RANGVARTA qrtly theatre & art magazine

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Thursday, April 7, 2016

10 प्रमुख भारतीय नस्लवादी फिल्में


सिनेमा शुरू से ही एक नस्लीय हथियार रहा है जिसके द्वारा आदिवासियों का सांस्कृतिक संहार आज तक जारी है। दुनियाभर के सिनेमा में आदिवासियों को जंगली, बर्बर, असभ्य और हिंसक बताना तथा आदिवासी औरतों को ‘माल’ की तरह दिखाना-परोसना एक आम परिदृश्य है। चाहे वह 1915 में अमेरिका में बनी ‘द बर्थ ऑफ ए नेशन’ हो या भारत में 1917 में बनी ‘लंका दहन’, 1936 में बनी ‘इज्जत’ और 1938 में बनी तमिल फिल्म ‘वनराज कर्जन’ हो। हाल में प्रदर्शित हुई और कुछ राज्यों में प्रतिबंधित हुई ‘मैसेंजर ऑफ गॉड-2’ तक में आदिवासियों को ‘शैतान’ और ‘लाचार’ के रूप में चित्रित करने का नस्लीय सिलसिला जारी है।

कला के क्षेत्र में ‘ब्लैकफेस’ रंगमंच की खोज 1830 के आसपास अमेरिकन थिएटर ने की। मुख्यधारा में लोकप्रिय चरित्र टार्जन की खोज 1912 में एडगर राइस बर्रो ने की जो सिनेमा के पर्दे पर पहली बार 1918 में आई ‘टार्जन ऑफ द एप्स’ के रूप में। तब से लेकर आज तक टार्जन पर 200 से अधिक फिल्में बन चुकी हैं। टार्जन ने लोकप्रिय मनोरंजन उद्योग में जंगल और जंगल में रहने वालों को किसी बाहरी ग्रह के निवासियों की तरह परोसा जो दिखते तो इंसान की तरह हैं, मगर इंसान हैं नहीं। यह पूरा नजरिया ‘जंगल राज’ के रूप में सामने आता है। जंगल राज यानी एक ऐसी व्यवस्था जहां कोई व्यवस्था नहीं है। जहां लोग अराजक हैं, हिंसक हैं, बर्बर हैं, असभ्य हैं और जहां बलवान कमजोर को मारकर खा जाता है। वहीं, कला, साहित्य और सिनेमा में, यानी मनोरंजन और विज्ञापनों के बाजार में इस जंगल राज को या जंगलीपन को ‘वाइल्डनेस’ के रूप में बेचा जाता है। वाइल्डनेस का यहां अर्थ सिर्फ और सिर्फ चरम उत्तेजना है। चरम बर्बरता की हद तक उत्तेजना। टार्जन टाइप की फिल्में और कंडोम एवं विभिन्न किस्म के बॉडी स्प्रे के विज्ञापन इसके सबसे बढ़िया उदाहरण हैं।

भारतीय फिल्मों में जंगली यानी आदिवासियों पर केन्द्रित पहली फिल्म ‘इज्जत’ 1936 में बनी। इसे फ्रैंज ऑस्टन ने निर्देशित और हिमांशु राय ने प्रस्तुत किया था। उस समय की स्टार और बोल्ड अभिनेत्राी देविका रानी ने इसमें भील आदिवासी युवती और जानेमाने कलाकार अशोक कुमार ने भील युवक की भूमिका निभायी थी। फिल्म को प्रोड्यूस किया था बॉम्बे टॉकीज ने। टार्जन की पॉपुलर छवि वाली पहली फिल्म भी ‘इज्जत’ के साथ-साथ ही 1937 में आई। होमी वाडिया के निर्देशन में वाडिया मूवीटोन कंपनी ने ‘तूफानी टार्जन’ नाम से पहली टार्जन फिल्म बनायी। यह हिंदी के साथ-साथ तमिल में भी प्रदर्शित हुई थी। इसमें एक आदिवासी कैरेक्टर ‘दादा’ को जिसकी भूमिका बोमन श्राफ ने की है, जिसे फिल्म में आधा आदमी आधा वनमानुष बताया गया है। 1937 से 2000 तक भारतीय फिल्मोद्योग ने टार्जन कैरेक्टर वाली 22 फिल्मों का निर्माण किया है।

अब तक आदिवासी जीवन व समाज को किसी न किसी रूप में परंतु प्रमुखता से चित्रित करने वाले फिल्मों की संख्या 100 से ज्यादा हैं। इसमें उन फिल्मों की गिनती शामिल नहीं है, जिनमें आदिवासी चरित्रों को सिर्फ नाच-गान यानी ‘झींगा ला-ला हुर्र, हुर्र ...’ करते हुए दिखाया गया है। इसमें कोई संदेह नहीं कि भारतीय फिल्मोद्योग और पॉपुलर कल्चर का अरबों रुपये का बाजार नस्लीय रंगभेद, जातिगत पूर्वाग्रहों और धार्मिक एवं लैंगिक उत्पीड़न पर खड़ा है।

बहुजातीय संस्कृति वाले भारतीय समाज में एक धर्म, एक संस्कृति, एक भाषा का नस्लीय फिल्मी मनोरंजन का बाजार खड़ा करने का काम दादा फाल्के ने किया। सिनेमा और फाल्के के आने के पहले मनोरंजन का पॉपुलर बाजार पारसी थिएटर और नौटंकी कंपनियां थीं। जिनमें डाकुओं, ऐतिहासिक किस्से और ऐय्यारों का ड्रामा हुआ करता था। रामलीला और रासलीला जैसी नाट्य परंपराएं मनोरंजन के बाजार की बजाय विशुद्ध रूप से धार्मिक अवसरों से जुड़े थे। फाल्के ने 1917 में ‘लंका दहन’ बना कर धर्म को मनोरंजन के सिनेमाई बाजार में बदलने का काम किया। 1913 में आई ‘हरिश्चंद्र तारामति’ के बाद ‘लंका दहन’ उनकी दूसरी फिल्म थी जिसकी ब्लॉकबस्टर कमाई ने मनोरंजन के बाजार में धार्मिक यानी नस्लीय ट्रेंड को पूरी तरह से स्थापित कर दिया। और ‘लंका दहन’ के आठ साल बाद 1925 में 27 सितंबर को भारत के बहुसंख्यक नस्लवादी संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना हुई। विजयादशमी के दिन। यानी रावण वध के दिन। अनार्य राक्षसों, असुरों, आदिवासियों के संहार के पारंपरिक वार्षिक उत्सव दशहरा के दिन।

20वीं सदी की शुरुआत में अमेरिका में एक ऐसी फिल्म आई जिसे फिल्मी इतिहासकारों का एक बड़ा वर्ग दुनिया का पहला फुल लेंथ फीचर फिल्म मानता हैै। डी. डब्ल्यू. ग्रिफिथ (1875-1948) की फिल्म ‘द बर्थ ऑफ ए नेशन’ (1915) निःसंदेह सिने ताकत और कला की बेजोड़ प्रस्तुति है। पर इसी के साथ यह दुनिया की सबसे नस्लीय फिल्म भी है। जिसमें गोरों का महिमामंडन और काले लोगों का स्टीरियोटाइप नकारात्मक चित्रण हुआ है। क्या यह महज संयोग है कि ठीक इसी समय भारत में दादा फाल्के ‘लंका दहन’ (1917) बनाते हैं जो नस्लीय और धार्मिक फिल्म है। जिसमें असुर आदिवासियों की हत्या करने वाले आर्यों का महिमांमंडन करते हुए ब्राह्मणवादी मूल्यों का गुणगान किया गया है। वास्तव में दादा फाल्के भारतीय सिनेमा के नहीं हिन्दू सिनेमा के ‘पिता’ हैं। उन्होंने सिर्फ और सिर्फ धार्मिक और मिथकीय फिल्में बनायी और सिनेमा कला के जरिए हिंदू धर्म का प्रचार-प्रसार किया। दादा फाल्के ने भारत की साझी सांस्कृतिक एवं धार्मिक विरासत की अवहेलना ही नहीं की बल्कि अपनी फिल्मों से नस्लीय भेदभाव और हिंसा को भी भरपूर खाद-पानी दिया। उनकी सारी फिल्में देश के मूलनिवासियों, आदिवासियों, राक्षसों और असुरों की हत्याओं का महिमामंडन करती हैं।

1909 में पंजाब में सबसे पहले और फिर 1910 में अखिल भारतीय स्तर पर एक राजनीतिक पार्टी के रूप में हिंदू महासभा का गठन हुआ। हमें बताया जाता है कि 1909 में मुस्लिम लीग की स्थापना की प्रतिक्रिया में हिंदू महासभा अस्तित्व में आया। इसके बाद 1925 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना होती है और आदिवासी इलाके में हमें वनवासी कल्याण आश्रम पहली बार 1952 में दिखाई देता है। इसी समय यानी 1953 में ‘जंगल का जवाहर’ सिनेमाघरों में प्रदर्शित होती है जिसमें जंगली लोगों की सेवा करने वाले एक डॉक्टर और उसकी बेटी के एडवेंचरस कारनामों को होमी वाडिया ने ग्लैमरस तरीके से प्रस्तुत किया है। साथ ही 1954 में क्लासिक मानी जानेवाली ‘प्रगतिशील’ बिजन भट्टाचार्य की कहानी पर बनी हिंदी फिल्म ‘नागिन’ आती है जिसमें आदिवासियों को ‘जहर बेचनेवाला’ बताया जाता है। ध्यान रहे कि यह वही समय है जब दक्षिण के तेलंगाना, पूरब के तेभागा व (तत्कालीन मध्यप्रदेश, बिहार, उड़ीसा, पश्चिम बंगाल सहित) ग्रेटर झारखंड और उत्तर-पूर्व के आदिवासी अपने नैसर्गिक पुरखा अधिकारों व स्वायत्तता की लड़ाई लड़ रहे थे। उसी समय में वनवासी कल्याण आश्रम की स्थापना आरएसएस ने सरकार के सहयोग से तत्कालीन मध्यप्रदेश के जशपुर में की थी। जबकि विश्व हिंदू परिषद 29 अगस्त 1964 को अस्तित्व में आता है।

बीसवीं सदी के दूसरे दशक से लेकर सातवें दशक तक में हुए हिंदू नस्लवादी संगठन के सामाजिक और राजनीतिक उभार व गठन के पीछे फाल्के की नस्लीय फिल्मी परंपरा की भयावह भूमिका है। हिमांशु राय, होमी वाडिया, बिमल राय, सत्यजीत रे, बिजन भट्टाचार्य, ऋत्विक घटक, राजेन्द्र सिंह बेदी, ख्वाजा अहमद अब्बास और तमिल के आर नारायण मूर्ति जैसे गंभीर व प्रगतिशील माने जानेवाले फिल्मकार और लेखक नस्लीय परंपरा के इस यथास्थितिवाद को अपनी फिल्मों से बनाये रखते हैं।

इस दृष्टि से 2015 तक की 10 भारतीय नस्लवादी फिल्में निम्नांकित हैं जिनमें आदिवासियों का स्टीरियोटाइप नकारात्मक और नस्लीय चित्रण हुआ है -

1. नागिन (1954) हिंदी
2. अरण्येर दिनरात्रि (1970) बांग्ला
3. ये गुलिस्तां हमारा (1972) हिंदी
4. अल्लुरी सीताराम राजु (1974) तेलुगू
5. आक्रोश (1980) हिंदी
6. मैसी साहब (1985) हिंदी
7. टैंगो चार्ली (2005) हिंदी
8. ओंगा (2012) ओड़िया/हिंदी
9. अरवान (2012) मलयालम/तेलुगू
10. मैसेंजर ऑफ गॉड-2 (2015) हिंदी

1954 में रिलीज हुई बॉलीवुड की ‘नागिन’ संभवतः उत्तर-पूर्व की झलक दिखलाने वाली पहली पॉपुलर मसाला फिल्म है। बॉलीवुड निर्मित अन्य चार फिल्में हैं - ‘ये गुलिस्तां हमारा’ (1972), ‘दिल से’ (1998), ‘टैंगो चार्ली’ (2005) और ऑस्कर के लिए 2014 में भारत की ओर से भेजी गयी ‘लियर्स डाइस’ (2013)। ‘नागिन’ फिल्म की शुरुआत इन शब्दों के साथ होती है कि ‘यह फिल्म किसी भी मौजूदा या पुरानी जाति के जीवन से संबंध नहीं रखती’। लेकिन फिल्म का पहला ही दृश्य अपने कॉस्ट्यूम्स और प्रॉपर्टी के जरिए बता देता है कि यह उत्तर-पूर्व के आदिवासियों की कहानी है। फिल्म में दो कबीले बताए गए हैं जो जहर का व्यापार करते हैं और व्यापारिक प्रतिद्वंद्विता के चलते दोनों एकदूसरे के खून के प्यासे हैं। सबसे सोचनीय पक्ष यह है कि फिल्म की कहानी प्रगतिशील वामपंथी नाटककार बिजन भट्टाचार्य ने लिखी है। गैर-आदिवासी समाज का दक्षिणपंथी हो या वामपंथी वह आदिवासियों के प्रति कैसी दृष्टि रखता है और उनसे किस हद तक नस्लीय घृणा करता है, इसका सिनेमाई दस्तावेज है ‘नागिन’।

इसी तरह 1972 में आई देवानंद अभिनीत और आत्माराम निर्देशित ‘ये गुलिस्तां हमारा’ भारत-चीन युद्ध की पृष्ठभूमि पर है। इसमें भी उत्तर-पूर्व के आदिवासियों को देश के लिए जहरीला यानी ‘देशद्रोही’ के रूप में दर्शाया गया है। इसका एक गाना ‘मेरा नाम आओ ...’ सीधे-सीधे अरुणाचल के ‘आओ’ आदिवासियों पर केन्द्रित थी जिसे उत्तर-पूर्व के आदिवासियों के विरोध के कारण संपादित करना पड़ा था। ‘टैंगो चार्ली’ (2005) में भी उत्तर-पूर्व के विद्रोही आदिवासियों को इसी तरह से दिखाया गया जिसे उत्तर-पूर्व में जबरदस्त विरोध के कारण प्रतिबंधित करना पड़ा।

2014 में भारत की ओर से ऑस्कर को भेजी गई फिल्म ‘लियर्स डाइस’ हिमाचल की पृष्ठभूमि पर है। इसमें एक पहाड़िन महिला अपनी बच्ची के साथ दिल्ली में मजदूरी करने आए और फिर गुम हो गए पति को ढूंढने आती है। उसकी इस तलाश में सेना का एक भगोड़ा सिपाही साथ देता है। मतलब फिल्म बताती है कि सेना ही उत्तर-पूर्व के आदिवासियों की रक्षक है। सेना का भगोड़ा फौजी भी कितना ‘मानवीय’ होता है ‘लियर्स डाइस’ दर्शकों को यही बताती है। यहां यह याद रखना होगा कि उत्तर-पूर्व के आदिवासी ‘आफ्सपा’ जैसा कानून और अपने इलाके से सेना को हटाने के लिए लंबे समय से संघर्ष कर रहे हैं।

- अश्विनी कुमार पंकज

(यह लेख ‘फॉरवर्ड प्रेस’ के अप्रैल 2016 अंक में छपा है.)

