RANGVARTA qrtly theatre & art magazine

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Friday, March 15, 2013

जोर-जबर्दस्ती के खिलाफ थिएटर आगे आये.



दारियो फो का संदेश: विश्व रंगमंच दिवस 2013
(इटली के व्यंग्यकार, नाटककार, नाट्य-निर्देशक, अभिनेता, संगीतकार, नोबल पुरस्कार विजेता)

बहुत समय पहले सत्ता ने कमेडिया दे ला आर्ट के अभिनेताओं को देश से बाहर निकाल कर उनके विरुद्ध अपनी असहिष्णुता को संतुष्ट किया. आज ऐसे ही संकट के कारण अभिनेताओं और थियेटर कंपनियों के लिए सार्वजानिक मंचों, प्रेक्षागृहों और दर्शकों तक पहुंचना कठिन हो गया है .शासकों को अब उन लोगों से कोई समस्या नहीं है, जो विडंबना और व्यंग्य की अभिव्यक्ति करते हैं क्योंकि न तो अभिनेताओं के लिए कोई मंच है और न ही दर्शक, जिसे संबोधित किया जा सके. इसके उलट पुनर्जागरण के दौर में इटली का सत्ताधारी वर्ग हास्य-व्यंग्य कलाकारों को दूर रखने के लिए विशेष प्रयास करने पर बाध्य हुआ क्योंकि ऐसे प्रदर्शन जनता में बहुत लोकप्रिय थे.

यह तो सर्वविदित है कि कमेडिया दे ला आर्ट के कलाकारों का बड़ी संख्या में बहिर्गमन सुधार्रों की गति को विपरीत दिशा में ले जाने वाली सदी में हुआ, जब सभी रंगकर्म स्थलों को ध्वस्त करने का आदेश दिया गया . विशेष तौर पर रोम में, जहाँ उन कलाकारों पर पवित्र नगर को अपमानित करने का आरोप लगाया गया .1697 में पोप इनोसेंट बारहवें ने रूढ़िवादी बुर्जुआ पक्ष और प्रतिनिधि पादरी समूह के अड़ियल रवैये व लगातार बढ़ते दबाव में तार्दिनोना थियेटर को तोड़ने का आदेश दिया, जहाँ नैतिकवादियों के अनुसार सबसे अधिक अश्लील प्रदर्शन हुए.

सुधार के क्रम को उलट दिए जाने वाले समय में उत्तरी इटली मे सक्रिय कार्डिनल कार्लाे बोरोमियो ने ‘मिलान की संतानों को’ शैतान और पाप से बचाने के लिए कला को आध्यात्मिक शिक्षा का सबसे उच्च स्वरुप और थियेटर को धर्म विरोधी, ईश निंदा और अहंकार के प्रदर्शन का केन्द्र बताया. अपने सहयोगियों को लिखे एक पत्र के माध्यम से, जिसे मैं अनायास ही उद्धृत कर रहा हूँ, उसने अपने को कुछ इस तरह से अभिव्यक्त कियाः ‘‘शैतानी ताक़तों का विनाश करने के अपने सरोकारों को ध्यान में रखते हुए हमने घृणित संभाषणों से भरे पाठ्यांशों को जलाने, आम जनता की स्मृतियों से उन्हें मिटाने और साथ ही ऐसे लोगों पर जो इन पाठ्यांशों को प्रकाशित कर जनता तक पहुंचाते हैं अभियोग चलाने के सभी संभव प्रयास किये. फिर भी यह स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है कि जब हम आराम से थे, शैतान अपने नवीनतम षड़यंत्रों और चालाकियों के साथ पुनः सक्रिय हुआ. आँखें जो देखती हैं, वह इन किताबों को पढ़े जाने की तुलना में कहीं अधिक गहराई से आत्मा को प्रभावित करता है! किशोरों और युवतियों के मस्तिष्क के लिए किताबों में छपे मृत शब्दों से कितने अधिक विध्वंसकारी हैं उपयुक्त भाव-भंगिमाओं के साथ बोले जाने वाले शब्द. अतः अपने शहरों को थियेटर करने वालों से मुक्त कराना नितांत आवश्यक है ठीक उसी तरह जैसे हम अनचाही आत्माओं से पीछा छुड़ाते हैं.’>

इस तरह संकट का हल इसी आशा पर टिका है कि हमारे और युवा नाट्य प्रेमियों के निर्वासन की मुहिम चले तथा हास्य-व्यंग्य कलाकारों, रंगमंच की तामीर करने वालों को नया समूह उससे निश्चित रूप से अकल्पनीय लाभ तलाशे एवं इस जोर-जबर्दस्ती के खिलाफ नये प्रतिनिधित्व के रूप में आगे आये.

