मंगलवार को महोत्सव में एक प्रस्तुति ‘बस्तर बैंड’ की भी थी। यह बस्तर के आदिवासी संगीत का एक प्रदर्शन था। इसे रंगमंचीय प्रस्तुति तो नहीं कह सकते, लेकिन रंगमंच के कुछ अवयव मानो इसमें अनायास शामिल थे। चार पुरुष और दो स्त्रियां विभिन्न वाद्यो के सामने हैं। नक्कारा, दो घड़े के वाद्य, लंबी शहनाई जैसा वाद्य, जिसके अनगढ़ स्वर पूरे वातावरण से एकाकार हैं। स्त्रियों में से एक देवी गीत गा रही है। उसके स्वर में पारंपरिकता का खरापन है। सुनकर मालूम देता है कि प्रार्थना, उलाहना या दर्द आदि भाव पारंपरिकता के वश की ही चीज हैं। फिर बहुत से कलाकार मंच पर आ जाते हैं। एक के सिर पर मोरपंख जैसा कुछ लगा है। एक दूसरे के सिर पर शिरस्त्राणनुमा चमकीली टोपी है। एक अन्य कलाकार धनुषाकार ढोलक बजा रहा है। मंच के दोनों सिरों पर दो स्तंभ खड़े हैं। एक के किनारे पर सूखे कद्दू लटके हैं। पता चला आदिवासी जन इन्हीं के आसपास बैठकर सांगीतिक बैठकी करते हैं। प्रस्तुति के निर्देशक अनूप रंजन पांडेय हैं। उनके मुताबिक उन्होंने इस बैंड का गठन आदिवासी परंपरा को सुरक्षित रखने के लिए किया है।

- संगम पांडेय

जनसत्ता, 12 जनवरी 2012 से साभार

Saturday, January 14, 2012

थिएटर का पापा लादेन शो


भांरगम 2012 में मंचित नाटकों पर ‘जनसत्ता’ में संगम पांडेय लिख रहे हैं. ‘रंगवार्ता’ के साथियो के लिए साभार प्रस्तुत है ‘पापा लादेन’ और ‘नैन नचैया’ पर उनकी रंग टिप्पणी. //

पिछले सत्र में राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय से स्नातक हुए आंध्र प्रदेश के सुमन मेलिपेड्डी निर्देशित प्रस्तुति ‘पापा लादेन’ का आइडिया काफी दिलचस्प है। भारत रंग महोत्सव में शामिल विद्यालय की इस डिप्लोमा प्रस्तुति में पात्र किसी कार्टून फिल्म की तरह मौजूद है। शरीर की तुलना में ज्यादा बड़े कूल्हों वाली और हर समय खीखियाई रहने वाली चोंगा पहने पत्नी, बिगड़ा हुआ नौकर मालूम देता उसका पति, और तरह-तरह की व्याधियों से ग्रस्त पापा।

पापा एक बेंच पर पेट में पांव घुसाए लेटा रहता है। उसे ग्लूकोज की बोतल लगी है। तरह-तरह की नालियां उसके शरीर से बंधी है। जांघिए से निकलती एक नली पेशाब की थैली से जुड़ी है। पापा लादेन इस थैली को पकड़े हुए झुककर चलता है। परेशान हाल वह जिंदा बने रहने का ध्येय से कई स्तरों पर जूझ रहा है। इसके अलावा वहीं पास में एक बच्चागाड़ी खड़ी है, जिससे बीच-बीच में बच्चे के रोने की आवाज आती है।