Tuesday, May 21, 2013

हिंदी समाज हिंदी लेखकों के पक्ष में नहीं है - असगर वजाहत




अक्सर हिंदी नाटकों में धन की कमी और रंगकर्मियों की आजीविका के स्थायी बंदोबस्त को लेकर सवाल किए जाते हैं। इस प्रश्न पर जहां तक मेरी राय का सवाल है तो मैं तो साफ तौर पर यही कहूंगा कि हिंदी नाटक को समाज का सहयोग नहीं मिल रहा है। आज भी वह राज्याश्रय में ही पल रहा है। जब तक हिंदी नाटक सरकारी हाथों से मुक्त नहीं होगा। तब तक वह अपने पैरों पर खड़ा नहीं हो सकता और न ही उसका कोई भला होने वाला है। मराठी, कन्नड़, मलयालम में नाटकों को जनता का सहयोग मिलता है। मैंने जितने भी उपन्यास, नाटक या कहानियां लिखी हैं उनमें दूसरी बातों के अलावा सामाजिक तथ्य जरूर मिलेंगे। यह बात दीगर है कि समय और जरूरत के मुताबिक हमारी भाषा में बदलाव आता रहता है। अच्छा निर्देशक ही अच्छे नाटक के साथ न्याय कर सकता है। क्योंकि वह जानता है कि कौनसे शब्द में नाटक की आत्मा बसी है। बस! उसका काम उसे दर्शकों तक संप्रेषित करना होता है। इसके अलावा कलाकार की अच्छी एक्टिंग का भी सहयोग होता है। फिल्म निर्माता- निर्देशक मणि कौल ने मुझे फिल्म माटी के मानस में एक भूमिका ऑफर की थी। पर व्यस्तताओं की वजह से अभिनय नहीं कर सका।

हिंदी भाषा की स्थिति दयनीय

बांग्ला, कन्नड़ और मलयालम आदि भाषाएं भाषायी दृष्टि से सुदृढ़ है, वहीं हिंदी भाषा के मौजूदा हालात दयनीय हैं। दरअसल हिंदी समाज हिंदी लेखकों के पक्ष में नहीं है, जबकि हिंदुस्तान में अंग्रेजी तर्ज के लेखकों को सिर्फ अखबार ही नहीं प्रचार के दूसरे संसाधन भी तवज्जो देते हैं। जिस तरह यूपी, बिहार में हिंदी के स्कूल खत्म हो रहे हैं। उनकी जगह अंग्रेजी भाषा के निजी स्कूलों की तादाद बढ़ रही है। वह हिंदी के लिए मुश्किलें पैदा कर रहा है। करीब तीन साल पहले जब मैं शायर फैज अहमद फैज की जन्म शताब्दी में हुए जलसे में शिरकत करने पाकिस्तान गया तो देखा कि वहां सब कुछ है पर, फकत धर्म ही नहीं है। पाकिस्तान में घरों और व्यावसायिक प्रतिष्ठानों पर इस्लाम संबंधी स्लोगन जरूर देखने को मिलते हैं। सत्ता के लिए धर्म का इस्तेमाल किसी भी मायने में मुनासिब नहीं है।

गांधीजी की सोच का ताना-बाना

इन दिनों मेरे लिखे नाटक गोडसे एट गांधी डॉट कॉम के विभिन्न शोज हो रहे हैं। फिल्म अभिनेता टॉम आल्टर इसे मंचित कर रहे हैं। इसमें गांधीजी की सामाजिक, आर्थिक व राजनीतिक समेत विकास और प्रशासन की स्थिति को मौजूदा दौर में पिरोया गया है। तमाम कथानक का ताना-बाना गांधीजी को गोली लगने और उनके जीवित रहने के बाद बुना गया है। पूरा नाटक फिक्शन पर आधारित है। इसमें एक तरह की डिबेट का चित्रांकन किया गया है, क्योंकि गांधीजी और गोडसे दोनों की आदर्श ग्रंथ गीता की पुस्तक ही थी। इस नाटक में हिंदुस्तान में मौजूद कट्टरपंथी और उदार पंथी विचारधाराओं को गूंथा गया है। इसमें दर्शकों को गांधीजी के क्रिटिक ((कमजोर)) और आदर्श रूप को भी दर्शाया गया है। गांधीजी के आजादी के बाद कांग्रेस को डिजॉल्व करने की पैरवी को भी तार्किक ढंग से दर्शाया गया है।

(जैसा उन्होंने सर्वेश भट्ट को बताया)
दैनिक भास्कर से साभार

Thursday, March 21, 2013

लिपिका दराई हमें तुम पर नाज है



जैसा कि अक्सर होता है. सेलिब्रेटी और बड़े नाम अपने आकार से नए और प्रतिभावान लोगों के रास्ते को संकरा कर देते हैं. लिपिका सिंह दराई के साथ भी ऐसा ही हुआ है. बारीपदा (उड़ीसा) की रहनेवाली 29 वर्षीय लिपिका को किसी निर्देशक की सर्वश्रेष्ठ पहली फिल्म (गैर फीचर) के लिए 60वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार से नवाजा गया है. यह पुरस्कार उन्हें उनकी डॉक्यूमेंट्री ओड़िया फिल्म ‘एक गाछ, एक मनुष्य, एक समुंदर’ के लिए दिया जाएगा. लिपिका सिंह दराई ने फिल्म इंस्टीट्यूट, पुणे से साउंड इंजीनियरिंग और ऑडियोग्राफी में विषेज्ञता हासिल की है और इन दिनों वह ओड़िसा के लोक व कठपुतली कला को डॉक्यूमेंट करने में लगी हुई है.

जबकि फीचर फिल्म की श्रेणी में यही पुरस्कार हिन्दी फिल्म ‘चिट्टागॉन्ग’ के निर्देशक बेदब्रत पेन तथा मलयालम फिल्म ‘101 चोदियन्गल’ के निर्देशक सिद्धार्थ सिवा को संयुक्त रूप से देने की घोषणा हुई है. लेकिन इरफान के शोर में लिपिका की सफलता दब कर रह गई है जिसने दूसरी बार राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार जीता है. इससे पहले वह 2010 में हिंदी-मराठी फिल्म ‘गरूड़ा’ (वर्तनी) के लिए बेस्ट ऑडियोग्राफी का का 57वां राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार जीत चुकी है.

लिपिका क्लासिकल संगीत की भी छात्रा रही है और वह एक बेहतरीन गायिका भी है. ओड़िसा, बालासोर के प्रफुल्ल कुमार दास उसके संगीत शिक्षक रहे हैं. अपनी इस राष्ट्रीय उपलब्धि पर वह कहती है, ‘यह फिल्म एक तरह से मेरे गुरु को श्रद्धांजलि है.’

निःसंदेह इरफान और जिन्हें भी राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिले हैं, उनकी चर्चा जरूरी है. हम सब इरफान जैसे कलाकारों को चाहते हैं. लेकिन मीडिया ने जिस तरह से इस युवा निर्देशिका की उपेक्षा की है और कर रही है, उससे विश्वास करना मुश्किल है कि प्रतिभाओं की पूछ होती है. बीबीसी हिंदी ने भी अपने समाचार में अन्य भारतीय मीडिया की तरह उसका उल्लेख करना तक जरूरी नहीं समझा है.

मसला तब और गंभीर हो जाता है, जब कोई विजेता दमित-वंचित समुदाय से आता है. और यह महज संयोग नहीं है कि लिपिका आदिवासी है. वह ‘हो’ आदिवासी समुदाय की बेटी है. हमें नहीं मालूम उपेक्षा उसके आदिवासी होने की वजह से हो रही है या कोई और कारण है. लेकिन यह नहीं भूलना चाहिए कि जब शिवाजी चंद्रभूषण देवगम को 2007 में ‘फ्रोजेन’ के लिए निर्देशक की सर्वश्रेष्ठ पहली फीचर फिल्म का अवार्ड मिला था, तो मीडिया ने उन्हें भी कवरेज नहीं दिया था. देवगम भी ‘हो’ आदिवासी समुदाय से आते हैं और वे मूलतः चाईबासा, झारखंड के रहने वाले हैं. हो सहित समस्त आदिवासी समुदाय के को राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार जीतने वाले इन दोनों निर्देशकों की उपलब्धि पर गर्व है.

ओड़िया मीडिया में लिपिका की खबरें हैं पर कोई भी उसके आदिवासी होने का उल्लेख नहीं कर रहा है. तो क्या यह मान लिया जाए कि लिपिका की उपेक्षा में उसका आदिवासी होना ‘ही’ या ‘भी’ है.

Monday, March 18, 2013

एकलव्य उवाचः सत्य का असत्य



सत्यव्रत राउत की बातों में कितना असत्य है. इसका एक और उदाहरण ‘मत्ते एकलव्य’ या ‘एकलव्य उवाच’ के नाटककार का नाम है. जब हमने उनसे सवाल किया कि आपने आदिवासी एकलव्य को दलित क्यों बताया तो गोल-गोल जवाब के बाद यह कहते हुए पल्ला झाड़ लिया कि आप अपना सवाल निर्देशक से नहीं बल्कि नाटककार कुलदीप कुणाल से करें. उन्होंने कुलदीप का फोन नंबर भी कमेंट में डाल दिया. असत्यता की हद यह है कि ‘मत्ते एकलव्य’ का लेखक कब कुलदीप कुणाल हो जाता है और कब वे स्वयं, कहना मुश्किल है.

सर्वश्रेष्ठ निर्देशक का मेटा अवार्ड जीतने के बाद daily Pioneer को दिए गए वक्तव्य में उन्होंने कहा है कि वे स्वयं इस नाटक के लेखक हैं और जिसे उन्होंने अपने दिल्ली के एक छात्र के साथ मिलकर लिखा है. The script was written by me and one of my students in Delhi. (लिंक) ध्यान दीजिए वे लेखक का नाम नहीं ले रहे हैं. कह रहे हैं एक छात्र.

इसी तरह जब वे जुलाई 2011 में कोलंबिया जाने की तैयारी कर रहे थे तब इस संबंध में एक प्रेस-कॉन्फ्रेंस में भी उन्होंने एकलव्य का नाट्यालेख खुद लिखने की बात कही है. It is scripted and directed by Satyabrata Raut, acclaimed playwright ... (लिंक) मतलब जब पुरस्कार, पैसा और नाम की बात हो तो वे खुद इसके स्क्रिप्ट राईटर हो जाते हैं और जब नाटक पर सवाल उठता है तो वे अपने निरीह छात्र को अपनी ढाल बना लेते हैं. यही नहीं, जब नाटक के जरिए खुद को भीड़ भरे ट्रैफिक से निकाल कर आगे ले जाना हो तो इसके कन्नड़ रूपांतरकार के. रामैया जैसे प्रतिष्ठित और साहित्य अकादमी से सम्मानित दलित लेखक हो जाते हैं.

Saturday, March 16, 2013

हमारे लिए आदिवासी पहचान मुद्दा नहीं है


Stage Impressions जो For the love of theatre & because theatre is alive! Stage Impressions (www.stageimpressions.com) is the Mumbai-based theatre appreciation website, co-owned by Deepa Deosthalee and Vikram Phukan द्वारा बनाया गया पेज है ने यह कहते हुए कि वे पॉलटिकल मुद्दे को सपोर्ट नहीं करते रंगकर्मी और Theatre magazine ‘रंगवार्ता’ के Editor अश्विनी कुमार पंकज की कुछ टिप्पणियों को remove कर दिया है और Block भी. अश्विनी कुमार पंकज ने सत्यव्रत राउत के नाटक ‘मत्ते एकलव्य’ पर सवाल उठाया है कि इस नाटक में आदिवासी एकलव्य को क्यों अछूत और दलित बताया गया है. उन्होंने कहा है कि किसी जातिविहीन चरित्र को सायास जाति का सिद्ध करना एक तरह से आदिवासियों का Cultural Genocide करना है.

हम सभी की बातें यहां रख रहे हैं. आप देखें कि कैसे आदिवासी के नाम पर खेल चल रहा है और जैसे लोग भारत के 12 करोड़ से भी अधिक आदिवासी समुदाय के पहचान को खा जाने की, उसके संस्कृतिकरण करने की कुत्सित पॉलटिक्स कर रहे हैं और सवाल उठाने पर कह रहे हैं कि अश्विनी पंकज पॉलटिक्स कर रहे हैं.

ये लिंक सीधे उस पोस्ट का है जहां बहस चली और कमेंट किए गए : https://www.facebook.com/photo.php?fbid=576170035740338&set=a.191334460890566.46040.153781044645908&type=1&theater

इस लिंक पर चली पूरी बहस यहां है. आप भी देखिए -

Stage Impressions : http://bit.ly/WpchgA | Satyabrata Rout was adjudged the best director at theMahindra Excellence in Theatre Awards for 'Matte Eklayva', an Aadima ಆದಿಮpresentation | Speaking to the The Pioneer (daily), he said, "Eklavya had skills but he suffered just because he did not have a guide, the same happens to so many students today. It is a vital issue which was narrated through folk forms by illiterate people. More than the medium it was the message that was important and I think the message has reached out well to the people" (http://bit.ly/ZHA6ip) | Image courtesy Mohit Kaycee -Satyabrata Rout के साथ. Unlike • • साझा करें • बुधवार 13 March 2013 आपको और 6 अन्य को यह पसंद है. • 7 shares

Stage Impressions : A comment by Ak Pankaj: ‘एकलव्य’ का इस्तेमाल रंगमंच पर भी उसकी आदिवासी अस्मिता को नकार कर हुआ है. इसका प्रमाण है सत्यव्रत राउत का यह स्टेटमेंट जिसमें वे सिर्फ उसे एक ‘सामान्य’ छात्र के बतौर देखते हैं और उसके आदिवासी समुदाय को अपढ़ मानते हैं. वे कहते हैं कि वह इसलिए पीड़ित हुआ क्योंकि उसका कोई गाइड नहीं था. यह कैसी मानसिकता है जो आदिवासियों के विजडम को स्वीकार करने को तैयार नहीं है और ‘मुख्यधारा’ को गुरु बनाए बिना उसका विकास नहीं हो सकता है, ऐसी झूठी उद्घोषणा कर रहा है. आप आदिवासियों की कहानियां उठाते हैं और उसके माध्यम से उनकी नहीं अपने समाज की तकलीफ संप्रेषित करते हैं. बुधवार को 03:51 अपराह्न बजे • पसंद

Stage Impressions : Please read the entire article: "Satyabrata Rout, who won the best director honour for his play Matte Eklavya at the META awards, shared that his production describes the class and caste discrimination faced by students in India.

In 2010 when he was invited to Latin America with the play that is based on Indian mythology or folklore, director Satyabrata Rout was clear about what he wanted to present. But the Herculean task was to come up with the play with the limited number of actors, five. “The company that was sponsoring us only could have taken five people so it was our major limitation. I went to Karnataka and met a guy who runs his organisation called Aadima, the term that derives its name from Aadim, meaning primitive or ancient, without any government support. He is a fantastic screenplay and is know for his work but unfortunately he faced problems just because he belongs to scheduled caste. I narrated him the idea and the concept of the play and he agreed to help us because even he was working towards removing the class and caste barriers from our society. Through him we reached to some remote areas and tribals of Karnataka and chose a narrative form of theatre. In our play the story is told as a narrative through a tribal folk form. Otherwise it was not possible to come up with the play with such a small team,” shared Rout, while he went back to the history to describe the origin of his play Matte Eklavya. The play was recently staged in Delhi as part of Mahindra Excellence in Theatre Awards (META) and Rout received the best director award this year for his play that talks about the deficiencies and how students are treated differently by their teachers just because some belong to a particular cast.

Matte Eklavya means ‘Eklavya once again.’ It is the story from the Mahabharata about this boy named Eklavya, who could not have his training under Guru Dronacharya because he was not a Brahmin. Eklavya did not give up and assumes Guru Dronacharya as his teacher and learns on his own. However, when Dronacharya got to know about the boy’s brilliant skills he asked for his thumb as a Guru Dakshina, so that the boy could never master the bow and arrow. Rout has redefined this story to suit the present times. “I can find the Eklavya in modern day students as well. Some of them have the passion for learning but the teachers discriminate on the basis of caste. It was on 2008 when I went from Delhi to Hyderabad where I saw how some teachers discriminated among the students because of issues like caste and class, these issues are very prominent in South India. In 2008, two Dalit students committed suicide in our university in Hyderabad and they wrote in their suicide note that they were harassed by their teachers. Later when we got to know about the performance in Latin America, I thought we could build this issue in the form of the play. The script was written by me and one of my students in Delhi,” informed the director, who has been staging the play at the tribal and rural areas for the meagre sum of money.

“Eklavya had skills and he was a talented boy but he suffered just because he did not have a guide, the same happens to so many students today. It is a vital issue which was narrated through folk forms by illiterate people. More than the medium it was the message that was important and I think the message has reached out well to the people,” added the director.

The director feels that there have been some changes in our education system, but the change needs to reach the rural areas. “I am really thankful for the recognition and platform that META has given us. It was difficult to talk about such an important issue but we have found a voice and we hope to send across the message far and wide through this play,” ended the director." बुधवार को 04:01 अपराह्न बजे • संपादित • पसंद

Ak Pankaj : जब एकलव्य दलित या पिछड़ी जाति का नहीं है बल्कि वह भील आदिवासी है तो उसे जाति संघर्ष का नायक क्यों बनाया गया?

हालांकि आप किसी उत्पीड़ित चरित्र के माध्यम से अपनी बात कहने के लिए स्वतंत्र हैं फिर भी आदिवासी संघर्ष की कहानी क्यों नहीं ली, जिस आदिवासी समुदाय से एकलव्य आता है. क्योंकि जाति संघर्ष आदिवासियों के संघर्ष को प्रतिबिंबित नहीं करता.

किसी आदिवासी को जाति के घेरे में ले आना आदिवासियों का जाति में रूपांतरण करना है और यह आदिवासी अस्तित्व व उसकी पहचान को नकारने का गंभीर मामला है.

आप आदिवासी चरित्र लेते हैं. आदिवासी कहानी लेते हैं. आदिवासी फोक फॉर्म लेते हैं और कहानी ‘जाति’ की कहते हैं. क्या यह सही है?

यह इसलिए है दोस्त कि आप आदिवासी समुदाय को जानते ही नहीं हैं. इसीलिए आपको आदिवासी समस्या महत्वपूर्ण नहीं लगी. कुछ और लगा. गुरूवार को 10:28 अपराह्न बजे • पसंद

Ak Pankaj : मुझे कोई आश्चर्य नहीं होता राउत जी आप जैसे लोगों से. जो यह कहते हैं कि उन्हें एकलव्य का सिर्फ "self learning,struggle for survival, prakriti prem, spirituality and sense of learning" दिखता है. मतलब आप उसे जाति और समुदाय से ऊपर देखते हैं. एकलव्य आपके लिए सिर्फ एक ‘इंसान’ है जो व्यवस्था के खिलाफ संघर्ष करता है और नए मूल्यों का प्रतिनिधित्व करता है. और आप बड़ी गर्व से कहते हैं कि एकलव्य के माध्यम से महाभारत जैसे एपिक को ‘री-डिफाइंड’ कर रहे हैं. लेकिन ऐसा नहीं है. क्योंकि आपका एकलव्य पहले ही दृश्य में कहता है ‘मैं एक अछूत. ... मैं महाशूद्र एकलव्य’. आपका एकलव्य जातिविहीन, अस्मिताविहीन ‘इंसान’ नहीं है. वह बार-बार और पूरे नाटक में खुद को शूद्र बोलता है. तो एक आदिवासी चरित्र को गलत झंग से ‘री-डिफाइन’ करने की यह कैसी मानसिकता है?