इन्टरनेशनल थियेटर इंस्टीट्यूट आई0 टी0 आई0, पेरिस विश्व रंगमंच दिवसः 27 मार्च, 2013
हिंदी अनुवाद: अखिलेश दीक्षित

Thursday, November 15, 2012

बहुभाषिक नहीं होने के खतरे


- गिरीश कारनाड

हमारी शिक्षा व्यवस्था का एकल भाषा आधारित होना बहुत ही भयानक है. जहां स्कूलों में बच्चे अंततः एक ही भाषा ‘अंग्रेजी’ में सीखने को बाध्य हैं. आखिर हमारे स्कूलों में सीखने का माध्यम एक ही भाषा क्यों है? मैंने अंग्रेजी दसवीं के बाद पढ़ी. बहुभाषिकता की योग्यता का तेजी से क्षरण बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण है. जबकि बच्चों में एक से अधिक भाषाओं के सीखने की क्षमता होती है और जो लोग बॉर्डर पर रहते हैं वे सब बहुत ही सहजता से कई भाषाएं बोल-समझ लेते हैं. बहुभाषिक होते हैं. यह कैसी बहुभाषिक विचित्र स्थिति है कि एक ओर जहां क्षेत्रीय भाषाओं में अनेको सेटेलाइट चैनल हैं तो वहीं दूसरी ओर अंग्रेजी सीखने और रोजगार की भाषा बनकर सभी भारतीय भाषाओं को लीलता जा रहा है. यह एक विरोधाभासी सचाई है कि एक ओर तो हमारी मातृभाषाएं ‘हंस और रो’ रही हैं जबकि हम अपने बच्चों को अंग्रेजी स्कूलों में भेजने की होड़ में लगे हैं ताकि वे मौजूदा रोजगार के बाजार में फिट हो सकें.

औपनिवेशिकरण ने हमारे जीवन और कलाओं पर गहरा प्रभाव डाला है. जाति के प्रति हमारी समझ, संस्कृति, कला और भाषा के जिन विचारों और अवधारणाओं के बीच हम रह रहे थे उसके नये मूल्यांकन को अंग्रेजी ने बहुत हद तक प्रभावित किया है. हम देखते हैं कि जहां नृत्य और संगीत जैसे कुछ कला रूप जटिल औपनिवेशिक संवाद के कारण और तेजी से विकसित होते हैं जबकि स्थापत्य एवं चित्रकला अपना आधार खो देते हैं. रंगमंच पर शेक्सपीयर का प्रभाव व्यापक तौर पर पड़ता है और पचास के दशक तक हमें ऐसी प्रभावशीलता वाला कोई भारतीय नाटक नहीं दिखाई देता. टैगोर जितने महान कवि हैं उतने ही महान नाटककार नहीं हैं. उनके नाटक दोयम दर्जें के हैं. उनके लिखे नाटकों में से कुछ ही नाटक पर काम हुआ है। बीते 50 साल में भारत ने बादल सरकार, मोहन राकेश और विजय तेंदुलकर जैसे तमाम नाटककार पैदा किए हैं. वे टैगोर से कहीं बेहतर हैं.

औपनिवेशिक आधुनिकता के कारण ही तकनीक के नये रूपों से हमारा परिचय हुआ जैसे कि पिं्रटिंग और फिल्म. लंबे समय तक गीत, संगीत और नृत्यों के भरमार की वजह से भारतीय फिल्मों की आलोचना की जाती रही है. पर ध्यान देने वाली बात है कि इसी एक विशेषता ने भारतीय फिल्मोद्योग को ‘हॉलीवुड की खुराक’ बनने से बचा लिया. जबकि यूरोपीयन सिनेमा हॉलीवुड से बच नहीं पाया. हां, सही है कि भारतीय सिनेमा ‘टाइटेनिक’ नहीं बना सकता. पर यह भी सच है कि हॉलीवुड भी ‘हम आपके हैं कौन’ का निर्माण नहीं कर सकता.