भाषा के नाम पर अजीबोगरीब स्वर है। एक मौके पर अखबार की एक तस्वीर को देखकर बेकाबू हुआ पति ‘नंगी स्त्री अस्ति’ बोलता है। पत्नी उसे डपटकर खींच लाती है और फिर जिस बीच वे प्यार में खटाखट लिपट रहे हैं, पापा उस सुंदर स्त्री वाली तस्वीर में मुंह घुसाए हुए है। अखबार फाड़कर निकल आई उसकी जीभ दर्शकों को दिखती है। बीच-बीच में पापा लादेन ग्लूकोज की नली को माइक की तरह पकड़ कर भाषण भी देने लगता है। एक मौके पर तीनों रॉक स्टार बन जाते हैं। लेकिन एक अन्य मौके पर पति को गुस्सा आ जाता है और वह पापा को उठाकर पटक देता है, उसकी नलियां हटा देता है, पकड़ी हुई थैली कुचल देता है। वह इतना गैरजिम्मेदार भी है कि बच्चे का दूध खुद पी जाता है। रात में सोते वक्त थकी हारी सोई बीवी की टांग पर उसकी टांग चली गई है। नींद से हड़बड़ा कर जागी बीवी के धक्के से वह गिर पड़ा है। लेकिन एक दूसरे मौके पर वह चीरहरण करने पर उतारू है। उसका स्वर रामलीला के रावण जैसा हो गया है। वस्त्र की जगह वह टॉयलट पेपर खींचे जा रहा है। यह एक थिएटर का ‘पापाय शो’ है, जिसमें मध्यवर्गीय परिवार के सदस्य ‘एनिमेटेड’ हास्यचित्र के तौर पर दिखाई देते हैं। सुमन मेलिपेड्डी ने इसमें कुछ अच्छे फिलर भी डाले हैं।

पापा लादेन हालांकि मूलतः इजराइली प्रस्तुति ‘ओडिसस के ओटिकस’ से प्रेरित है, लेकिन उस प्रेरणा के दायरे में यह पर्याप्त देशज, मौलिक और सुघड़ रूपांतरण है। इसमें एक अपनी ही गति और पैनापन है। हिंदुस्तानी जिंदगी की कई रूढ़ियां, हड़बड़ी और बदहवासी इसमें शामिल है, और बेबाक व्यंग्य। कुछ गिमिक्स और रंग बिरंगी वेशभूषा भी प्रस्तुति को अपने तरह से एक आकार देती है।

सोमवार को अभिमंच प्रेक्षागृह में फरीद बज्मी निर्देशित भोपाल के थिएटर ग्रुप रंग विदूषक की प्रस्तुति ‘नैन नचैया’ भी देखने को मिली। यह एक संस्कृत प्रहसन पर आधारित प्रस्तुति थी, जिसमें रंग विदूषक की देहगतियों पर आधारित शैली स्पष्ट दिखाई देती है। यह उसी परिपाटी का प्रहसन है जिसमें एक चतुर और बाकी सब मूर्ख हुआ करते हैं।

इस प्रहसन के चतुर घोटालू बाबा को उसकी बीवी ढूंढ़ रही है, पर याददाशत खोने के बहाने वह यहाँ-वहाँ भक्तिनों पर डोरे डालता फिर रहा है। नाटक में एक राजा है जो उछलकर अपने सेवकों की गोद में लेट जाता है। उसका विदूषक दो डंडो पर बनी खड़ाऊं पर चलता है। सैनिक चेहरे को सलेटी रंग से रंगे और उस पर काले रंग से मूंछे उकेरे हुए हैं। सबकी पोशाकों में पीला रंग प्रधान है। गाना भी है-ढूंढ़ों जी... ढूंढ़ों जी...।

सरल हृदय दर्शकों में रस-संचार के लिए प्रस्तुति में काफी कुछ है। लेकिन वस्तुतः यह पुराने किस्म के टोटकों और साहित्यिकता में प्रसन्न एक ढांचा है। मूल कथा लीक से इधर-उधर के बहुतेरे प्रसंग हैं। प्रस्तुति में युवा अभिनेताओं के उत्साह के बरक्स एक कच्ची नाटकीयता है। सिखायापन इसमें साफ दिखता है।

संगम पांडेय

जनसत्ता, 11 जनवरी 2012 से साभार

Wednesday, January 11, 2012

अंधेरे का राजा और रोशनियाँ


भांरगम 2012 में मंचित नाटकों पर ‘जनसत्ता’ में संगम पांडेय लिख रहे हैं. ‘रंगवार्ता’ के साथियो के लिए साभार प्रस्तुत है रतन थियम के नाट्य मंचन पर उनकी रंग टिप्पणी.