अगर आपको एकलव्य का अस्मिताविहीन चरित्र इतना ही पसंद था फिर उसे ‘अछूत’ और ‘शूद्र‘ क्यों बता रहे हैं? उसे आदिवासी नहीं कहना चाहते थे तो अछूत, शूद्र क्यों बना दिया? क्या मजबूरी या सोच है एक जातिविहीन आदिवासी को अछूत बनाने की? उसे इंसान ही क्यों नहीं रहने दिया राउत जी?

यह विडियो आपने ही पोस्ट किया है न? आपके ही नाटक का है न?

http://www.youtube.com/watch?v=X9fEcfUC-AU बीते कल 03:09 अपराह्न बजे • पसंद

Stage Impressions : For those following this thread, a response from the play's director Satyabrata Rout: "Priya Pankaj Ji, Subah bhi aap ka comment padha tha. Aap bil kul sagi kaha hai. Main adivasi ka problem se wakif nahin hun. Mereliye Eklavya ka Adivashi hone se jyada uska self learning,struggle for survival, prakriti prem, spirituality and sense of learning jyada mahatwapurna hai. Kya ye galat hai! Eklavya ka anek ayyam ho sakte hain. Main koun si angle se dekha hun o' mereliye mahatwapun hai. Aap ki nazariya bilkul alag ho sakte hain. Ye ek mythical character hai. New interpretation dena mere khayal se artha hin nahin ho sakta. Aap kripaya ise anyatha na lein. Main apni simit budhi se ye natak banaya hun. Aap ki tarah adibashi byabastha ka sodhak bhi nahin hun. Aap zaroor bislesan (analyse) kare par natak dekhe bina comment kaise kar sakte hai? Isliye kabhi hamain Ranchi bulaiye, Ye natak karte hain phir chir phad karna sayad achha rahega....Aap ka ek rangakarmi. mitra..satyabrata rout." 20 घंटे पहले • पसंद

Ak Pankaj : प्रिय एडमिन, यह पुराना रिस्पांस है. इस रिस्पांस के जवाब में ऊपर का मेरा कमेंट देखें जिसका कोई जवाब मि. राउत ने नहीं दिया है. यह मासूम जवाब नहीं चलेगा कि ‘सीमित बुद्धि से नाटक बनाया है.’ आप किसी भी बुद्धि से किसी का जाति-समुदाय नहीं बदल देंगे. मैंने नाटक देखा है, तभी ऊपर का कमेंट लिखा है. जिसके बाद से राउत चुप हैं. 19 घंटे पहले • पसंद

Satyabrata Rout Rout ko aap kitna jante hain Pankaj ji? Aur Rout ka simit budhi bhi dushron se kahin jyada hai. Agar kabhi mulaqat ho to jaan bhi jayenge. Mujhe choop karakar kya hasil karna chahatein hain? Main choop isliye nahin hun ki aap se mujhe daarlagraha hai.. main aise rangkarma nahin kiya hun. Ghat ghat ka pani pee kar bada hua hun... Ye duniya jaan ti hai...Patanahin aap ko malum hai ya nahin. Mera ek nischit sooach hai, bichar hai.. Natak ki kitni gahrai ko naapein hai aap? political aspect to ek ayaam hai... is ke ilawa bahut kuch hai... Mera nazariya nischit roop se aap se alag hoga. Kyon apni ankho mein mujhe taultein hai aap? Mera kaam tha natak karna aur samajh ke saath karna...so kar diya...Baki bahas karna mera kaam nahin na ki aap ka prashna ka uttar dena... Isliya abtak choop tha. Mera paas waqt nahin hai sirf is par baat kar ne ko. Aur bhi bahut kaam hai jeevan main. Isliye aap ka prashna ka jawab nahi diya tha. Par main abhi bhi kahta hun Eklavya ka learning aspect mereliye jyada mahatwapurna tha kyon ki main us aspect ko jyada samajh patahun. Dushre kai ayaam ho sakte hain. Uspar aap ek dushra Eklavya likhiye aur kheliye. Meri sooch muhje mubaraq ho. Aap kyon paresaan ho rahain hai? Mereliye Rangkarm sirf political propagation nahin hai... aur bahut kuch hai... main ek teacher hun aur duniya janti hai ki ek achha teacher hun.. aap mane ya na mane... Meri apni drishti hai.. apni ankhon se dekhta hun aur dekhunga... Kisi ko usse koi problem ho to main mafi chahunga. Eklavya kisi ka niji sampatti nahin hai. O' Hindustan ka dharohar hai...Uspar saab ka HAQ HAI. Iske baad meharwani kar ke ye superficial FB ka bahash band kijiye. Bahash karna hai to seminar mein bula lijiye yaa phir amne samne karte hai na! 9 घंटे पहले • पसंद • 4

Satyabrata Rout : Bura lage to muaf kar dijiye.> 9 घंटे पहले • पसंद

Satyabrata Rout : Aap ka mitra Satyabrata Rout 9 घंटे पहले • पसंद

Satyabrata Rout : Aur agar Script main koi kami hai to writer ka phone no. de deta hun baat karlijiye... Name: KULDEEP KUNAL, Delhi Ph. no: +91-9891419707, ok? 9 घंटे पहले • पसंद

Hasan Khan : I do respect Your point of view Sir. 9 घंटे पहले • पसंद

Praveen Rao : apni baat kehna aur prabhaavi roop se kehna..dradh nischit ho aur apni jeet kar..aise rangkarmi ko salam...i think caste n creed r very much relevant in contemporary times sir..hats off to u 4 saying n depicting d issue loud n clear..salute d mr.ROUT.. 8 घंटे पहले • पसंद

Satyabrata Rout : You are right Praveen! Thank you. 8 घंटे पहले • पसंद

Ak Pankaj : मैंने जो सवाल उठाए. आपने उनमें से किसी का जवाब नहीं दिया. मैं वैचारिक सवाल कर रहा हूं और आप व्यक्तिगत ढंग से कह रहे हैं कि आपने ‘घाट-घाट का पानी’ पिया है. बुरा न माने राउत जी मैं आपकी पूरी यात्रा को जानता हूं. लेकिन व्यक्तिगत बात नहीं करना चाहता. कन्नड़ के ही एम गोविंद पै का नाटक ‘हेब्बेरळु’ (1946) पढ़िए. एम गोविंद पै को राष्ट्रकवि कहा जाता है. पढ़िए ‘हेब्बेरळु’ में उन्होंने एकलव्य को भील आदिवासी मानते हुए कैसे चित्रित किया है. मैं भी रंगकर्मी हूं लेकिन अपने नाटक में किसी समुदाय की जाति बदलने का काम नहीं करता. ऐसा करने का हक भी नहीं है किसी को.

खैर, आप ताजमहल को व्हाइट हाउस नहीं बोल सकते और न व्हाइट हाउस को ताजमहल. जैसे आप राउत हैं तो राउत ही रहेंगे. यदि मैं आपकी जाति बदल दूं तो आपको कैसा लगेगा? आज तक किसी ने अभिमन्यू जैसे मिथकीय चरित्र को अछूत बना कर पेश नहीं किया लेकिन एकलव्य चूंकि आदिवासी है इसलिए उसके पहचान के साथ कुछ भी खिलवाड़ किया जा सकता है? अफसोस! इसके जवाब में मेटा अवार्ड का विजयी निर्देशक यह बता रहा है कि वह कितना पहुंचा हुआ और ‘घाट-घाट का पानी पीया’ हुआ है. और एकलव्य यदि धरोहर है तो उस धरोहर के साथ छेड़छाड़ मत कीजिए. सांस्कृतिक हंट मत कीजिए आदिवासियों का. 4 घंटे पहले • पसंद

Ak Pankaj : जहां तक आमने-सामने बहस करने की बात है तो हमने आपको एकलव्य का मंचन करने और नाटक पर बात करने का आमंत्रण पहले ही दिया था. पर रांची से गुजरते हुए भी आप नहीं आए. 4 घंटे पहले • पसंद

और अंततः Stage Impressions ने Satyabrata Rout के पक्ष में पॉलटिक्स करते हुए क्या कहा -

Stage Impressions : Thanks Ak Pankaj for writing in. You have made your views amply clear and Satyabrata Rout has responded equally lucidly, but this discussion seemed to have reached a logical end (at least in this forum). Any political agenda (re: cultural genocide etc) that you may have remains outside the scope of this page. We reserve the right to remove any further comment in this regard.

Friday, March 15, 2013

जोर-जबर्दस्ती के खिलाफ थिएटर आगे आये.



दारियो फो का संदेश: विश्व रंगमंच दिवस 2013
(इटली के व्यंग्यकार, नाटककार, नाट्य-निर्देशक, अभिनेता, संगीतकार, नोबल पुरस्कार विजेता)

बहुत समय पहले सत्ता ने कमेडिया दे ला आर्ट के अभिनेताओं को देश से बाहर निकाल कर उनके विरुद्ध अपनी असहिष्णुता को संतुष्ट किया. आज ऐसे ही संकट के कारण अभिनेताओं और थियेटर कंपनियों के लिए सार्वजानिक मंचों, प्रेक्षागृहों और दर्शकों तक पहुंचना कठिन हो गया है .शासकों को अब उन लोगों से कोई समस्या नहीं है, जो विडंबना और व्यंग्य की अभिव्यक्ति करते हैं क्योंकि न तो अभिनेताओं के लिए कोई मंच है और न ही दर्शक, जिसे संबोधित किया जा सके. इसके उलट पुनर्जागरण के दौर में इटली का सत्ताधारी वर्ग हास्य-व्यंग्य कलाकारों को दूर रखने के लिए विशेष प्रयास करने पर बाध्य हुआ क्योंकि ऐसे प्रदर्शन जनता में बहुत लोकप्रिय थे.

यह तो सर्वविदित है कि कमेडिया दे ला आर्ट के कलाकारों का बड़ी संख्या में बहिर्गमन सुधार्रों की गति को विपरीत दिशा में ले जाने वाली सदी में हुआ, जब सभी रंगकर्म स्थलों को ध्वस्त करने का आदेश दिया गया . विशेष तौर पर रोम में, जहाँ उन कलाकारों पर पवित्र नगर को अपमानित करने का आरोप लगाया गया .1697 में पोप इनोसेंट बारहवें ने रूढ़िवादी बुर्जुआ पक्ष और प्रतिनिधि पादरी समूह के अड़ियल रवैये व लगातार बढ़ते दबाव में तार्दिनोना थियेटर को तोड़ने का आदेश दिया, जहाँ नैतिकवादियों के अनुसार सबसे अधिक अश्लील प्रदर्शन हुए.

सुधार के क्रम को उलट दिए जाने वाले समय में उत्तरी इटली मे सक्रिय कार्डिनल कार्लाे बोरोमियो ने ‘मिलान की संतानों को’ शैतान और पाप से बचाने के लिए कला को आध्यात्मिक शिक्षा का सबसे उच्च स्वरुप और थियेटर को धर्म विरोधी, ईश निंदा और अहंकार के प्रदर्शन का केन्द्र बताया. अपने सहयोगियों को लिखे एक पत्र के माध्यम से, जिसे मैं अनायास ही उद्धृत कर रहा हूँ, उसने अपने को कुछ इस तरह से अभिव्यक्त कियाः ‘‘शैतानी ताक़तों का विनाश करने के अपने सरोकारों को ध्यान में रखते हुए हमने घृणित संभाषणों से भरे पाठ्यांशों को जलाने, आम जनता की स्मृतियों से उन्हें मिटाने और साथ ही ऐसे लोगों पर जो इन पाठ्यांशों को प्रकाशित कर जनता तक पहुंचाते हैं अभियोग चलाने के सभी संभव प्रयास किये. फिर भी यह स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है कि जब हम आराम से थे, शैतान अपने नवीनतम षड़यंत्रों और चालाकियों के साथ पुनः सक्रिय हुआ. आँखें जो देखती हैं, वह इन किताबों को पढ़े जाने की तुलना में कहीं अधिक गहराई से आत्मा को प्रभावित करता है! किशोरों और युवतियों के मस्तिष्क के लिए किताबों में छपे मृत शब्दों से कितने अधिक विध्वंसकारी हैं उपयुक्त भाव-भंगिमाओं के साथ बोले जाने वाले शब्द. अतः अपने शहरों को थियेटर करने वालों से मुक्त कराना नितांत आवश्यक है ठीक उसी तरह जैसे हम अनचाही आत्माओं से पीछा छुड़ाते हैं.’>

इस तरह संकट का हल इसी आशा पर टिका है कि हमारे और युवा नाट्य प्रेमियों के निर्वासन की मुहिम चले तथा हास्य-व्यंग्य कलाकारों, रंगमंच की तामीर करने वालों को नया समूह उससे निश्चित रूप से अकल्पनीय लाभ तलाशे एवं इस जोर-जबर्दस्ती के खिलाफ नये प्रतिनिधित्व के रूप में आगे आये.

इन्टरनेशनल थियेटर इंस्टीट्यूट आई0 टी0 आई0, पेरिस विश्व रंगमंच दिवसः 27 मार्च, 2013
हिंदी अनुवाद: अखिलेश दीक्षित

Thursday, November 15, 2012

बहुभाषिक नहीं होने के खतरे


- गिरीश कारनाड

हमारी शिक्षा व्यवस्था का एकल भाषा आधारित होना बहुत ही भयानक है. जहां स्कूलों में बच्चे अंततः एक ही भाषा ‘अंग्रेजी’ में सीखने को बाध्य हैं. आखिर हमारे स्कूलों में सीखने का माध्यम एक ही भाषा क्यों है? मैंने अंग्रेजी दसवीं के बाद पढ़ी. बहुभाषिकता की योग्यता का तेजी से क्षरण बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण है. जबकि बच्चों में एक से अधिक भाषाओं के सीखने की क्षमता होती है और जो लोग बॉर्डर पर रहते हैं वे सब बहुत ही सहजता से कई भाषाएं बोल-समझ लेते हैं. बहुभाषिक होते हैं. यह कैसी बहुभाषिक विचित्र स्थिति है कि एक ओर जहां क्षेत्रीय भाषाओं में अनेको सेटेलाइट चैनल हैं तो वहीं दूसरी ओर अंग्रेजी सीखने और रोजगार की भाषा बनकर सभी भारतीय भाषाओं को लीलता जा रहा है. यह एक विरोधाभासी सचाई है कि एक ओर तो हमारी मातृभाषाएं ‘हंस और रो’ रही हैं जबकि हम अपने बच्चों को अंग्रेजी स्कूलों में भेजने की होड़ में लगे हैं ताकि वे मौजूदा रोजगार के बाजार में फिट हो सकें.

औपनिवेशिकरण ने हमारे जीवन और कलाओं पर गहरा प्रभाव डाला है. जाति के प्रति हमारी समझ, संस्कृति, कला और भाषा के जिन विचारों और अवधारणाओं के बीच हम रह रहे थे उसके नये मूल्यांकन को अंग्रेजी ने बहुत हद तक प्रभावित किया है. हम देखते हैं कि जहां नृत्य और संगीत जैसे कुछ कला रूप जटिल औपनिवेशिक संवाद के कारण और तेजी से विकसित होते हैं जबकि स्थापत्य एवं चित्रकला अपना आधार खो देते हैं. रंगमंच पर शेक्सपीयर का प्रभाव व्यापक तौर पर पड़ता है और पचास के दशक तक हमें ऐसी प्रभावशीलता वाला कोई भारतीय नाटक नहीं दिखाई देता. टैगोर जितने महान कवि हैं उतने ही महान नाटककार नहीं हैं. उनके नाटक दोयम दर्जें के हैं. उनके लिखे नाटकों में से कुछ ही नाटक पर काम हुआ है। बीते 50 साल में भारत ने बादल सरकार, मोहन राकेश और विजय तेंदुलकर जैसे तमाम नाटककार पैदा किए हैं. वे टैगोर से कहीं बेहतर हैं.

औपनिवेशिक आधुनिकता के कारण ही तकनीक के नये रूपों से हमारा परिचय हुआ जैसे कि पिं्रटिंग और फिल्म. लंबे समय तक गीत, संगीत और नृत्यों के भरमार की वजह से भारतीय फिल्मों की आलोचना की जाती रही है. पर ध्यान देने वाली बात है कि इसी एक विशेषता ने भारतीय फिल्मोद्योग को ‘हॉलीवुड की खुराक’ बनने से बचा लिया. जबकि यूरोपीयन सिनेमा हॉलीवुड से बच नहीं पाया. हां, सही है कि भारतीय सिनेमा ‘टाइटेनिक’ नहीं बना सकता. पर यह भी सच है कि हॉलीवुड भी ‘हम आपके हैं कौन’ का निर्माण नहीं कर सकता.