- अजीम प्रेमजी युनिवर्सिटी, मुम्बई में 8 नवंबर 2012 को दिए गए व्याख्यान का अंश. अनुवाद एवं प्रस्तुति: रंगवार्ता source : http://www.thehindu.com/news/states/karnataka/bemoaning-the-loss-of-bilingualism/article4078293.ece

Monday, September 17, 2012

जिंदगी से जुड़े बगैर अच्छा नाटक नहीं लिखा जा सकता


महेश दत्ताणी भारतीय नाटककारों में अग्रणी स्थान रखते हैं। 'फाइनल सॉल्यूशंस', 'डांस लाइक अ मैन', 'तारा' और 'थर्टी डेज इन सेप्टेंबर' जैसे नाटकों ने न सिर्फ उन्हें दुनिया भर में ख्याति दिलाई, बल्कि भारतीय रंग परिदृश्य पर गहरा असर भी डाला है। अभी कुछ दिनों पहले वह भोपाल नाट्य विद्यालय, मध्यप्रदेश के दीक्षांत समारोह में भाग लेने के लिए भोपाल गए थे। उनसे राजेश चन्द्र की बातचीत:

पिछले 20-25 वर्षों में आपकी नजर में भारतीय रंगमंच ने क्या खोया और क्या पाया है?

भारतीय रंगमंच एक बहुत बड़ा क्षेत्र है। हर प्रदेश में कई तरह के काम हो रहे हैं। मैं अपने नजरिए की बात करूंगा। इधर एक कोशिश रिवाइवल की मुझे जरूर दिखाई पड़ती है। जो फॉर्म लुप्त हो रहे हैं, उन्हें बचाने की कोशिश हो रही है, पर इतना करना ही काफी नहीं है। हम अपनी लोक नाट्य परंपराओं को आगे नहीं बढ़ा पा रहे। बैले जो पचास साल पहले था, हम उसमें किसी तरह का बदलाव नहीं ला सके। यह उनकी सेहत के लिए अच्छा नहीं है। परंपरा रिवाइव हो रही है, उसमें निरंतरता है, यह बात मुझे बहुत अच्छी लगती है।

पिछले 50 वर्षों के रंगमंच को भारतीयता की खोज का रंगमंच कहा जा रहा है। इस विषय में आप क्या सोचते हैं?

यह सब मुझे बहुत बनावटी नजर आता है। असल में भारतीयता की खोज एक राजनीतिक मुद्दा है। यह सांस्कृतिक मुद्दा नहीं है। भारत, अफगानिस्तान या पाकिस्तान की सांस्कृतिक पहचान क्या अलग-अलग है? मुझे यह विचारधारा काफी पिछड़ी हुई लगती है। आज दुनिया भर में देशों की सीमाएं खत्म हो रही हैं। असल में भारतीयता का नारा देश को हिंदुत्व की लाइन पर आगे बढ़ाने के मकसद से ही लगाया जा रहा है। और लोग हैं कि बिना उसकी असलियत को समझे ही उसकी रौ में बहे चले जा रहे हैं।

नाटक लिखते वक्त क्या आप किसी विशेष दर्शक वर्ग को ध्यान में रखते हैं? या सब स्वाभाविक ढंग से होता चला जाता है।

यह बहुत ही मुश्किल सवाल पूछा आपने। आप अगर यह सोचते हैं कि आप अपने दर्शक को सचमुच जानते-समझते हैं, तो यह आपकी एक बहुत बड़ी गलतफहमी है। यह कहना भी कि मैं तो सिर्फ अपने लिए लिखता हूं, बिलकुल गलत होगा। मेरी व्यक्तिगत इच्छा तो यह है कि मैं अपनी अभिव्यक्ति की आजादी का ज्यादा से ज्यादा जनता के मुद्दों को उठाने में उपयोग करूं। मुझे भी अच्छा लगता है जब मेरे नाटकों को देखने बड़ी संख्या में दर्शक पहुंचते हैं और उनकी सराहना भी करते हैं।

नाटक लिखना आपके लिए कविता, कहानी या उपन्यास जैसी दूसरी विधाओं में लिखने से किस तरह अलग है?