रतन थियम देश की शीर्ष रंग-निर्देशकों में से है। उनके नाटकों में थिएटर का एक क्लासिक व्याकरण देखने को मिलता है। इस व्याकरण में कहीं भी कुछ अतिरिक्त नहीं, कोई चूक नहीं। संगीत, ध्वनियां, रोशनियां, अभिनय-सब कुछ सटीक मात्रा में आहिस्ता-आहिस्ता लेकिन पूरी लल्लीनता से पेश होते हैं। रविवार को कमानी प्रेक्षागृह में हुई भारत रंग महोत्सव की उद्घाटन प्रस्तुति ‘किंग ऑफ द डार्क चेंबर’ में भी सब कुछ इसी तरह था। पहले ही दृश्य में नीली स्पॉटलाइट अपना पूरा समय लेते हुए धीरे-धीरे गाढ़ी होती है। गाढ़े होते वृत्त में नानी सुदर्शना एक छितराए से विशाल गोलाकार आसन पर बैठी है। उसकी पीछे और दाहिने दो ऊंचे झीनी बुनावट वाले फ्रेम खड़े हैं। एक फ्रेम के पीछे से पीले रंग की पट्टी आगे की ओर गिरती है। फिर एक अन्य पात्र सुरंगमा प्रकट होती है। बांसुरी का स्वर बादलों की गड़गड़ाहट। मणिपुरी नाटक का कोई संवाद दर्शकों के पल्ले नहीं पड़ रहा। लेकिन घटित हो रहा दृश्य उन्हें बांधे हुए हैं। मंच पर फैले स्याह कपड़े में से अप्रत्याशित एक आकार ऊपर को उठता है। कुम्हार की तरह रानी दोनों हाथों से इसे गढ़ रही है। फिर वह इस स्याह आदमकद को माला और झक्क सफेद पगड़ी पहनाती है।

चटक रंगों की योजना रतन थियम की प्रायः हर प्रस्तुति में प्रमुखता से दिखाई देती है। इस प्रस्तुति में भी पीले रंग की वेशभूषा में वादकों का एक समूह। अंधेरे में डूबे मंच पर पीछे के परदे पर उभरा चंद्रमा और मंच पर फैला फूलों का बगीचा। ये रंग अक्सर अपनी टाइमिंग और दृश्य युक्तियों में एक तीखी कौंध या कि चमत्कारिक असर पैदा करते हैं। आग लगने के दृश्य में छह लोग सरपट एक लय में पीले रंग के कपड़े को हवा में उछाल रहे हैं कि दर्शक तालियां बजाने को मजबूर होते हैं।



‘किंग ऑफ द डार्क चेंबर’ रवींद्रनाथ टैगोर का नाटक है। नगर में सब कुछ सही है पर राजा अदृश्य है। वह एक अंधेरे कक्ष में रहता है। रानी सुदर्शना और प्रजा सोचते हैं कि राजा है भी कि नहीं। रानी रोशनी की गुहार करती है, पर सुरंगमा का कहना है कि उसने अनिर्वचनीय सुंदर राजा का अंधेरे में ही देखा था। आस्था और अविश्वास के बीच कांची नरेश जैसे मौकापरस्त लोग अपने काम में लगे हैं। वे आग लगवाते हैं, युद्ध का सबब बनते हैं। उधर रानी का असमंजस बढ़ता जा रहा है। नाटक का अदृश्य राजा ईश्वर याकि सच और सौंदर्य का प्रतीक माना गया है, और उसका अंधेरा कक्ष व्यक्ति के आत्म का। रानी को उसे अपने भीतर ढूंढना चाहिए, पर वह उसे बाहर ढूंढ़ रही है।