- अजीम प्रेमजी युनिवर्सिटी, मुम्बई में 8 नवंबर 2012 को दिए गए व्याख्यान का अंश. अनुवाद एवं प्रस्तुति: रंगवार्ता source : http://www.thehindu.com/news/states/karnataka/bemoaning-the-loss-of-bilingualism/article4078293.ece

Monday, September 17, 2012

जिंदगी से जुड़े बगैर अच्छा नाटक नहीं लिखा जा सकता


महेश दत्ताणी भारतीय नाटककारों में अग्रणी स्थान रखते हैं। 'फाइनल सॉल्यूशंस', 'डांस लाइक अ मैन', 'तारा' और 'थर्टी डेज इन सेप्टेंबर' जैसे नाटकों ने न सिर्फ उन्हें दुनिया भर में ख्याति दिलाई, बल्कि भारतीय रंग परिदृश्य पर गहरा असर भी डाला है। अभी कुछ दिनों पहले वह भोपाल नाट्य विद्यालय, मध्यप्रदेश के दीक्षांत समारोह में भाग लेने के लिए भोपाल गए थे। उनसे राजेश चन्द्र की बातचीत:

पिछले 20-25 वर्षों में आपकी नजर में भारतीय रंगमंच ने क्या खोया और क्या पाया है?

भारतीय रंगमंच एक बहुत बड़ा क्षेत्र है। हर प्रदेश में कई तरह के काम हो रहे हैं। मैं अपने नजरिए की बात करूंगा। इधर एक कोशिश रिवाइवल की मुझे जरूर दिखाई पड़ती है। जो फॉर्म लुप्त हो रहे हैं, उन्हें बचाने की कोशिश हो रही है, पर इतना करना ही काफी नहीं है। हम अपनी लोक नाट्य परंपराओं को आगे नहीं बढ़ा पा रहे। बैले जो पचास साल पहले था, हम उसमें किसी तरह का बदलाव नहीं ला सके। यह उनकी सेहत के लिए अच्छा नहीं है। परंपरा रिवाइव हो रही है, उसमें निरंतरता है, यह बात मुझे बहुत अच्छी लगती है।

पिछले 50 वर्षों के रंगमंच को भारतीयता की खोज का रंगमंच कहा जा रहा है। इस विषय में आप क्या सोचते हैं?

यह सब मुझे बहुत बनावटी नजर आता है। असल में भारतीयता की खोज एक राजनीतिक मुद्दा है। यह सांस्कृतिक मुद्दा नहीं है। भारत, अफगानिस्तान या पाकिस्तान की सांस्कृतिक पहचान क्या अलग-अलग है? मुझे यह विचारधारा काफी पिछड़ी हुई लगती है। आज दुनिया भर में देशों की सीमाएं खत्म हो रही हैं। असल में भारतीयता का नारा देश को हिंदुत्व की लाइन पर आगे बढ़ाने के मकसद से ही लगाया जा रहा है। और लोग हैं कि बिना उसकी असलियत को समझे ही उसकी रौ में बहे चले जा रहे हैं।

नाटक लिखते वक्त क्या आप किसी विशेष दर्शक वर्ग को ध्यान में रखते हैं? या सब स्वाभाविक ढंग से होता चला जाता है।

यह बहुत ही मुश्किल सवाल पूछा आपने। आप अगर यह सोचते हैं कि आप अपने दर्शक को सचमुच जानते-समझते हैं, तो यह आपकी एक बहुत बड़ी गलतफहमी है। यह कहना भी कि मैं तो सिर्फ अपने लिए लिखता हूं, बिलकुल गलत होगा। मेरी व्यक्तिगत इच्छा तो यह है कि मैं अपनी अभिव्यक्ति की आजादी का ज्यादा से ज्यादा जनता के मुद्दों को उठाने में उपयोग करूं। मुझे भी अच्छा लगता है जब मेरे नाटकों को देखने बड़ी संख्या में दर्शक पहुंचते हैं और उनकी सराहना भी करते हैं।

नाटक लिखना आपके लिए कविता, कहानी या उपन्यास जैसी दूसरी विधाओं में लिखने से किस तरह अलग है?

यह बहुत अलग है। सच बात यह है कि नाटक की अंतिम यात्रा कागज पर नहीं मंच पर है। यह याद रखना पड़ता है कि आपके बाद भी कई लोग आएंगे जो उसमें काफी कुछ जोड़ सकते हैं। इसलिए आप उसे किसी बंदरिया के बच्चे की तरह चिपटाकर नहीं रख सकते। नाटककार नाटक के लिए मां की तरह है, जिसकी सोच यही होती है कि उसका नाटक फले-फूले, विकसित हो, उसका निरंतर विकास होता रहे। नाटक लिखते समय इन चीजों का ध्यान रखा जाना जरूरी होता है।

पारंपरिक नाट्य रूपों के तेजी से बढ़ते इस्तेमाल पर क्या कहना चाहेंगे?

यह सब ग्रांट मिलने की वजह से हो रहा है। लोग अनुदान में मिलने वाले पैसों के कारण किसी परंपरागत नाट्य शैली को पकड़कर काम करना चाहते हैं। इसके मूल में सिर्फ व्यावसायिकता है। यह बात अलग है कि वे ऐसा भ्रम जरूर फैलाए रखते हैं मानो सांस्कृतिक परंपरा को बचाने का महान काम कर रहे हैं।

आज भी अच्छे और गंभीर नाटकों के लिए हमें दुनिया की दूसरी भाषाओं की तरफ जाना पड़ता है। नाटक की ओर हमारी हिंदी के लेखकों का झुकाव क्यों नहीं है?

मुझे यह कहते हुए शर्म आती है कि मैं अंग्रेजी में नाटक लिखता हूं। पर यह मेरी मजबूरी है। दूसरी भाषाओं में लिखने वालों को उतना महत्व नहीं मिलता। सामाजिक क्षेत्र में जो बाधाएं हैं, उन्हें मिलकर ही समाप्त किया जा सकता है। यह समझना होगा कि हमें जड़ों के साथ शाखों और पत्तों की भी उतनी ही जरूरत है। लेखक के लिए जरूरी है कि वह खुद को अपने समाज का साक्षी समझे, उसका भागीदार समझे, उसके संस्कारों से जुड़े। जब तक हम जनता की जिंदगी से, उस जिंदगी की सच्चाइयों से खुद को नहीं जोड़ेंगे, अच्छा नाटक कैसे लिख पाएंगे? गुफाओं में बैठकर कविता तो लिखी जा सकती है, नाटक नहीं।

अभी किस विषय पर काम कर रहे हैं?

इन दिनों दो नाटक लिखे हैं - एक लिंलेट दुबे को दिया है जो नवंबर में शुरू होगा। एक और नाटक है जो मैं खुद निर्देशित करूंगा। एक निर्देशक के तौर पर मुझे उसमें बहुत दिलचस्पी है। मुंबई में जो हालत है, लोग यह दिखाने की कोशिश करते हैं कि वे सफल हैं, पर असलियत कुछ और ही होती है। 'द बिग फैट सिटी' नाटक नवंबर में शुरू करूंगा, जिसे फरवरी तक मुंबई में ओपन करने की योजना है। मैं एक फ्रीलांसर हूं। मुझे किसी के साथ बंधने में घुटन होती है। बंधकर आप संगठन की सेवा कर सकते हैं, नाटक की नहीं।

(नवभारत टाइम्स | Sep 8, 2012 से साभार)

Sunday, August 26, 2012

भाजपाई विरोध के चलते भोपाल में ‘तमाशा न हुआ’


23 अगस्त, 2012: भारतीय जनता पार्टी की निगाह में जनतंत्र और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए कितनी जगह है, इसका अंदाजा भोपाल की ताजा घटना से लगाया जा सकता है। वहां भारत भवन में रंगमंडल थिएटर उत्सव के दौरान बीते शनिवार की शाम भानु भारती के निर्देशन में ‘तमाशा न हुआ’ नाटक का मंचन था। रवींद्रनाथ ठाकुर के प्रसिद्ध नाटक ‘मुक्तधारा’ पर आधारित इस नाटक में विभिन्न पात्रों के कुछ संवाद भाजपा के सांस्कृतिक प्रकोष्ठ के संयोजक को इतने आपत्तिजनक लगे कि उन्होंने उसे राष्ट्रविरोधी तक घोषित कर डाला और मामला उच्चाधिकारियों तक ले जाने की बात कही।

इसके पहले भाजपा ने ‘नील डाउन ऐंड लिक माइ फीट’ नाटक पर भी आपत्ति जताते हुए उसे ‘पवित्र’ भारत भवन में मंचित होने से रोक दिया था। मध्यप्रदेश में भाजपा की सरकार है, इसलिए शायद उसके कार्यकर्ताओं को अपने मन-मुताबिक सांस्कृतिक पहरेदारी करने में सुविधा हो सकती है। लेकिन जिस तरह वे ‘तमाशा न हुआ’ नाटक को राष्ट्रविरोधी बता कर उसके खिलाफ वितंडा खड़ा करने में लगे हैं, वह किसी के गले नहीं उतर रहा। यह नाटक देश के अलग-अलग हिस्सों में कई बार मंचित हो चुका है और हर बार उसकी सराहना हुई है। इसमें ‘मुक्तधारा’ के पूर्वाभ्यास के बहाने गांधीवाद, मार्क्सवाद, रवींद्रनाथ ठाकुर के विचार, यांत्रिकता, मनुष्य, प्रकृति और विज्ञान के बीच संबंधों पर किसी भी खास विचारधारा में बंधे बिना निर्देशक और पात्रों के बीच गंभीर बहस होती है। कोई भी सुलझा हुआ व्यक्ति ऐसी बहस को एक स्वस्थ और जनतांत्रिक समाज की निशानी मानेगा। लेकिन भाजपा के सांस्कृतिक पहरुओं को केवल एक बात याद रह जाती है कि इसमें एक जगह भारत-बांग्लादेश सीमा पर फरक्का बांध और चिनाब नदी पर बगलिहार पनबिजली परियोजनाओं के कारण बांग्लादेश और पाकिस्तान के नागरिकों के सामने पैदा होने वाले संकट की चर्चा की गई है। सिर्फ इसी वजह से भाजपा ने इस नाटक को यहां के बजाय पाकिस्तान में मंचित करने की सलाह दे डाली।

विचित्र है कि जिन बहसों और बातचीत से एक प्रगतिशील समाज की बुनियाद मजबूत होती है, वे भाजपा के अनुयायियों को राष्ट्रविरोधी लगती हैं। सवाल है कि क्या वे ऐसा समाज चाहते हैं जहां विचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और बहस के लिए कोई जगह नहीं होगी? अब तक आमतौर पर आरएसएस से जुड़े बजरंग दल, विश्व हिंदू परिषद या श्रीराम सेना जैसे कट््टरपंथी धड़े ऐसी असहिष्णुता दर्शाते रहे हैं। मकबूल फिदा हुसेन के चित्रों की प्रदर्शनी से लेकर कला माध्यमों में मौजूद प्रगतिशील मूल्य उन्हें भारतीय संस्कृति के लिए खतरा नजर आते हैं और उनका विरोध करने के लिए वे हिंसा का सहारा भी लेते रहे हैं। लेकिन सच यह है कि खुद भाजपा भी भावनात्मक मसलों को अपनी राजनीति चमकाने के लिहाज से फायदेमंद मानती रही है, इसलिए उन्हें मुद्दा बनाने का वह कोई मौका नहीं चूकती। सत्ता में आने पर अपने एजेंडे पर अमल करना उसके लिए और सुविधाजनक हो जाता है।

गौरतलब है कि मध्यप्रदेश में संस्कृति की रक्षा के नाम पर सभी सरकारी और स्थानीय निकायों में ‘वंदे मातरम’ का गायन अनिवार्य कर दिया गया है, स्कूल-कॉलेजों में फैशन शो पर पाबंदी लगा दी गई है और करीब एक दर्जन शहरों को पवित्र घोषित करके वहां खाने-पीने की चीजों को लेकर कई तरह के फरमान जारी किए गए हैं। देश की जनतांत्रिक राजनीति में खुद को एक ताकतवर पक्ष मानने वाली भाजपा को यह सोचना चाहिए कि अभिव्यक्ति की आजादी का सम्मान करना उसका पहला दायित्व है।

जनसत्ता, दिल्ली से साभार

Sunday, August 12, 2012

आईना ढूंढे है अपना चेहरा


संजय कृष्ण
एक सार्वकालिक प्रश्न यह है कि हिंदी लेखकों की तरह हिंदी का रंगकर्मी भी अपने ही समाज से दूर है। यह बात बांग्ला, मराठी, मणिपुरी या तमिल रंगमंचों के साथ नहीं हैं। जिन्होंने एक्सआइएसएस में तीन दिनों तक नाटकों को देखा होगा, उन्हें इस बात का बखूबी एहसास होगा कि रंगमंच विरोध का सबसे ताकतवर हथियार है।
रांची के रंगमंच पर बात करना आसान नहीं। रांची की जो बनावट और बुनावट है, संस्कृतियों का जो घालमेल है, उससे रांची का कोई अपना चेहरा नहीं बनता। आठ दशकों से ऊपर रंगमंच की यात्र में न जाने कितने पड़ाव आए, लेकिन कोई एक चेहरा मुक्कमल नहीं बन पाया है, जबकि आधा दर्जन नाट्य संस्थाएं रह-रह कर सक्रिय रही हैं। आज भी कुछ संस्थाएं सक्रिय हैं, जो रह-रहकर अपनी उपस्थिति दर्ज कराती हैं।
पांच-सालों के दौरान 2012 का यह साल इस मामले में काफी खुशकिस्मत रहा। अखड़ा ने मार्च में तीन दिनी नाट्योत्सव का आयोजन कराया। अजय मलकानी की संस्था युवा रंगमंच ने भी जून में तीन दिनों तक वैरागी मन हारा का मंचन किया। केंद्रीय पुस्तकालय में रंगवार्ता ने विभारानी की एकल प्रस्तुति का आयोजन कराया, लेकिन अजय मलकानी की प्रस्तुति में दर्शकों का टोटा रहा तो केंद्रीय पुस्तकालय में पहली बार लोगों ने सौ-सौ रुपये सहयोग देकर नाटक देखा। एक्सआइएसएस के हॉल में भी अखड़ा के तीन दिनी उत्सव में दर्शकों की कोई कमी नहीं रही। क्यों? रंगकर्मी बार-बार दर्शकों का रोना रोते हैं।
यह समस्या पूरे हिंदी पट्टी में है। रांची इससे अछूती नहीं है, लेकिन यह सवाल जरूर उठता है कि आखिर एक नाटक को देखने के लिए लोग पैसा देकर जाते हैं, दूसरे में नहीं। मलकानी ने तीन दिनों तक एक ही नाटक का मंचन किया। लेकिन उसका व्यापक प्रचार-प्रसार नहीं किया। दूसरे, जो विषय था, वह अब अप्रासंगिक है। जो दर्शकों को अपनी ओर खींच नहीं पाया।
रांची में दर्शकों की कमी नहीं हैं, क्योंकि रांची के एक कोने में विभा रानी के प्ले को देखने के लिए पूरा हॉल भर जाता है। एक सार्वकालिक प्रश्न यह है कि हिंदी लेखकों की तरह हिंदी का रंगकर्मी भी अपने ही समाज से दूर है। यह बात बांग्ला, मराठी, मणिपुरी या तमिल रंगमंचों के साथ नहीं हैं।
जिन्होंने एक्सआइएसएस में तीन दिनों तक नाटकों को देखा होगा, उन्हें इस बात का बखूबी एहसास होगा कि रंगमंच विरोध का सबसे ताकतवर हथियार है। पिछले दिनों मजलिस ने मेकॉन में एक नाटक पद्मा नदीर मांझी का मंचन कराया था। कोलकाता से टीम आई थी। आयोजक उदयन बसु ने बताया कि देखने के लिए पास सुविधा दी गई है, लेकिन सबको हिदायत भी दी गई है कि वे अपने साथ किसी और को लेकर न आएं।
उन्होंने चार सौ पास बांटे थे और इतनी ही बैठने की व्यवस्था की गई थी। नाटक संध्या छह बजे शुरू होने वाला था और हॉल सवा छह बजे भर गया। नाटक मछुआरों की जिंदगी को उकेरता है। क्या हिंदी का रंगमंच अपने लोगों की आवाज बन पाया है? क्या वह अपने लोगों को अपने साथ जोड़ पाया है? हिंदी लेखकों-आलोचकों की तरह वायवीय होकर अपना चेहरा नहीं ढूंढ सकता है।