यह बहुत अलग है। सच बात यह है कि नाटक की अंतिम यात्रा कागज पर नहीं मंच पर है। यह याद रखना पड़ता है कि आपके बाद भी कई लोग आएंगे जो उसमें काफी कुछ जोड़ सकते हैं। इसलिए आप उसे किसी बंदरिया के बच्चे की तरह चिपटाकर नहीं रख सकते। नाटककार नाटक के लिए मां की तरह है, जिसकी सोच यही होती है कि उसका नाटक फले-फूले, विकसित हो, उसका निरंतर विकास होता रहे। नाटक लिखते समय इन चीजों का ध्यान रखा जाना जरूरी होता है।

पारंपरिक नाट्य रूपों के तेजी से बढ़ते इस्तेमाल पर क्या कहना चाहेंगे?

यह सब ग्रांट मिलने की वजह से हो रहा है। लोग अनुदान में मिलने वाले पैसों के कारण किसी परंपरागत नाट्य शैली को पकड़कर काम करना चाहते हैं। इसके मूल में सिर्फ व्यावसायिकता है। यह बात अलग है कि वे ऐसा भ्रम जरूर फैलाए रखते हैं मानो सांस्कृतिक परंपरा को बचाने का महान काम कर रहे हैं।

आज भी अच्छे और गंभीर नाटकों के लिए हमें दुनिया की दूसरी भाषाओं की तरफ जाना पड़ता है। नाटक की ओर हमारी हिंदी के लेखकों का झुकाव क्यों नहीं है?

मुझे यह कहते हुए शर्म आती है कि मैं अंग्रेजी में नाटक लिखता हूं। पर यह मेरी मजबूरी है। दूसरी भाषाओं में लिखने वालों को उतना महत्व नहीं मिलता। सामाजिक क्षेत्र में जो बाधाएं हैं, उन्हें मिलकर ही समाप्त किया जा सकता है। यह समझना होगा कि हमें जड़ों के साथ शाखों और पत्तों की भी उतनी ही जरूरत है। लेखक के लिए जरूरी है कि वह खुद को अपने समाज का साक्षी समझे, उसका भागीदार समझे, उसके संस्कारों से जुड़े। जब तक हम जनता की जिंदगी से, उस जिंदगी की सच्चाइयों से खुद को नहीं जोड़ेंगे, अच्छा नाटक कैसे लिख पाएंगे? गुफाओं में बैठकर कविता तो लिखी जा सकती है, नाटक नहीं।

अभी किस विषय पर काम कर रहे हैं?

इन दिनों दो नाटक लिखे हैं - एक लिंलेट दुबे को दिया है जो नवंबर में शुरू होगा। एक और नाटक है जो मैं खुद निर्देशित करूंगा। एक निर्देशक के तौर पर मुझे उसमें बहुत दिलचस्पी है। मुंबई में जो हालत है, लोग यह दिखाने की कोशिश करते हैं कि वे सफल हैं, पर असलियत कुछ और ही होती है। 'द बिग फैट सिटी' नाटक नवंबर में शुरू करूंगा, जिसे फरवरी तक मुंबई में ओपन करने की योजना है। मैं एक फ्रीलांसर हूं। मुझे किसी के साथ बंधने में घुटन होती है। बंधकर आप संगठन की सेवा कर सकते हैं, नाटक की नहीं।

(नवभारत टाइम्स | Sep 8, 2012 से साभार)

Sunday, August 26, 2012

भाजपाई विरोध के चलते भोपाल में ‘तमाशा न हुआ’


23 अगस्त, 2012: भारतीय जनता पार्टी की निगाह में जनतंत्र और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए कितनी जगह है, इसका अंदाजा भोपाल की ताजा घटना से लगाया जा सकता है। वहां भारत भवन में रंगमंडल थिएटर उत्सव के दौरान बीते शनिवार की शाम भानु भारती के निर्देशन में ‘तमाशा न हुआ’ नाटक का मंचन था। रवींद्रनाथ ठाकुर के प्रसिद्ध नाटक ‘मुक्तधारा’ पर आधारित इस नाटक में विभिन्न पात्रों के कुछ संवाद भाजपा के सांस्कृतिक प्रकोष्ठ के संयोजक को इतने आपत्तिजनक लगे कि उन्होंने उसे राष्ट्रविरोधी तक घोषित कर डाला और मामला उच्चाधिकारियों तक ले जाने की बात कही।