नाटक के गाढ़े चन्द्रमा का एक कम गाढ़ा शरीर भी है, यह फ्रेम के पीछे से थोड़ा टेढ़ा होकर पूरे स्टेज को निहार रहा है। युद्ध के दृश्य में एक तीखी व्यंजना है। वास्तविक योद्धाओं की जगह ऊंचे जिरह बख्तर और भाले दिख रहे हैं। आगे लाल रोशनी में तलवारबाजी। एक तेज गति और लय पूरे दृश्य को रौद्र-रस संपन्न करती है। इसी तरह अंतिम दृश्य में एक खास कोण से पड़ती पीली रोशनी में रानी एक बुत में तब्दील होती मालूम देती है-पीछे उपस्थित आकार के आगोश में समाती हुई।

रतन थियम का नाट्य व्याकरण अपनी विशिष्टता के बावजूद अब बहुत जाना-पहचाना हो गया है। उनके डिजाइन में अभिनय केंद्रीय चीज नहीं है। वह कुल प्रस्तुति का एक अवयव मात्र है। उनके सुंदर, युक्तिपूर्ण और लयपूर्ण दृश्य स्वायत्त ढंग से याद रह जाते हैं पर वे कोई गहरा संवेदनात्मक असर नहीं छोड़ते, उनकी प्रस्तुतियाँ रस-सिद्धांत वाले रंग अनुभव के करीब हैं। उनकी क्लासिक लय में एक अर्थपूर्ण सूक्ष्मता और वैभव है। जाहिर है इसमें आम जीवन की उस अनगढ़ सहजता को ढूंढना व्यर्थ ही है, जो प्रायः अभिनय की केन्द्रीयता से बनती है।

- संगम पांडेय

(साभार: जनसत्ता, दिल्ली, 10 जनवरी 2012)

Tuesday, December 13, 2011

उच्च वर्ग का पाखंड और आम आदमी की नियति


- राजेश चन्द्र -

सतीश आनंद आधुनिक हिंदी रंगमंच की उस साठोत्तरी पीढ़ी के सशक्त प्रतिनिधि हैं जिसका मुख्य सरोकार रंगमंच में भारतीयता की या अपनी अस्मिता की तलाश रहा है और वह नाटक और प्रदर्शन दोनों में एक ऐसे रूप, भाषा और मुहावरे की तलाश में तल्लीन रही है, जो हमारे आज के जीवन की जटिलताओं, संघर्षों, यातनाओं और उसके सारे अंतर्विरोधों को सभी स्तरों पर अभिव्यक्त करे और वह रुचिकर भी हो। साहित्य कला परिषद और दिल्ली सरकार के संस्कृति विभाग द्वारा विगत 28 नवंबर से 8 दिसंबर के बीच श्रीराम सेंटर में आयोजित भारतेन्दु नाट्योत्सव के अंतर्गत 7 दिसंबर को अभिनव भारती द्वारा मंचित नाटक ‘एक इंस्पेक्टर से मुलाकात’ में भी निर्देशक सतीश आनंद इसी दोहरे उद्देश्य को हासिल करने की एक छटपछाहट के साथ सामने आते हैं।