Friday, July 27, 2012

चायकोवस्की आज भी क्लीन में रहते हैं


प्योतर चायकोवस्की रूस के ऐसे महान् संगीतकार हैं, जिनका नाम पूरी दुनिया में प्रसिद्ध है। जैसे दुनिया भर के लोग रूसी कवि अलेक्सान्दर पूश्किन और रूसी लेखकों लेव तलस्तोय और फ़्योदर दस्तायेवस्की को जानते हैं, वैसे ही चायकोवस्की को भी जानते हैं। लेव तलस्तोय और प्योतर चायकोवस्की भी एक-दूसरे को अच्छी तरह जानते थे। वे मित्र थे और अक्सर कला सम्बन्धी चर्चाएँ और बहसें किया करते थे। लेव तलस्तोय अक्सर चायकोवस्की की संगीत रचनाओं को अपने घर पर पियानो पर बजाया करते थे। तलस्तोय और चायकोवस्की के एक और मित्र थे —अन्तोन चेख़व। चेख़व और चायकोवस्की के बीच लम्बे समय तक पत्र-व्यवहार भी हुआ। अन्तोन चेख़व ने अपना एक कहानी-संग्रह भी उन्हें समर्पित किया था। कभी चेख़व ने चायकोवस्की के बारे में कहा था — मैं उनका इतना ज़्यादा सम्मान करता हूँ कि मैं उनके घर के दरवाज़े पर दिन और रात खड़ा रह सकता हूँ ताकि प्योतर चायकोवस्की की एक झलक पा सकूँ। अगर पूरी रूसी संस्कृति की बात की जाए तो मैं उन्हें लेव तलस्तोय के बाद दूसरे नम्बर पर रूसी कला और संस्कृति का प्रतिनिधि मानता हूँ।

19 वीं शताब्दी में चायकोवस्की के जीवनकाल में ही रूस के अन्य कलाकार, नाटककार, लेखक, अभिनेता, संगीतकार और कवि आदि भी प्योतर चायकोवस्की का बड़ा सम्मान करते थे। इसका कारण शायद यह है कि उनका संगीत श्रोता के मन की गहराइयों में पूरी तरह से प्रवेश कर जाता है और उनकी संगीत-रचना का श्रोता अपने आसपास की दुनिया को भूलकर उसी संगीत में डूब जाता है। व्यक्ति का अपना दुख, अपना सुख, अपनी पीड़ा, अपनी ख़ुशी सब चायकोवस्की के संगीत के साथ एक-मेक हो जाती हैं।

प्योतर चायकोवस्की का जन्म मई 1840 में हुआ था। उनके पिता एक खदान में इंजीनियर थे। जब चायकोवस्की सिर्फ़ पाँच वर्ष के ही थे तो उनकी माँ ने उन्हें पियानो बजाना सिखाना शुरू कर दिया और फिर पियानो ही उनका जीवन हो गया। लेकिन उनके पिता उन्हें वकील बनाना चाहते थे, इसलिए स्कूली शिक्षा समाप्त करने के बाद उन्हें कानून की पढ़ाई करनी पड़ी। सेंट पीटर्सबर्ग में वे वकालत पढ़ने के साथ-साथ संगीत में भी डूबे रहे। कानून की शिक्षा पाने के बाद वे रूस के न्याय और कानून मंत्रालय में काम करने लगे।

परन्तु 22 वर्ष की उम्र में उन्होंने कानून-मंत्रालय की अपनी नौकरी छोड़ दी और सेंट पीटर्सबर्ग के संगीत महाविद्यालय में प्रवेश ले लिया। बस, उनके जीवन में आए इसी मोड़ ने उन्हें संगीतकार बना दिया। उन्होंने नया से नया संगीत रचना शुरू कर दिया। उनकी धुनें लोकप्रिय होने लगीं और लोग उन्हें पहचानने लगे। बस, इसी तरह धीरे-धीरे वे प्रसिद्ध होते चले गए।

प्योतर चायकोवस्की ने दस ओपेरा नाटिकाओं को संगीतबद्ध किया है। उन्होंने तीन बैले-नाटिकाओं का संगीत रचा है। सात सिम्फ़नियाँ रची हैं। उनकी और भी सैंकड़ों संगीत-रचनाएँ हैं। चायकोवस्की के संगीत पर आधारित नाटिकाएँ न केवल रूस और यूरोप में, बल्कि अमरीका, जापान और चीन जैसे देशों में भी बड़ी लोकप्रिय हैं। उन्हें संगीतकारों का संगीतकार कहा जाता है।

प्योतर चायकोवस्की ज़्यादातर सेंट पीटर्सबर्ग या मास्को में रहते थे या फिर वे विदेशों के दौरे करते रहते थे। लेकिन मास्को से सौ किलोमीटर दूर क्लीन नगर में उनका अपना घर था, जहाँ पर वे एकान्त में संगीत-रचना किया करते थे। इसी क्लीन नगर में आज चायकोवस्की संग्रहालय बना हुआ है। उस घर में जहाँ वे रहा करते थे, आज भी सब कुछ वैसा का वैसा है, जैसा उनके जीवनकाल में था। सारी दुनिया के संगीतप्रेमी चायकोवस्की से मिलने और उनका घर देखने के लिए आज भी क्लीन पहुँचते हैं।

इस घर में आज चायकोवस्की नहीं रहते, लेकिन जैसे उनकी आत्मा इस घर में बसी हुई है। हर पाँच साल में एक बार मास्को में प्योतर चायकोवस्की संगीत-प्रतियोगिता का आयोजन किया जाता है, जिसमें दुनिया भर के युवा और किशोर संगीतकार भाग लेते हैं।

सन् 2015 में प्योतर चायकोवस्की की 175 वीं जयन्ती मनाई जाएगी। दुनिया भर के संगीत-प्रेमी यह चाहते हैं कि सन् 2015 के साल को 'प्योतर चायकोवस्की वर्ष' घोषित कर दिया जाए।

http://hindi.ruvr.ru/2012_07_22/82490792/ से साभार

Thursday, July 26, 2012

जहां रंगमंच पानी में बहता है


जर्मनी के हर्जोगटम लाऊएनबर्ग जिले, जिसे डची ऑफ लाऊएनबर्ग के नाम से भी जाना जाता है, में ग्रीष्म ऋतु हर साल अपने साथ उत्सवों का माहौल लेकर आती है। इन उत्सवों का संस्कृति तथा प्रकृति से गहरा संबंध है। ‘कुलतरसोमर एम कनाल’ नामक एक उत्सव वर्ष 2006 से यहां हर वर्ष आयोजित किया जा रहा है।

इस उत्सव का खास आकर्षण एक रोविंग थिएटर (पानी में बहता रंगमंच) है जिसमें दर्शकों को स्कालसी नहर में एक दृश्य से दूसरे दृश्य तक नाव को खेते हुए जाना पड़ता है। यह स्थान ऐतिहासिक कस्बे रात्जबर्ग के दक्षिण-पूर्व में स्थित है। फैस्टीवल के डायरैक्टर फ्रैंक डयूवैल के अनुसार, ‘‘यह उत्सव केवल लाऊएनबर्ग में ही आयोजित हो सकता है क्योंकि यहां प्रकृति तथा भूदृश्य उत्सव की विषय वस्तु को तय करते हैं। झीलें, जंगल तथा स्थान हर चीज अपनी कहानी कहती है जबकि संगीत, रंगमंच तथा चित्र उन्हें जरा विस्तार से समझाते हैं।’’

1300 वर्ग किलोमीटर में फैले हर्जोगटम लाऊएनबर्ग जिले का नाम मध्यकाल के डची (सामंती इलाका) ऑफ साक्स-लाऊएनबर्ग पर पड़ा है। 1864 में दूसरे स्क्लेसविग युद्ध के पश्चात इस पर फारस का कब्जा हो गया और 1876 में इसे जर्मनी के उत्तरी राज्य स्क्लेसविच-होल्सटाइन में शामिल कर लिया गया। हैम्बर्ग शहर के करीब स्थित डची ऑफ लाऊएनबर्ग की 48 झीलें तथा साकसेनवाल्ड का विशाल जंगली क्षेत्र प्रकृति की सुंदरता को निहारने के इच्छुक पर्यटकों में बेहद लोकप्रिय है।

हालांकि ग्रीष्म ऋतु में यहां की रईस संस्कृति की झलक पेश करते विभिन्न स्थानों को भी देखा जा सकता है। इनमें वोटरसन का किला भी शामिल है। लाऊएनबर्ग जिले की राजधानी रात्जबर्ग की स्थापना 1143 में हुई थी। जल्द ही यह कस्बा हैनरी द लायन के शासन का हिस्सा बन गया जिन्होंने 1165 में यहां रोमनेस्क्यू गिरजाघर का निर्माण करवाया। यह ऐतिहासिक गिरजाघर पुराने कस्बे के उत्तरी हिस्से में स्थित है। इसी गिरजाघर के प्रांगण में ए.पॉल वैबर म्यूजियम भी स्थित है। इस म्यूजियम में 300 लिथोग्राफ्स (पाषाण से उकेरे चित्र या लेख), ड्राइंग्स तथा ऑयल पेंटिंग्स प्रदर्शित हैं।

म्यूजियम में प्रदर्शित ऑयल पेंटिंग्स के कलाकारों में से अधिकतर को रात्जबर्ग के निकट स्थित एक छोटे से गांव स्करेत्सटेकेन में रहते थे। जुलाई महीने के अंत में यहां आयोजित होने वाला रासेसबर्ग बाइलाग मिडेवियल नामक रंगारंग उत्सव पर्यटकों का खूब मनोरंजन करता है जहां वाइकिंग, रोमन, नोर्मन तथा अन्य लड़ाकू वेशभूषाओं में सजे कलाकार लड़ाइयों के नकली दृश्य पेश करते हैं। यहीं एक कस्बे मोएलन में टिल यूलैनस्पीगल नामक एक मसखरा बहुत लोकप्रिय है। कुछ का मानना है कि यह महज एक काल्पनिक व्यक्तित्व है परंतु आज भी यहां के कई लोग मानते हैं कि यह नटखट तथा शरारती व्यक्ति वास्तव में हुआ करता था।

मान्यता के अनुसार सन् 1350 में मोएलन में उसकी मौत प्लेग के कारण हुई थी। वह लोगों का मजाक उड़ाने का कोई मौका हाथ से जाने नहीं देता था जिसमें वह उनकी बुराइयों, लालच तथा मूर्खता को उजागर करता था। मोएलन में वह हर कहीं दिखता है जहां टिल यूलैनस्पीगल म्यूजियम भी स्थित है। यहां एक स्थान पर उसकी प्रतिमा भी स्थापित है। मान्यता है कि इसे एक साथ दोनों तरफ से रगडऩे पर भाग्योदय होता है। इस कस्बे में प्रत्येक तीन साल पर यूलैनस्पीगल उत्सव का आयोजन भी होता है। यह उत्सव इस साल भी आयोजित हो रहा है जो 9 से 18 अगस्त तक चलेगा।

पंजाब केसरी से साभार

Tuesday, July 17, 2012

जीवन के सत्यार्थ को पेश करता ‘अगस्त: ओसेज काउंटी’


जिंदगी के उतार चढ़ाव और क्षीण भावनाओं से भरी विकट परिस्थितियों के रास्ते से होकर गुजरता है अगस्त: ओसेज काउंटी। ट्रेसी लैट्स द्वारा रचित इस अंग्रेजी नाटक का मंचन गोवा में फिल्माया गया, जिसकी पटकथा में पाश्चत्य संस्कृति को बखूबी बयान किया है लेकिन इसका भारतीय सभ्यता के मूल चित्रण के बाद यह अपनी वास्तिवकता नहीं खोता और निरंतर जीवन के हर रंगीन और काले पलों की झलक उकेरता हुआ नजर आता है। द ट्रिब्यून ट्रस्ट के सौजन्य से यहां सेक्टर 18 के टैगोर थियेटर में लिलेट दूबे द्वारा निर्देशित किए गए इस नाटक में तमाम दिग्गज थियेटर कलाकारों ने हर चरित्र को बखूबी निभाया। 135 मिनट चले अगस्त: ओसेज काउंटी में एक वेस्टन परिवार के दुख को पात्रों ने यूं बयां किया है कि परिवार के सदस्य विकट परिस्थितियों के बावजूद खुशी की तलाश करते हैं, जिसे पात्रों ने बखूबी निभाया। थियेटर कलाकार किटू गिडवानी, नीता वशिष्टï, अमर तलवार, संध्या मृदुल, सुमित्रा पिल्लई, नंदीता दूबे और स्वयं लिलेट दूबे ने एक परिवार पर मुखिया के बिछडऩे के बाद टूटे दर्द और मार्मिकता को बयां किया है। वेस्टन परिवार सभ्यता और भावुकता के मिश्रण को सत्यार्थ करता है। लियोन परिवार का मुखिया है। वह पांच दिन से गायब है। उसके इंताजर में सारा परिवार दुखी भी है और बेहद भावुक भी है। लेकिन उसकी मौत की खबर सबको भीतर तक तोड़ देती है। कहानी शमशानघाट से मुड़ती है, जहां से लियोन के परिवार को रिश्तेदार ढांढस बंधाते हैं, साथ ही परिवार को कटीली आंखों से भी देखते हैं। क्योंकि तमाम बुराइयां इस परिवार का पीछा नहीं छोड़े हुए थी। लियोन पत्नी वोलेट अपने शौख अंदाज में पति की मौत को भूलाने का प्रयास करती है। नाटक में उसकी तीन बेटियों के चरित्र भी बेहद प्रेरक हैं जो परिवार के मुखिया के बिछडऩे के बाद हर परिस्थिति का सामना खुशी खुशी करते हुए करती हैं। वे मां से आहत भी हैं। (दैनिक ट्रिब्यून 15 जुलाई से साभार)

Wednesday, July 11, 2012

हर क्षेत्र में, हर भाषा में नाट्य प्रशिक्षण की व्यवस्था होनी ही चाहिए - कारंत


रंगकर्मी ब॰ व॰ कारंत अब हमारे बीच नहीं हैं। लेकिन न सिर्फ़ हिंदी और कन्नड़ बल्कि भारतीय रंगमंच में उनका जो अवदान है वह न सिर्फ़ अविस्मरणीय है, मील का पत्थर भी है। संगीत भी वह साधते थे और कहते थे कि नाटक पॉपुलर होना बड़ी बात नहीं है, बड़ी बात है गर्मी पैदा करना। वह जब आखि़री बार लखनऊ आए थे तो एक नाट्य प्रतियोगिता में शिरकत के लिए। उनकी सादगी और सक्रियता देखते बनती थी। तभी राष्ट्रीय सहारा के लिए ब॰ व॰ कारंत से दयानंद पांडेय ने एक ख़ास बातचीत की थी। पेश है वह बातचीत:


प्रसिद्ध निर्देशक और रंगकर्मी ब॰ व॰ कारंत का कहना है कि मैं हीरो वाले नाटकों को बहुत कम पसंद करता हूं। मैं करता नहीं। अब कि जैसे भारतेंदु का अंधेर नगरी चौपट राजा नाटक मैंने किया। इसमें कोई हीरो नहीं। इसमें सरकारी तंत्र पर जो व्यंग्य किया गया है, इस नाते यह हमेशा प्रासंगिक रहता है। ‘कल्लू बनिए को पकड़ लाओ जी’ जैसे संवादों के मार्फत अंधेर नगरी सिर्फ़ हास्य नाटक नहीं, व्यंग्य हो जाता है। और आज के हालात पर, त्रासदी पर इससे सटीक व्यंग्य मुझे नहीं दिखता।

कारंत कहते हैं कि इसी तरह कालिदास की शकुतला मेरे लिए आज भी प्रासंगिक है। क्यों कि दुष्यंत आज भी शकुंतला को धोखा देता मिलता है। डेढ़ सौ साल पहले का यह नाटक है। पर शकुंतला पुरूष के लिए आज भी जंगली चीज़ है। शुरू में जब राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में मैंने इन नाटकों को उठाया तो इन नाटकों के बारे में बहुत सारी शंकाएं उठाई गईं। अब पाता हूं कि मेरी बहुत सारी पुरानी धारणाएं निरंतर टूटती जाती हैं। खैर इस पर बात ज़रा आगे। पहले हम लोग कहते थे कि नाटक करना पैदाइशी है। पर अब मानते हैं कि सीखना चाहिए। और फिर भी इस सबके बावजूद भरतमुनि से आगे हम नहीं बढ़ पाए हैं। खुशी है इस बात की। तो माडर्न नाटक क्या है? मेरे लिए अंतर नहीं पड़ता कि आज का नाटक तुगलक है कि कल का शकुंतला ! बस प्रासंगिकता रहनी चाहिए। तो नाटक में ट्रेनिंग ज़रूरी है कई बार तात्कालिक चीज़ों पर भी नाटक ठीक लगते हैं। जैसे मंडल आंदोलन चला तो उस पर भी नाटक हुए। गिरीश कर्नाड ने भी नाटक लिखा कन्नड़ में तलदंडा। फिर घासी राम कोतवाल, हयवदन बिलकुल भिन्न नाटक हैं। दरअसल, रंगमंच में समकालीनता की तलाश हो रही है। यह आज का ट्रेंड है। पर दिक्क़तें भी कई हैं। रंगमंच से संबंधित पत्रिकाएं पहले चलती थीं। और म्यूज़िकल कंसेप्ट की भी। नटरंग, नाट्य शोध आज भी है।

कारंत कहते हैं कि मैं माडर्न थिएटर नहीं मानता। समकालीनता को मानता हूं। जैसे महेश दत्तानी लिखते अंगरेज़ी में हैं पर समस्या हिंदुस्तानी लेते हैं। जाति-पांति का सवाल है। ये सारे सवाल अब नाटक में देखे जा सकते हैं। हां, तकनीक वेस्टर्न ले सकते हैं, कैसेट जैसी तकनीक लेना भी ग़लत नहीं है। किसी चीज़ को वेस्टर्न कह कर नहीं फेंक सकते। वस्तुतः रंगमंच का स्वरूप वेस्टर्न से काफी प्रभावित है। ब्रेख्त की बात करते हैं तो संसार के रंगमंच की भी बात करते हैं। रंगमंच में कमियां भी बहुत हैं हमारे। क्यों कि हिंदुस्तान में बहुत सी भाषाएं हैं। तो भाषागत विविधता होते हुए भी प्रशिक्षण के लिए एक ही स्कूल है नेशनल स्कूल ऑफ़ ड्रामा। यह ठीक नहीं है। हर क्षेत्र में, हर भाषा में नाटक की ट्रेनिंग की व्यवस्था होनी ही चाहिए। पर दिक्क़त यह है कि आंध्र का कोई लड़का एन.एस.डी. में नाटक सीखने आता है तो अपनी भाषा से कट जाता है। जबरदस्ती हिंदी सीखनी पड़ती है। तो उसका सारा ध्यान नाटक से हट कर हिंदी पर आ जाता है। होना यह चाहिए कि देश के हर विश्वविद्यालय में नाटक पढ़ाने की व्यवस्था वहां की भाषा में ही होनी चाहिए। देश में सैकड़ों विश्वविद्यालय हैं पर अभी सिर्फ़ चालीस विश्वविद्यालयों में ही नाटक पढ़ाया जाता है। थिएटर में विश्वविद्यालयों का योगदान बहुत कम है। हालांकि थिएटर के लिए दो विश्वविद्यालय इन दिनों बहुत अच्छा काम कर रहे हैं। एक त्रिचूर में और एक चंडीगढ़ में। एन.एस.डी. ने भी ब्रांचेज़ खोलने की कोशिश की। बेंगलूर में खोला। पर सरकार नाटक को महत्व नहीं देती। स्थिति यह है कि हमारे केंद्रीय बजट में संस्कृति पर सरकार सिर्फ़ 0.03 प्रतिशत ही खर्च करती है। तब जब कि दूसरे देशों में ठीक इसका उलटा है। लंदन में भाषा एक है। पर थिएटर सिखाने के लिए 16 संस्थाएं हैं।

कोई भाषा, कोई एक्टिंग, कोई संगीत ऐसे ही और कई चीज़ें वहां सिखाई जाती हैं। पर आप के लखनऊ में? भारतेंदु नाट्य अकादमी होते हुए भी हिंदी पर कितना काम हो रहा है। मैं नहीं समझता। बात एन.एस.डी के पुराने हो जाने की चली तो कारंत बोले, हम नहीं कह सकते कि एन.एस.डी. बुढ़ऊ हो गई संस्था है। नए-नए लोग आ रहे हैं। आज कल वर्कशाप ओरिएंटेड नाटक भी बहुत हो रहे हैं। अब वेस्टर्न में भी ऐसी ही रेपेट्री चलने लगी हैं। यह एक नया ट्रेंड है। एन.एस.डी. दिल्ली, भोपाल, रंगमंडल और बेंगलूर रंगमंडल अच्छा काम कर रहे हैं। आज भले गली-गली में नाटक न खेला जा रहा हो। पर चर्चा हो रही है।

थिएटर और मीडिया से कम्पेयर की जब बात चली तो कारंत का कहना था कि टी.वी. से ख़तरा है। थिएटर की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं है। कोई भी समझदार आदमी थिएटर पर ध्यान नहीं दे रहा है। सेमिनार हो रहा है पर गर्मागर्मी नहीं। ठंडा हो गया है माहौल। टी.वी. का जाल इतना घना है कि असर पड़ गया है। इसी लिए नाटक कम हो गए। बड़े शहरों में नाटक नहीं हो रहा है। पर गांवों में हो रहा है। रंगमंच संबंधी लाइब्रेरी नहीं के बराबर हैं। एक एन.एस.डी. के पास है, दूसरा मेरे पास है। मेरे पास पांच हज़ार किताबें हैं थिएटर से संबंधित। तो यह मेरा व्यक्तिगत पागलपन है। पर कितने लोग नाटक पढ़ते हैं? मैं पटना गया था। तो कहा कि आप लाइब्रेरी खोलें तो पचास किताबें मैं दूंगा। पर किसी ने खोला नहीं। मैं सोचता हूं कि हर संस्था के पास अपनी होम मैगज़ीन होनी चाहिए। नाटकों पर चर्चा होनी चाहिए। पर ऐसा कुछ नहीं है। यह पूछने पर कि इस दिक्क़त को कौन दूर करेगा? तो कारंत बोले, शायद समाज ही। वह कहने लगे इतना सब होने के बाद भी रूस में आज भी नाटक ज़रूर पढ़ाया जाता है। संगोठियां ज़रूर होनी चाहिए। भले ही झगड़ा क्यों न हो। पर आज तक लोग जैसे गूंगे हो गए हैं। अब जरा ठंड बढ़ गई है बहस में।

बात फिर नाटकों की ओर वापस आई है। कारंत कहते हैं कि जब जयशंकर प्रसाद कहते थे कि रंगमंच के लिए नाटक नहीं, नाटक के लिए रंगमंच है। तो लोग यह बात मानते नहीं थे। लेकिन प्रसाद के स्कंदगुप्त के दर्जनों शो मैंने किए। दरअसल दुनिया में कहीं भी साहित्यिक और मंचीय नाटक का विभेद नहीं है। पर हिंदी में चला। खूब चला। यह ठीक नहीं है। नाटक, नाटक है।

वह कहते हैं कि मैं थिएटर के लिए हमेशा आशावादी रहूंगा। मैं भले ही रंगमंच से निवृत हो जाऊं, पर रंगमंच निवृत नहीं होगा। बात निर्देशक के निरंकुश होने की चली तो कारंत बोले मैं निर्देशक को दोषी नहीं पाता। यह कहने पर कि आप को नहीं लगता कि निर्देशक की मनमानी और उसके बूटों तले लेखक कितना कुचला गया, ख़ास कर हिंदी लेखक तो नतीजतन अच्छे नाटकों की निरंतर कमी होती गई। और अब अकाल पड़ गया है? कारंत बोले आप के प्रश्नों के पीछे बहुत पूर्वाग्रह है, इनका जवाब नहीं दे सकता। पर यह ज़रूर है कि निर्देशक को मैं दोषी नहीं पाता। अब किसी एक ख़ास समूह के लिए आप बात कह रहे हों तो बात और है। यह ज़रूर है कि आज रंगमंच में थोड़ी सी मंदी आ गई है। तो भी किसी न किसी रूप में नाटक करने की जो चेतना है। वह जागृत है। अभी आप पांडवानी और तीजनबाई की बात कर रहे थे तो क्या पांडवानी नाटक से बाहर है?

अल्काज़ी और शंभू मित्रा के बाद आप की पीढ़ी ने थिएटर की वह परंपरा नहीं खड़ी की? पूछने पर कारंत ने प्रति प्रश्न किया, आप ने यह नहीं पूछा कि हिंदी प्रदेशों से जो लोग एन.एस.डी. से ट्रेनिंग ले कर निकले वह लोग कहां गए? और फिर ड्रामा स्कूल अल्काज़ी से बहुत आगे जा चुका है। अल्काज़ी ने 16-17 वर्ष काम किया। पर अब वापस भी आ जाएं तो वह कुछ नहीं कर सकते। तो आप का यह सवाल मुझे ठीक नहीं लगता। और जो आप बार-बार अल्काज़ी-अल्काज़ी की रट लगाए हुए हैं। तो इधर एन.एस.डी. के लिए उन्होंने तीन नाटक किए। पर कन्नड़ नाटक अल्काज़ी अच्छा नहीं कर पाए, अल्काज़ी पकड़ नहीं पाए। मोहन राकेश के नाटक ‘आषाढ़ का एक दिन’ का एक संवाद है कि समय किसी की प्रतीक्षा नहीं करता। तो समय अल्काज़ी के हाथ से निकल गया है। बात एन.एस.डी. में कारंत के कार्यकाल में आत्महत्याओं की चली, तो वह बोले, इससे रंगमंच का क्या? यह कहने पर कि यह सवाल आज भी वहां गूंजता है। कारंत का कहना था, वहां भी आदमी रहते हैं, मठ थोड़े ही है। आज तक किसी ने नहीं कहा कि एन.एस.डी. की ज़रूरत नहीं है।

आप को एक समय में थिएटर में लोक संगीत के प्रयोग के नाते हम लोग जानते थे। पर अब थिएटर से लोक संगीत का प्रयोग लगभग बिसरता जा रहा है। आप को क्या लगता है? कारंत बोले ख़त्म होना स्वाभाविक है। क्यों कि पहले वेस्टर्न से प्रभावित था हमारा थिएटर, तो वह बदलाव ज़रूरी था। अपनी पहचान के लिए थिएटर ने लोक नाटकों से प्रेरणा ली। और इसमें कुछ ग़लत भी नहीं था। इस मामले में हमारे गुरू हैं हबीब तनवीर। उन्होंने बहुत पहले आगरा बाज़ार जैसे नाटक किए। लोक संगीत पर आधारित। पर अब यह बात ख़त्म हो रही है तो अच्छी बात है। क्यों कि अब और भी आगे की चीज़ें आने लगी हैं। और अब स्थिति अच्छी है। एक निर्देशिका अपने अभिनेता के बारे में विश्लेषण करती है। पर सोचिए एक समय वह भी था कि हिंदी के अवार्ड के लिए कोई अभिनेता नहीं मिलता था। बात फिर मुड़ी है और कारंत कह रहे हैं कि अब हिंदी रंगमंच पर बात भी हो रही है और जो कोई कहता है कि मैं संघर्ष कर रहा हूं तो यह सहज गुण है उसका। फ़िल्म में तो जो कोई संघर्ष कर रहा है वह अपने अकेले के लिए कर रहा है। पर रंगमंच में एक कोई अकेला संघर्ष नहीं करता।

थिएटर को आखिर संभव फिर से कैसे बनाया जाए? सवाल पर कारंत का कहना था कि अभी मुंबई में गांधी वर्सेज गांधी नाटक चल रहा है। पॉपुलर है। लेकिन हमारी राय में नाटक पॉपुलर होना बड़ी बात नहीं है। बड़ी बात है गर्मी पैदा करना। मैंने कर्नाटक में देखा अगर नाटक में सफल होना है तो पहले दर्शक चाहिए। तो दर्शकों को ध्यान में रख कर मैंने अभिनेता तैयार किए। पर दस साल बाद प्रसन्ना ने कहा कि दर्शकों के लिए नाटक देना चाहिए। यह आइडियालॉजी रखा। पर आज भी आइडियालॉजी को उतना महत्व मैं नहीं देता जितनी कि रंगमंच की गतिविधियों को। अब आप ही बताइए कि उत्तर प्रदेश में कई चीज़ें अस्थिर हैं। राजनीति में भी साहित्य में भी और कला में भी अस्थिरता होगी? आप बता सकते हैं कि उत्तर प्रदेश में किस क्षेत्र में अच्छा काम हो रहा है? तो सिर्फ़ एक थिएटर से ही एक अच्छी उम्मीद आप क्यों लगा बैठते हैं? मैं दिल्ली से निकल कर अपने गांव नहीं गया। एन.एस.डी. से बाहर मुझे सबसे पहला मौक़ा लखनऊ में ही मिला। हयवदन किया 1972 कि 73 में। सारे लखनऊ के लोगों को ले कर। मैं मानता हूं कि टी.वी. का भी यह शुरू-शुरू का असर है। जैसे हिंदी फ़िल्मों ने पारसी थिएटर को ख़त्म किया। राधेश्याम कथा वाचक का ज़ोर था तब। आगा हश्र कश्मीरी के नाटक चलते थे। पर हिंदी सिनेमा उनको खा गया। पारसी नाटक ख़त्म सा हो गया। पर नाटक नहीं। क्यों? क्यों कि पारसी थिएटर जो दिखाता था वही चीज़ फ़िल्म ज़्यादा अच्छी तरह से दिखाने लगी। तो पारसी थिएटर लोग क्यों देखते? ऐसे में हमने जयशंकर प्रसाद के नाटक करने शुरू किए। और आज भी हम पाते हैं कि प्रसाद के नाटक काफी महत्वपूर्ण हैं। खैर नाटकों में प्रगति तो हुई। पर तामझाम भी चला। पर तामझाम ज़्यादा दिन नहीं चलेगा। यह बहुत पहले मोहन राकेश ने कहा था। दरअसल थिएटर में ह्यूमन वैल्यू ज़्यादा इम्पार्टेंट है। कोई न्यूज़ कहानी कैसे बनती है? एक राजा था, मर गया, यह न्यूज़ है। पर एक राजा मर गया, फिर उसके दुःख से रानी भी मर गई तो यह कहानी बन गई। पर अब हर कोई चाहता है कि नाटक को सशक्त बनाया जाए। तो नाटक का आलेख ही नहीं, मंच सज्जा, वेशभूषा, विज्ञापन, ब्रोसर में भी बहुत परिवर्तन करना पड़ेगा। अभी जो मंदी आ गई है थिएटर में उससे घबड़ाने की ज़रूरत नहीं है, वह स्वाभाविक है। पारसी थिएटर को जब फ़िल्मों ने खाया था, तो अंधकार सा छा गया था। साहित्यिक और मंचीय नाटक के विभेद ने भी मुश्किल में डाला था। मेरा कहना है कि अगर नाटक है तो साहित्यिक गुण होना चाहिए और साहित्यिक है तो नाटकीय गुण भी होना चाहिए।

कारंत कहते हैं कि एक समय खुद भी मैं भारतीय रंगमंच और हिंदी नाटक पर थीसिस लिखने वाला था। बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में मेरे गाइड थे डॉ. जगन्नाथ प्रसाद शर्मा। पर मैंने थीसिस जमा नहीं की। पर तब मैंने भी कहा था कि प्रसाद का नाटक मंचीय नहीं है। पर एन.एस.डी. में जाने के बाद मुझे यह अपनी ही बात ग़लत लगी। और मैंने वहां प्रसाद के पांच-छह नाटक किए। तो प्रसाद के नाटकों को मंचीय न कहना मेरी ग़लती नहीं थी। दरअसल यह एक भ्रम था। और उसका कारण यह था कि प्रसाद के नाटक करने के लिए श्रम चाहिए, आसक्ति चाहिए। और यही लोगों में नहीं होता। इसी से लोग बचते हैं। तो कह देते हैं कि प्रसाद के नाटक मंचीय नहीं हैं। मैं अपनी बात कहूं तो इस समय मैं प्रसाद और भारतेंदु से बहुत प्रभावित हूं। प्रसाद और भारतेंदु मेरे लिए मूल धन हैं। और सबसे ज़्यादा इन्हीं के नाटक मैंने किए भी। क्यों कि इनका नाटक बड़ी डिमांड करता था, ट्रेनिंग की।

आप जो कहते हैं कि रंगमंच सुधारने की बात तो अगर मैं कहूं कि सब जगह रंगमंच सुधार दूंगा तो यह बहुत बड़ा अहंकार होगा ना ! दरअसल हिंदी रंगमंच को सुधारने के लिए दर्शक चाहिए। और दर्शक बनाने के लिए मैं सबसे पहले योग्य नाटक खोजूंगा। अभिनेता नहीं खोजूंगा। जो हैं उन्हीं से काम कराऊंगा। जैसे सबसे पहले मैंने लखनऊ में हयवदन किया तो पद्मिनी की भूमिका के लिए मैंने शोभना को चुना था। आज वह दूरदर्शन दिल्ली में समाचार वाचिका है। पर तब वह पढ़ रही थी बी. ए. में। अनिल रस्तोगी को लिया, कपिल बनाया था। विजय वास्तव को देवदत्त बनाया था। यह सभी नए थे। हल्लो भइया को लिया। नाटक में हल्लो-हल्लो आता है। तभी से उसका नाम हल्लो भइया पड़ गया। हयवदन नाटक कठिन था, शरीर किसी का, मस्तक किसी का इस बात को नए कलाकारों के मार्फ़त कहना आसान नहीं था। लेकिन मैंने किया। नए लोगों को ले कर किया। क्या आज भी अगर लखनऊ का रंगमंच सुधारने के लिए आप को बुलाया जाए तो क्या आप आना चाहेंगे? कारंत बोले, सरकार के कहने से नहीं। रंगमंच वाले बुलाएं तो आ जाऊंगा।