एक गंभीर संस्कृतिकर्मी के तौर पर सतीश आनंद ने एक बार फिर यह अहसास कराया है कि वे किसी भी शर्त पर लोकप्रियता या जनस्वीकृति हासिल करने में विश्वास नहीं करते, बल्कि रचना में जीवन की जटिलता, बहुस्तरीयता और द्वंद्वात्मकता की अंतर्दृष्टिपूर्ण और कल्पनाशील अभिव्यक्ति के प्रति संवेदनशीलता और ग्रहणशीलता जगाने को अपनी जिम्मेदारी समझते हैं। वे रूप और कथ्य की एक ऐसी संगति तैयार करते हैं जिसे अनुकरणात्मक नहीं, मौलिक रूप से भारतीय कहा जा सकता है। शिल्पगत तिकड़मों और तरकीबों पर भरोसा न करते हुए नाटककार, निर्देशक और अभिनेता की सृजनात्मकता के समुचित समन्वय पर बल देने वाले सतीश आनंद का योगदान अलग से रेखांकित किए जाने की पात्रता रखता है। वे अभिनेता के काम के द्वारा ही अपनी पूरी अभिव्यक्ति और कलात्मक प्रासंगिकता हासिल करते हैं। विवेच्य नाटक इसका एक सशक्त उदाहरण है।

‘एक इंस्पेक्टर से मुलाकात’ मूलत: 1912 में प्रख्यात नाटककार जे.बी. प्रिसले द्वारा रचित नाटक ‘एन इंस्पेक्टर कॉल्स’ का भारतीय रूपांतरण है, जिसे 20वीं शताब्दी के अंग्रेजी साहित्य में एक कालजयी कृति का दर्जा हासिल है। मूल नाटक की अंतर्वस्तु के केंद्र में इंग्लैंड के तत्कालीन सामाजिक जीवन की वह विषमता और अन्यायपूर्ण वर्गीय संरचना है जिसमें प्रभुत्वशाली वर्ग द्वारा विशाल आबादी की संभावनाओं और श्रम का निर्बाध और अमानवीय शोषण किया जाता है।

खास बात यह है कि बगैर किसी समाजवादी नारे का डंका पीटे और पूंजीवादी संस्कृति के गलित मूल्यों की कटु आलोचना के, प्रिसले ने कुलीनता और आभिजात्यता के पाखंड को अपने इस नाटक में उजागर किया है। उन्होंने यह सिद्ध करके दिखाया है कि किस प्रकार धनिक वर्ग सामाजिक व्यवस्था में खुद को श्रेष्ठतर समझता है और गरीब आदमी की जिंदगी उसके लिए कोई मायने नहीं रखती। प्रिसले जनसाधारण की भावनाओं के प्रवक्ता थे और समाज की वर्गीय विषमता उन्हें व्यथित करती थी। उन्होंने यह पाया था कि लोग समाज में अपनी वर्गीय अवस्थिति के बारे में जानने को उत्सुक रहते हैं और वर्गीय संरचना के अंतर्गत यदि निम्न वर्ग का कोई व्यक्ति अपनी वर्गीय नियति से मुक्ति पाने की कोशिश करता है तो यह कोशिश प्रभुत्वशाली लोगों को नागवार गुजरती है।

नाटक की कथा एक अभिजातवर्गीय परिवार के इर्द-गिर्द बुनी गई है जिसकी शुरुआत शीला (ज्योति पंत) और रमेश कपूर (राकेश यादव) की सगाई के समारोह में आयोजित एक रात्रिभोज के साथ होती है। गृहस्वामी और शीला के पिता मिस्टर खन्ना (दीपक कुमार) एक हृदयहीन उद्योगपति हैं जैसे कि आम तौर पर पूंजीवादी व्यवसायी होते हैं और हर कीमत पर मुनाफा कमाना उनका सबसे बड़ा मूल्य है। उन्हें अपने रसूख का अहंकार है जिसे बात-बात में जाहिर करना वे अपना अधिकार समझते हैं। इंस्पेक्टर कौशल (स्पर्श शर्मा) के आगमन और उत्सव में व्यवधान उत्पन्न होने से मिस्टर खन्ना के लिए एक असहज स्थिति उत्पन्न हो जाती है। घटनाक्रम के विकास के साथ अंतत: उनका अहंकार टूटता अवश्य है, जिसके कारण वे परेशानी महसूस करते हैं पर इस स्थिति में भी वे अपने अंत:करण को प्रभावित होने से बचा ले जाते हैं। इंस्पेक्टर एक स्थानीय स्त्री के मामले की छानबीन करता है, जिसने जहर खाकर आत्महत्या कर ली है। पहले तो पूरा परिवार उस स्त्री के प्रति अनभिज्ञता प्रदर्शित करता है पर जैसे-जैसे इंस्पेक्टर की जिरह आगे बढ़ती है, यह साफ होने लगता है कि इस परिवार के मुखिया से लेकर पत्नी (नीलम शर्मा), बेटे, बेटी और उसके मंगेतर तक सबने उस स्त्री के जीवन पर नकारात्मक प्रभाव डाला है और ऐसी स्थितियां निर्मित की हैं, जिसमें उसके सम्मानपूर्ण जीवन की कोई संभावना शेष नहीं रह गई थी।