कारंत अपने रंगकर्म यात्रा के बाबत बताते हैं कि मैं हिंदी प्रचारक था। और ठीक से हिंदी सीखने के लिए बनारस आया था। संगीत भी वहीं सीखा। बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में हिंदी में अपना नाम लिखाया। तब आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी वहां मेरे अध्यापक थे। नामवर भी थे। और जब नाटक पर थीसिस लिखने की बात आई तो मुझे लगा कि नाटक को भी समझ लेना चाहिए। तो नाटक को समझने के लिए मैं नेशनल स्कूल ऑफ़ ड्रामा दिल्ली गया। मैं तब 32 वर्ष का था। और प्रोफेसर बनना चाहता था। और भारतीय रंगमंच पर अपने शोध को पुख्ता बनाने के लिए नाटक की ट्रेनिंग लेनी शुरू कर दी। पर देखिए विधि ने कहां से कहां पहुंचा दिया। तीन साल एन.एस.डी. में पढ़ाई करने के बाद भी कर्नाटक वापस नहीं गया। दिल्ली में ही रहा। एक स्कूल में काम करने लगा। वहां भी नाटक ही सिखाता था। फिर तब का दिन है और आज का दिन कि मैंने फिर पीछे मुड़ कर नहीं देखा। और नाटक ने मुझे छोड़ा नहीं। आज मैं जब भी सोचता हूं थिएटर ही सोचता हूं, कुछ और नहीं। मैं संगीत भी जानता हूं। बाक़ायदा। पर कभी संगीत की बैठक करूं। यह कभी मन में नहीं आया। हालांकि थिएटर करता हूं तो कई बार मुझे लगता है कि मैं रिपीट कर रहा हूं। पर संगीत में मैं अपने को रिपीट करता नहीं पाता। बावजूद इसके मैं संगीत छोड़ सकता हूं। लेकिन थिएटर नहीं। अब यह बात भी ज़रूर है कि थिएटर बिना संगीत के नहीं होता ना ! जब कि संगीत बिना थिएटर के भी हो सकता है। तो मैं थिएटर ही हरदम करते रहना चाहता हूं। क्यों कि इसमें संगीत भी है और थिएटर भी। शायद इसी लिए इन दिनों मैं लाइट एंड साउंड प्रोग्राम भी करने लगा हूं। जिसमें थिएटर और संगीत दोनों की ही अनिवार्यता होती है।

(बातचीत राष्ट्रीय सहारा से साभार. 1998 में लिया गया इन्टरव्यू)

Wednesday, July 4, 2012

एक थाली में खाते हैं राम और अली


रमेश शुक्ला 'सफर', अमृतसर दिन : सोमवार समय : दोपहर के दो बजे स्थान : अमृतसर का विरसा विहार
दोपहर के खाने के लिए जैसे ही अंतरराष्ट्रीय थियेटर वर्कशाप में आधे घंटे का अवकाश होता है, वर्कशाप में हिस्सा लेने वाले आर्टिस्ट एक साथ खाना लेने के लिए लाइन में खड़े हो जाते हैं। लाइन में कोई हिंदू है, कोई सिख है तो कोई मुसलमान या फिर ईसाई। कोई जाति-पाति का भेद नहीं, सभी एक साथ लाइन में खाना लेते हैं और एक साथ खाने के लिए बैठ जाते हैं। खाने का स्वाद तब और बढ़ जाता है जब किसी थाली में एक साथ भारत काराम तो पाकिस्तान के अली निवाला तोड़ते हैं। कहीं बिहार के सचिन और पंजाब के हैरी संधू तो कहीं स्वलेंजी और सुखजीत सिंह एक ही थाली में पेट पूजा में जुटे हैं। 'मजहब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना' किसी शायर की लिखी यह चंद लाइनें इन्हीं के लिए शायद लिखी गई होंगी। दैनिक जागरण से बातचीत में पाकिस्तान के मोहम्मद कैसर अली कहते हैं कि वह पिछले करीब एक महीने से वर्कशाप में हैं। ऐसा लगता ही नहीं है कि वह अपने देश में नही है। यहां सभी लोगों से लगाव हो गया है। सुनील, गुरजीत सिंह, रामकुमार, जतिंदरपाल, अशोक, अभिषेक, दिनेश आदि कई लोग हैं जिनके साथ इतने कम समय में घुलमिल गया। पता ही नहीं चलता कि अमृतसर में हूं या लाहौर में। रंगमंच से सीखा है कि मजहब से बड़ी इंसानियत है। आज अगर अलग-अलग मजहब के होते हुए भी एक थाली में खाना खा रहे हैं तो यह इंसानियत की जीत है। खुशी है कि रंगमंच हमेशा दो दिलों को जोड़ने की बात करता है। मजहब की बड़ी-बड़ी बाते करने से पहले एक अच्छा इंसान बनना होगा। कैसर कहता है कि सीमाओं की कंटीली तारें अवाम का दर्द नहीं समझती। बेजान तारें दोनों देशों को अलग करती हैं। दोनों देशों के युवा नफरत से ऊब चुके हैं, वे प्यार और सुकून चाहते हैं। गोलियां कहीं भी चले, राकेट, मिसाइल किसी भी देश में गिरे नुक्सान तो अवाम को ही उठाना पड़ेगा। वर्कशाप में हिस्सा लेने सचिन, गुरजीत सिंह, बलजिंदर, अमनदीप, गुरप्रीत कहते हैं कि रंगमंच ऐसा मंच है जहां भेदभाव, ऊंच-नीच नहीं होता। कलाकार की न कोई जाति होती है और न ही वह किसी एक संप्रदाय से बंधा ही रह सकता है। वर्कशाप पांच जुलाई को खत्म होगी। (दैनिक जागरण से साभार)

Saturday, June 30, 2012

पेइचिंग ओपेरा के विकास की विरासत व सृजन


पेइचिंग ओपेरा का 200 साल पुराना इतिहास है। उसे पूर्व का ओपेरा नाम से भी जाना जाता है। उसका उद्गम शायद कुछ प्राचीन स्थानीय ओपेरा से हुआ है। वर्ष 1790 में हुए पान नाम का एक स्थानीय ओपेरा पेइचिंग में प्रचलित होने लगा, क्योंकि पेइचिंग में विभिन्न प्रकार के स्थानीय ओपेरा काफी लोकप्रिय थे, जिस से इसे तीव्र प्रगति करने का सुअवसर प्राप्त हुआ। 2 सौ साल से पेइचिंग ओपेरा का तेज विकास हो रहा है। पिछली शताब्दी इस के विकास का सबसे अच्छा दौर रहा है, और यह चीन की सार कला बन गया है। आजकल तेज विकास के दौर में अन्य परंपरागत कलाओं की तरह पेइचिंग ओपेरा के विकास के सामने चुनौतियां मौजूद हैं। इसलिए इस कला के विकास में और ज्यादा ध्यान देने की जरुरत है । हाल ही में आयोजित हुए वर्ष 2011 चीनी नाटक कला की विरासत व विकास के मंच पर चीनी जन राजनीतिक सलाहकार सम्मेलन के उपाध्यक्ष, चीनी साहित्यिक और कलात्मक एसोसिएशन के अध्यक्ष सुन च्या चेंग ने चीन के परंपरागत ओपेरा के विकास के सामने मौजूद कठिनाइयों की चर्चा करते हुए कहा कि वर्तमान में चीन के नाटक के विकास के सामने एक बड़ी चुनाती मौजूद है। सुधार व खुलेपन की नीति लागू होने के बाद आधुनिकीकरण, भूमंडलीकरण, अधिक सूचना समेत रंगबिरंगी बाहरी संस्कृति के चीन में प्रवेश होने की वजह से परंपरागत संस्कृति की बड़ा धक्का पहुंचा है। हमें परंपरागत नाटक कला की विरासत व विकास को आगे बढाने की जिम्मेदारी उठानी चाहिए, जिससे चीन की राष्ट्रीय संस्कृति व जातीय भावना का प्रचार-प्रसार किया जा सके।
पेइचिंग ओपेरा चीनी राष्ट्र का सांस्कृतिक खजाना है। चीन के गीत-संगीत, साहित्य, इतिहास व परंपरागत सौंदर्यशास्त्र का पेइचिंग ओपेरा पर प्रभाव पड़ास है। वर्तमान में लोकप्रिय संस्कृति की व्यापकता की स्थिति में हम कैसे पेइचिंग ओपेरा का विरासत व विकास करेंगे और इस परंपरागत कला का शानदार पुन: उत्पन्न करेंगे?यह सवाल मुख्य है। चीन के मशहूर ओपेरा कलाकार व पेइचिंग ओपेरा कलाकार मेई लान फांग ने पहले यह कहा था कि सुधार महत्वपूर्ण है, क्योंकि सुधार से प्रगति होगी। अन्य कलाओं के मुकाबले 2 सौ साल पुराना पेइचिंग ओपेरा का इतिहास इतना लम्बा नहीं है, लेकिन पेइचिंग ओपेरा सांस्कृतिक अवशेष नहीं है और इसे संग्रहालय में रखने की ज़रूरत नहीं है। कलाकारों द्वारा कार्यक्रम पेश करवा करके इस का प्रचार-प्रसार किया जाना चाहिए। अगर पेइचिंग ओपेरा के विकास में युवा शक्ति शामिल नहीं हुई, तो यह प्राचीन कला आज के लिए सार्थक नहीं हो सकती है। चीन के नाटक कॉलेज के पेइचिंग ओपेरा विभाग के अध्यक्ष च्यांग याओ ने कहा कि कुछ युवा लोगों को परंपरागत ओपेरा की जानकारी देने के लिए कुछ माध्यम उपलब्ध हैं। देश की सरकार व कुछ विभागों को युवा लोगों व छात्रों को इस जानकारी देने के लिए मंच प्रदान करने की जरूरत है। इस के लिए विभिन्न जगतों के कर्मचारी व कुछ कारगर माध्यम चाहिए। पेइचिंग ओपेरा की कक्षा का लक्ष्य प्रशंसकों की संख्या बढाने की बजाए उन्हें पेइचिंग ओपेरा व अन्य स्थानीय ओपेरा की ज्यादा जानकारी देना है। हमारे चीनी नाटक कॉलेज ने कई बार दफ्तर में काम करने वाले कर्मचारियों व विश्वविद्यालय के छात्रों के साथ संपर्क किया। हमने पेइचिंग ओपेरा विश्वविद्यालय में प्रवेश नामक सिलसिलेवार कार्यवाहियां की थीं। हमने पेइचिंग ओपेरा की जानकारी दी, कलाकारों का कार्यक्रम दिखाने की स्थिति का परिचय दिया। छात्रों को यह कार्यवाही बहुत पसंद आई । उन्होंने कहा कि अगर इस प्रकार की कार्यवाही नहीं हुई, तो वे थिएटर में प्रस्तुति नहीं देखेंगे। लेकिन पेइचिंग ओपेरा की जानकारी पाने के बाद उन्होंने कहा कि अगर मौका मिला, तो जरूर कम से कम एक बार वे थिएटर में इस की प्रस्तुति देखेंगे। च्यांग याओ ने कहा कि युवा लोगों को परंपरागत संस्कृति पसन्द है, लेकिन हमें उचित तरीके से और ज्यादा जानकारी देने की जरूरत है, ताकि और ज्यादा युवा लोग चीन के परंपरागत ओपेरा पर ध्यान दे सकें। आजकल पेइचिंग ओपेरा व अन्य स्थानीय ओपेरा की प्रस्तुतियों में फैशनेबल तत्व शामिल किए जा रहे हैं। पटकथा, संगीत, गायन, कपड़े, मंच डिजाइन आदि पहलुओं में भी कुछ सुधार किया गया है। कुछ प्रस्तुतियों में पश्चिमी ओपेरा की रचनात्मक तकनीक शामिल की गई है और कुछ अन्य में गायन व संगीत में बड़ा बदलाव देखने में आया है। कुछ चीनी परंपरागत ओपेरा की प्रस्तुतियां विश्व के विभिन्न देशों में दिखाई गई हैं, विदेशी दर्शकों को यह बहुत पसंद आई हैं। फैशनेबल तत्व परंपरागत ओपेरा में शामिल किए जाने के बाद युवा दर्शकों की संख्या बढ रही है। ज्यादा युवा लोग सिनेमा में फिल्म देखने की तरह थिएटर में ओपेरा देखने आना पसंद करने लगे हैं। लेकिन परंपरागत ओपेरा में सुधार करने के दौरान परंपरागत तत्वों को बनाए रखने की आवश्यकता है। अनेक मशहूर कलाकार व विशेषज्ञ इस पर सहमत हैं। पेइचिंग ओपेरा में आधुनिक तत्व शामिल किए जाने के सवाल पर चीन के मशहूर पेइचिंग ओपेरा कलाकार ये शाओ लान ने कहा कि पेइचिंग ओपेरा में अन्य कुछ कला तत्व शामिल हो सकते हैं, लेकिन ये तत्व पेइचिंग ओपेरा के बारे में होने चाहिए और पेइचिंग ओपेरा को तरीके से पेश किया जाना चाहिए। क्योंकि पेइचिंग ओपेरा रचने के कुछ विशेष नियम हैं, अगर इन नियमों को बदला जाता है, तो यह पेइचिंग ओपेरा नहीं रहेगा। इसलिए अन्य कलाओं की विशेषताओं को शामिल करने के दौरान पेइचिंग ओपेरा के नियमों का पालन किया जाना चाहिए । अगर पेइचिंग ओपेरा में आधुनिक तत्व नहीं होंगे, तो युवा लोग इस पर ध्यान नहीं देंगे। अगर परंपरा की रक्षा नहीं की जाएगी, तो विकास के दौरान पेइचिंग ओपेरा की विशेषता व मनमोहक शक्ति दिन प्रति दिन कम होगी। इसलिए पेइचिंग ओपेरा की विरासत व विकास के दौरान कठिनाईयां मौजूद हैं। लेकिन केवल निरंतर सुधार करने के बाद ही इस प्राचीन ओपेरा का सृजन व विकास हो संभव है। पेइचिंग ओपेरा के विकास के सामने मौजूद सवाल अधिकांश परंपरागत कला के विकास के सामने भी हैं। इसलिए परंपरा को आगे बढ़ाने के साथ-साथ समय के विकास की जरूरतों का पूरा होना भी महत्वपूर्ण है, इस तरह पेइचिंग ओपेरा की जीवन शक्ति व मनमोहक शक्ति बनी रह सकेगी। (http://hindi.cri.cn/681/2012/06/28/1s126824.htm से साभार)

Tuesday, June 12, 2012

हर शनिवार, 19 साल से चल रहा है नाटक


शहर गोरखपुर के रेलवे स्टेशन से बमुश्किल डेढ़ किमी दूर, गर्मियों की सुबह में किशोरवय के कुछ शौकिया रंगकर्मी बरगद के दो विशाल वृक्षों को जोड़कर बनाए गए मिट्टी के अस्थायी मंच पर झाड़ू लगा रहे हैं. पेड़ों के तनों से बांधकर परदा लगाया जा रहा है और मंच से नीचे खिचड़ी दाढ़ी और बालों वाला एक शख्स छोटी-सी मेज पर एक महिला की तस्वीर सजाते हुए अचानक अपनी नम आंखें साफ करने लगता है. पीछे से कोई लड़का पूछता है, ''दादा! ये तो रिकॉर्ड होगा. इतना लंबा टाइम तक कोई और नाटक थोड़े किया होगा?'' दादा घूमकर उसे देखते हैं, ''डायलॉग याद करो. ऐ चक्कर में मत पड़ो कि रिकॉर्ड बना है.'' दादा यानी 55 बरस के के.सी. सेन के लिए यह रिकॉर्ड भले ही रोमांच भर देने वाली बात न हो, लेकिन जरा सोचिए कि अगर कुछ रंगकर्मी पिछले 19 सालों से हर शनिवार सुबह बिना क्रमभंग के नाटक कर रहे हों तो क्या यह बड़ी बात नहीं है? कड़ाके की धूप, ठंड या बारिश कुछ भी हो, ये सिलसिला पिछले 1,000 हफ्तों से अनवरत जारी हो और वह भी इसलिए कि इस शहर को एक ऑडिटोरियम मिल जाए, जहां नाटक करने वाले अपनी प्रस्तुतियां कर सकें. क्या यह सचमुच 'कुछ खास' नहीं है? हालांकि सेन से पूछिए तो वे अनसुना कर देंगे. उनके लिए ये सिलसिला अब एक लड़ाई में बदल चुका है. इसे जारी रखने के लिए रेलकर्मी सेन ने प्रमोशन से इनकार कर दिया क्योंकि तब उन्हें शहर से बाहर जाना पड़ता. 19 साल पहले जब विश्व रंगमंच दिवस के मौके पर उन्होंने इस आंदोलन का संकल्प लिया, तब उनकी पत्नी माला अपने दो नन्हे बच्चों के साथ हौसला अफजाई के लिए हर शनिवार यहां आती थीं. अब बड़ा बेटा कल्याण सेन नाटकों में अभिनय और निर्देशन कर देशभर के नाट्य महोत्सवों में पुरस्कार जीत रहा है मगर कैंसर से लड़ते हुए माला गत वर्ष चल बसीं. 1986 में प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री (अब दिवंगत) वीरबहादुर सिंह ने गोरखपुर में 5.4 करोड़ रु. की लागत से एक अत्याधुनिक प्रेक्षागृह व आर्ट गैलरी के निर्माण की घोषणा की थी. काम शुरू भी हुआ, लेकिन उनकी अचानक मृत्यु के बाद वह ठप हो गया. अधूरे प्रेक्षागृह में जंगल उगने लगा. सेन और उनके साथियों ने 1993 में विश्व रंगमंच दिवस के मौके पर रंगाश्रम के जरिए प्रेक्षागृह के निर्माण होने तक हर शनिवार एक नाट्य प्रस्तुति करने का अनोखा संकल्प लिया था और शनिवार 19 मई को मुंशी प्रेमचंद की कहानी 'सवा सेर गेहूं' की प्रस्तुति इस रंगयात्रा की 1,000वीं कड़ी थी. इसमें बतौर मुख्य अतिथि मौजूद सांसद योगी आदित्यनाथ कहते हैं, ''मैंने ऐसे आंदोलन बहुत कम देखे हैं, जिसमें कुछ लोग शहर की जरूरतों के लिए खुद तपस्या कर रहे हों.'' योगी अब जमीन के स्वामियों और शासन से संवाद की नई कोशिश कर रहे हैं ताकि कानूनी गतिरोध दूर हो सके. मगर गोरखपुर विवि के ललित कला विभाग के एसोसिएट प्रो. डॉ. भारत भूषण सवाल करते हैं, ''क्या सारी जिम्मेदारी रंगाश्रम की ही है? उस शहर की जिम्मेदारी कुछ नहीं, जिसके लिए वे यह तपस्या कर रहे हैं?'' सेन और उनके सहयोगी विजय सिंह, पानमती शर्मा और सतीश वर्मा अगली प्रस्तुति की पटकथा पर बहस कर रहे हैं. कल्याण को पीलिया है, मगर 1,000वीं प्रस्तुति के लिए वह भी आया. विजय कहते हैं, ''दादा तो कबीर की तरह घर फूंककर अलख जगा रहे हैं.'' पर सवाल फिर भी वही है कि जिन लोगों के लिए अलख जगाई जा रही है, वे कहां हैं? (आज तक डॉट कॉम से साभार)

Sunday, June 3, 2012

नन्हें हाथों में दुनिया थमाने से पहले


अशोकनगर में इप्टा का आठवां बाल एवं किशोर रंग शिविर अशोकनगर: पिछले कुछ दिनों में देश भर में भारतीय जन नाट्य संघ (इप्टा) की विभिन्न इकाइयों ने 25 से अधिक बाल रंग शिविर का आयोजन किया। 20 दिन से लेकर एक महीने तक के इन शिविरों में ऐसा बहुत कुछ है कि इन्हें अपने आप में अनूठा, प्रयोगधर्मी, जरूरी और कला भविष्य के प्रति आश्वस्ति के रूप में देखा जा सकता है। कला और खासकर बच्चों के कलाकर्म को देखने का इधर जो नजरिया विकसित हुआ है, उसमें कुछ रियायतें और भावुकता भी शामिल होती है। इसलिए वे सच्चाइयां सामने नहीं आ पातीं, जो रंगशिविरों की अच्छाइयों और बुराइयों को नुमायां कर सकें। ज्यादातर मौकों पर बच्चों के थियेटर को आलोचना के बजाय आशीर्वाद की दृष्टि से देखा जा सकता है, क्या यह आने वाले दिनों के लिए खतरनाक हो सकता है? बहरहाल, अशोकनगर (मध्यप्रदेश) के आठवें बाल एवं रंग शिविर में 12 दिन गुजारने के साथ वे कारण साफ होते हैं, जो आने वाले दिनों के कस्बाई कला कर्म की रूपरेखा तय करने वाले हैं। कस्बों से कलाकारों का पलायन, संसाधनों की कमी, प्रतिबद्धता की छीजन और सार्वजनिक कला के द्वंद्व से जूझते हुए इप्टा की अशोकनगर ईकाई ने पहला रंग शिविर 1998 में लगाया था। बीच में कुछ व्यवधान के बाद बीते तीन साल से यह फिर लगातार जारी है। एक मई 2012 को महानतम अभिनेता बलराज साहनी का शताब्दी वर्ष शुरू हुआ यह रंग शिविर उन्हीं के कला कर्म को समर्पित था। 25 दिनों के इस शिविर के उद्घाटन और समापन समारोह में बाल कलाकारों ने कुल तीन नाटकों, 2 नृत्य और पांच जनगीतों की प्रस्तुति दी। साथ ही अपने 25 दिन के रचनात्मक कार्यों, डायरी और शहर की समस्याओं पर रिपोर्टिंग पर आधारित 24 प्रष्ठीय अखबार ‘‘बाल रंग संवाद’’ प्रकाशित किया। इससे पहले उद्घाटन अवसर पर भी बच्चों ने नाटक ‘‘आदमखोर’’ का मंचन किया। कार्यशाला में व्यायाम, संगीत, क्राफ्ट, पत्रकारिता, नृत्य, रंगमंच, चित्रकला की सैद्धांतिक और प्रायोगिक जानकारी विषय विशेषज्ञों ने दी। यह जानकारियां उन बच्चों को दी गई हैं, जो आने वाले समय के कला जगत को अपने अपने ढंग से आलोकित करेंगे। बीज रूप में दिए गए कला-विचारों के वृक्ष कैसे होंगे, इसका अनुमान प्रस्तुतियों से लगाया जा सकता है।
उद्घाटन के अवसर पर श्री विजयदान देथा की कहानी ‘‘आदमखोर’’ के श्री रोहित झा द्वारा किए गए नाट्य रूपांतरण को युवा रंगकर्मी सत्यभामा ने मंच पर उतारा। खुद सत्यभामा के अलावा अविनाश तिवारी, विनय खान, ऋषभ श्रीवास्तव, सारांश पुरी और कबीर राजोरिया ने मंच पर अभिनय किया। इस पहली प्रस्तुति के साथ ही यह तय हो गया था कि नाट्य शिविर अपनी पिछली परंपराओं से अलग साबित होगा। यह पहली बार था जब अशोकनगर इप्टा की ईकाई ने शिविर के उद्घाटन पर नाटक की प्रस्तुति की। खासबात यह रही कि मंचन की पूरी जिम्मेदारी पिछले शिविर में शरीक रहे बच्चों ने ही निभाई। संगीत की जिम्मेदारी सिद्धार्थ शर्मा ने निभाई और नेपथ्य के अन्य कार्य शिविरार्थी निवेदिता और संघमित्रा ने किए। प्रकाश संयोजन का कार्य इप्टा के वरिष्ठ सदस्य रतनलाल पटेल और श्याम वशिष्ठ ने किया। दूसरे दिन बच्चों को व्यायाम, संगीत और नाटक के बारे में शुरुआती जानकारी दी गई। तीसरे दिन बच्चों ने पार्टीशन कहानी का पाठ किया, जिसके बारे में तय किया गया कि इसका मंचन किया जाएगा। नाट्य रूपांतरण की जिम्मेदारी प्रगतिशील लेखक संघ की गुना ईकाई के वरिष्ठ साथी सत्येंद्र रघुवंशी को दी गई। सात मई को महाकवि रबीन्द्रनाथ टैगोर के जन्मदिवस पर शिविर संयोजक रतनलाल पटेल ने उनकी रचनाओं का पाठ किया और बच्चों से श्री टैगोर के साहित्यिक योगदान की चर्चा की। दस मई को जबलपुर से लोकनृत्य विशेषज्ञ इंद्र पांडे का शिविर में आगमन हुआ। उन्होंने बच्चों को लोकनृत्य राई, दादारिया, पंथी और कालबेलिया के बारे में जानकारी थी। आगामी दिनों में बच्चों को उन्होंने इन चार नृत्यों का प्रशिक्षण दिया और समापन के अवसर पर दादरिया और राई का प्रदर्शन किया गया। 16 मई को उज्जैन से आए ख्यातिलब्ध चित्रकार मुकेश बिजौले ने बच्चों को चित्रकला की जानकारी दी। उन्होंने बच्चों को आधुनिक चित्रकला की सैद्धांतिक और प्रायोगिक जानकारी दी। बाद के दिनों में बच्चों ने खुद चित्र बनाए, जिनमें से चुनिंदा चित्रों को बाल रंग संवाद के अंक में प्रकाशित किया गया। 17 मई को मेरठ से आए युवा पत्रकार सचिन श्रीवास्तव ने बच्चों को पत्रकारिता के बारे में जानकारी दी। अशोकनगर ईकाई ने 2010 के शिविर में पहली बार 8 पन्ने का अखबार ‘‘बाल रंग संवाद’’ प्रकाशित किया था। 2011 में यह 20 पन्ने में प्रकाशित हुआ और इस बार 24 पन्ने का अखबार प्रकाशित किया गया। बीते दो अंकों के बजाय इस बार बच्चों ने शहर की समस्याओं पर रिपोर्टिंग की। इस बीच बच्चें प्रतिदिन डायरी भी लिख रहे थे, जिसे ‘‘बाल रंग संवाद’’ में शामिल किया गया। 20 मई को बीना से आए गजलकार श्री महेश कटारे ने बच्चों के बीच अपनी बुंदेली गजलों का पाठ किया। जिसके बारे में बच्चों ने अपनी डायरी में प्रतिक्रिया दी। 25 मई को हुए समापन समारोह की शुरुआत गजलकार श्री महेश कटारे, प्रलेस गुना के वरिष्ठ साथी श्री रामलखन भट्ट, वरिष्ठ पत्रकार श्री मनोज जैन और इप्टा के प्रदेश महासचिव श्री हरिओम राजोरिया के सानिध्य में ‘‘बाल रंग संवाद’’ के लोकार्पण से हुई। इसके बाद शिविर संयोजक रतनलाल पटेल और रामदुलारी शर्मा के मार्गदर्शन में तैयार जनगीतों की प्रस्तुति हुई। इसके बाद ईवा भार्गव, अणिमा जैन, रक्षिता जैन, मानसी जैन, सुरभि जैन, चारू जैन, स्नेहा गुप्ता और साक्षी पांडे ने ‘‘दादरिया’’ लोकनृत्य की प्रस्तुति दी। इंद्र पांडे, रतन लाल पटेल और सिद्धार्थ शर्मा ने थाप दी। इसके बाद अशोकनगर इप्टा की वरिष्ठ साथी और वर्तमान शिविर की संयोजक सीमा राजोरिया के निर्देशन में स्वयं प्रकाश की कहानी ‘‘पार्टीशन’’ के सत्येंद्र रघुवंशी द्वारा तैयार नाट्य आलेख का मंचन किया गया। नाटक की कहानी एक प्रगतिशील मुसलिम व्यापारी कुरबान अली के इर्द-गिर्द घूमती है, जो एक झगड़े में जलील होने के बाद इंसान से मुसलमान ठहरा दिया जाता है। कुरबाल अली के रूप में सत्यभामा ने अपने भावुक अभिनय से दर्शकों को बांधे रखा, तो लतीफ मियां के किरदार में कबीर राजोरिया ने अपनी संवाद अदायगी के बूते अलग छाप छोड़ी। ईमान अली के किरदार को बाल कलाकार अमित गुप्ता ने बिल्कुल पड़ोस का बना दिया और अमन खान ने प्रोफेसर के पात्र को जीवंत बनाया। रऊफ के रूप में ऋषभ श्रीवास्तव, शायर-कवि शिवानी शर्मा, भाई जी और दरोगा अनुपम तिवारी, गोटू का पात्र अखिल जैन ने बेहतरीन ढंग से निभाया। अन्य कलाकारों ने भी अपने छोटे-छोटे किरदार को खूबसूरती से अदा किया। खासबात यह रही कि नाटक में कोई भी पात्र हावी नहीं रहा। नाटक अपनी पूरी जटिलताओं के साथ जरूरी संदेश देने में कामयाब रहा। तालियां कम बजीं, लेकिन जहां बजनी चाहिए थीं, वहीं बजीं। यह निर्देशक की भी कामयाबी थी, और कलाकारों की भी। खासकर कुरबान अली के एक लंबे डाॅयलाॅग में, जब वह अपने इंसान होने और मुसलमान होने के बीच की टकराहट को सामने रखता है, दर्शकों में लंबा सन्नाटा था। नाटक में हास्य का पुट नहीं था, और बच्चों के साथ पूरी गंभीरता दिखाते हुए दर्शकों ने कहानी को आत्मसात किया। करीब सवा घंटे के इस नाटक में 12 दृश्य थे, और हरएक में प्रापर्टी को बदलना था, जिसे बच्चों ने खूबसूरती से अंजाम दिया। मुकेश बिजौले, आकांक्षा, अर्चना प्रसाद और संजय माथुर के मेकअप ने नाटक की खूबसूरती को तो बढ़ाया ही, भाव और किरदार दर्शाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। प्रकाश संयोजन रतनलाल और श्याम वशिष्ठ का था।
दूसरा नाटक व्यंग्यकार हरिशंकर परसाई की कहानी ‘‘इंस्पेक्टर मातादीन चांद पर’’ के तपन बनर्जी द्वारा किए गए नाट्य रूपांतरण पर आधारित था। इसका निर्देशन विनोद शर्मा ने किया, निर्देशन में सहयोग किया रामबाबू कुशवाह ने। नुक्कड़ शैली के इस नाटक में मातादीन की प्रमुख भूमिका के साथ आर्यन अरोरा ने ईमानदार व्यवहार किया और उनका साथ दिया, विनय खान, प्रियांशु शेखर, दर्श दुबे, अनिकेत, आशीष, सौरभ और कबीर खान ने। अभिनय के लिहाज से आर्यन और प्रियांशु ने दर्शकों की वाहवाही बटोरी। प्रापर्टी की कमी के बावजूद कलाकारों ने चांद के दृश्य और पुलिस की कार्यप्रणाली को खूबसूरती से बेपर्दा किया। संवादों में तीक्ष्णता अपने पूरे वेग से हाॅल में पहुंच रही थी, जिसका सबूत बीच-बीच में उठा रहे ठहाके थे। दोनों नाटकों के बीच के अंतराल में दीक्षा जैन, श्वास्ती, संघमित्रा, प्रज्ञा, पारूल, कविता, प्रियंका, सौम्या, आशी और आस्था ने बुंदेलखंड के लोकनृत्य ‘‘राई’’ की प्रस्तुति दी। ‘‘राई’’ के गंभीर दर्शकों ने भी इसकी सराहना की और एक दर्शक की यह टिप्पणी नृत्य की तारीफ के लिए काफी है कि, ‘‘हम चाहते थे कि यह नृत्य पूरी रात चलता रहे।’’ वैसे भी ‘‘राई’’ नृत्य अपने पारंपरिक रूप में पूरी रात चलता है, यह बच्चे की पैदाइश और विवाह के अवसर पर होता है, जिसे मिथक में लव-कुश की पैदाइश से जोड़कर देखा जाता है। समापन समारोह के अंत में पीडब्ल्यूडी के एसडीओ श्री ज्ञानवर्धन मिश्रा, वरिष्ठ कवि निरंजन श्रोत्रिय, वरिष्ठ पत्रकार अतुल लुंबा और गजलकार महेश कटारे ने बच्चों को सुनहरे भविष्य की उम्मीदों के साथ प्रमाण-पत्र वितरित किए गए। इस लंबे किंतु बेहद सधे हुए कार्यक्रम का संचालन ख्यातिलब्ध चित्रकार और अशोकनगर इप्टा के वरिष्ठ साथी पंकज दीक्षित ने किया। शिविर के सफल संचालन में संयोजक और इप्टा अशोकनगर की अध्यक्ष सीमा राजोरिया, सचिव राकेश विश्वकर्मा के अलावा वरिष्ठ साथी विनोद शर्मा और रतनलाल पटेल की महत्वपूर्ण भूमिका रही। इस रंग शिविर से कला कर्म के भविष्य की जो तस्वीर सामने आती है, वह किसी नाट्य क्रांति को रेखांकित नहीं करती, लेकिन कला के सामाजिक दायरे को बढ़ाती है। अच्छे और बुरे के फर्क की तमीज पैदा करने वाले शिविरों में इप्टा के इस शिविर को अलग से रेखांकित भले न किया जाए, लेकिन इसे खारिज नहीं किया जा सकता। यह तब है जब अशोकनगर जैसे शहर बनते कस्बे में इसी दरम्यान क्रिकेट से लेकर आधुनिक नृत्य तक की कार्यशालाएं समानांतर रूप से चल रही थीं। ऐसे में 60 से अधिक बच्चे हर साल तपती धूप में नाट्य कर्म और कुछ अन्य जरूरी कलाओं का प्रशिक्षण ले रहे हैं, तो आश्वस्त हुआ जा सकता है कि कस्बों में थियेटर बचाने के लिए किसी सरकारी पहल की जरूरत नहीं है। इस कार्यशाला के उद्घाटन अवसर पर वरिष्ठ पत्रकार श्री अतुल लुंबा ने कहा था कि ‘‘अशोकनगर में बच्चों के थियेटर पर जो काम हो रहा है, उसकी पहचान प्रदेश ही नहीं, बल्कि राष्ट्रीय स्तर हो रही है।’’ दिलचस्प है कि राष्ट्रीय सवाल भी कस्बों तक पहुंच रहे हैं, इसलिए यह जरूरी भी है कि कस्बे राष्ट्रीय फलक पर जवाबदेही निभाएं। इस लिहाज से अशोकनगर का कला जगत अपनी जिम्मेदारी निभा रहा है, ठीक वैसे ही जैसे भिलाई से लेकर डोंगरगढ़ तक के अन्य समूह अपने-अपने ढंग से हस्तक्षेप कर रहे हैं। - सचिन श्रीवास्तव

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