अशोक (कनिष्क ज्ञान) अपने माता-पिता को संवेदनाशून्य और निकृष्टतम मनुष्य मानता है और इसलिए उनके प्रति असीम घृणा प्रदर्शित करने का कोई अवसर नहीं गंवाता। इसके उलट शीला संयत और समझदार है। नाटक में दो अलग-अलग तरह के विवेक का प्रतिनिधित्व करते इन दोनों चरित्रों में शीला अपनी कथनी और करनी में अधिक उर्वर है। वह अपने मंगेतर में तब तक आसक्ति रखती है और इस मिथ्याचार का अंग बनी रहती है जब तक इंस्पेक्टर नहीं आता, पर सत्य से साक्षात्कार होते ही वह इस पाखंड को अस्वीकार कर देती है। नाटक के अंत में वह यह देख कर स्तब्ध रह जाती है कि उसके माता-पिता का बर्ताव नहीं बदलता। वे अपने ही द्वारा उद्घाटित सत्य को अस्वीकार करने में जुट जाते हैं और धीरे-धीरे पुराने ढर्रे पर लौट आते हैं। इस तरह नाटक आभिजात्यता और सामाजिक प्रभुत्व के पाखंड को उजागर करते हुए आज की व्यवस्थागत विसंगतियों और आम आदमी की दयनीय स्थिति को प्रभावशाली तरीके से सामने लाता है।


(दैनिक भास्कर से साभार)

राजेश चन्द्र
सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन एवं पत्रकारिता, नयी दिल्ली।
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Monday, December 12, 2011

हिंदी लेखन की विविध छवियों का कोलाज

- अरुण नारायण -

डा. कुमार विमल हिंदी आलोचना के एक दिग्गज स्तंभ रहे हैं। अभी ही उनका निधन हुआ है। प्रस्तुत पुस्तक उनके अब तक के संपूर्ण विधाओं में लिखे प्रतिनिधि रचनाओं का संग्रह है। आलोचना, संपादकीय टिप्पणियां, यात्रा विवरण, ललित निबंध, संस्मरण, रेखाचित्र, कहानियां, कविताएं और टीप और टीपें जैसी अलग-अलग विधाओं की उत्कृष्ट रचनाए इसमें हैं। आलोचना खंड में विमल जी के 10 लेख हैं। इनमें पर्याप्त वैविध्य है। एक ओर आजादी के आंदोलन मंे लेखकों की भूमिका की तहकीकात है तो दूसरी ओर नाटक की क्या स्थितियां हैं इसपर भी उनकी गहरी नजर है। प्रसाद, दिनकर, अज्ञेय, निराला और प्रेमचंद पर एक-एक लेख हैं। इसके साथ ही आधुनिकता और राष्ट्रवाद पर भी उनके लेख हैं। ये लेख समकालीन लेखन से अलग गहरे कंसर्न और विश्लेषण के साथ लिखे गए हैं। इसलिये यहां आपको चालू और तात्तकालिक प्रवृतियों के समानांतर एक चिंतनशील और निर्भीक विश्लेषण मिलेगा।

पुस्तक के संपादकीय अग्रलेख और टिप्पणियां साहित्य के षास्त्रीय और गंभीर सवालों पर केंद्रित हैं। सौंदर्यशास्त्र, अस्तित्ववाद, शुद्व कविता, कला की अवधारणा आदि कई दुरूह सवालों को विमल ने डील किया है। हालांकि इन लेखों की भाषा पारंपरिक फैब्रीकेटेड हिंदी की है। एक तरह से कहें तो अकादमिक जगत में आतंक पैदा करने वाली भाषा है वो। किताब में तीन यात्रा संस्मरण हैं तीनों ही यूरोप और भारत के अलग-अलग अनुभवों को बयान करते हैं। किताब शामिल निबंध सचमुच उच्चकोटि के हैं। यहां लेखक का गहरा एनालिसिस उन्हें एक उच्चकोटि का निबंधकार साबित करता है। संस्मरण खंड तो कमाल का है। बहुत ही सधा हुआ जीवन और लेखन के गहरे पर्यवेक्षण के बाद ही इस तरह के संस्मरण लिखे जा सकते हैं। शिवपूजन सहाय, महादेवी वर्मा, सुमित्रानंदन पंत, हरिवंश राय बच्चन और नलिन विलोचन शर्मा के जीवन और लेखन दोनों पक्ष इन संस्मरणों में बहुत खूबसूरती से उजागर हुए हैं। संकलन में ‘चुनकी’ और मीना ठाकुर’ नामक दो रेखाचित्र भी हैं। दोनों ही हाशिये के समाज के पात्र हैं जिनकी बेचारगी और नियति के कई प्रसंग पढ़ने वाले को सिहरा कर रख देते हैं। ‘आत्म वितरण’ और ‘घघ्घो रानी!कितना पानी?’ दो कहानियां हैं। हालांकि इनका ट्रीटमेंट सामान्य ही है लेकिन यह एक आलोचक की सोच को समझने में मदद करती है। संकलन में विमल जी की 15 कविताएं हैं। कविता लेखन उन्होंने आरंभिक दिनों से लेकर अंतिम दिनों तक किया। हालांकि इसमें उनकी जो कविताएं हैं वो कोई खास इप्रेशंस नहीं जगातीं। ‘टीप और टीपें’ में आदर्श वाक्य की तर्ज पर की गई उनकी टिप्पणियां हैं। एक जगह लेखक लिखता है, ‘शिक्षा केवल साक्षरता नहीं है और जीविकोपार्जन का एक स्रोत भर है। भौतिक दृष्टि से भी देखें तो शिक्षा इन तीन प्रकार के अर्जनों का साधन है-विद्यार्जन, जीविकोपार्जन और स्नेहार्जन। इसलिए शिक्षा सभ्यता और शिष्टता का दिखाउ ‘काकुल’ नहीं है।’

यह संकलन कुमार विमल के सर्जनात्मक मानस के व्यापक फलक को उदघाटित करता है। यह बतलाता है कि विभिन्न विधाओं को देखने-आंकने का उनका नजरिया क्या था। साथ ही यह इस बात को भी प्रमाणित करता है कि उनके पठन-पाठन और विश्लेषण की नजर कितनी गहरी और पैनी थी।

किताबः रचना के विविध रंग (प्रतिनिधि रचनाएं)
लेखकः डा.कुमार विमल
पेजः 252
कीमतः400
प्रकाशकः जागृति साहित्य प्रकाशन, साईंस कालेज के सामने
अशोक राजपथ पटना 800006

सम्पर्क : हिंदी प्रकाशन, उपभवन, बिहार विधान परिषद पटना 800015 मोबाइल 9934002632

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