इसके पहले भाजपा ने ‘नील डाउन ऐंड लिक माइ फीट’ नाटक पर भी आपत्ति जताते हुए उसे ‘पवित्र’ भारत भवन में मंचित होने से रोक दिया था। मध्यप्रदेश में भाजपा की सरकार है, इसलिए शायद उसके कार्यकर्ताओं को अपने मन-मुताबिक सांस्कृतिक पहरेदारी करने में सुविधा हो सकती है। लेकिन जिस तरह वे ‘तमाशा न हुआ’ नाटक को राष्ट्रविरोधी बता कर उसके खिलाफ वितंडा खड़ा करने में लगे हैं, वह किसी के गले नहीं उतर रहा। यह नाटक देश के अलग-अलग हिस्सों में कई बार मंचित हो चुका है और हर बार उसकी सराहना हुई है। इसमें ‘मुक्तधारा’ के पूर्वाभ्यास के बहाने गांधीवाद, मार्क्सवाद, रवींद्रनाथ ठाकुर के विचार, यांत्रिकता, मनुष्य, प्रकृति और विज्ञान के बीच संबंधों पर किसी भी खास विचारधारा में बंधे बिना निर्देशक और पात्रों के बीच गंभीर बहस होती है। कोई भी सुलझा हुआ व्यक्ति ऐसी बहस को एक स्वस्थ और जनतांत्रिक समाज की निशानी मानेगा। लेकिन भाजपा के सांस्कृतिक पहरुओं को केवल एक बात याद रह जाती है कि इसमें एक जगह भारत-बांग्लादेश सीमा पर फरक्का बांध और चिनाब नदी पर बगलिहार पनबिजली परियोजनाओं के कारण बांग्लादेश और पाकिस्तान के नागरिकों के सामने पैदा होने वाले संकट की चर्चा की गई है। सिर्फ इसी वजह से भाजपा ने इस नाटक को यहां के बजाय पाकिस्तान में मंचित करने की सलाह दे डाली।

विचित्र है कि जिन बहसों और बातचीत से एक प्रगतिशील समाज की बुनियाद मजबूत होती है, वे भाजपा के अनुयायियों को राष्ट्रविरोधी लगती हैं। सवाल है कि क्या वे ऐसा समाज चाहते हैं जहां विचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और बहस के लिए कोई जगह नहीं होगी? अब तक आमतौर पर आरएसएस से जुड़े बजरंग दल, विश्व हिंदू परिषद या श्रीराम सेना जैसे कट््टरपंथी धड़े ऐसी असहिष्णुता दर्शाते रहे हैं। मकबूल फिदा हुसेन के चित्रों की प्रदर्शनी से लेकर कला माध्यमों में मौजूद प्रगतिशील मूल्य उन्हें भारतीय संस्कृति के लिए खतरा नजर आते हैं और उनका विरोध करने के लिए वे हिंसा का सहारा भी लेते रहे हैं। लेकिन सच यह है कि खुद भाजपा भी भावनात्मक मसलों को अपनी राजनीति चमकाने के लिहाज से फायदेमंद मानती रही है, इसलिए उन्हें मुद्दा बनाने का वह कोई मौका नहीं चूकती। सत्ता में आने पर अपने एजेंडे पर अमल करना उसके लिए और सुविधाजनक हो जाता है।

गौरतलब है कि मध्यप्रदेश में संस्कृति की रक्षा के नाम पर सभी सरकारी और स्थानीय निकायों में ‘वंदे मातरम’ का गायन अनिवार्य कर दिया गया है, स्कूल-कॉलेजों में फैशन शो पर पाबंदी लगा दी गई है और करीब एक दर्जन शहरों को पवित्र घोषित करके वहां खाने-पीने की चीजों को लेकर कई तरह के फरमान जारी किए गए हैं। देश की जनतांत्रिक राजनीति में खुद को एक ताकतवर पक्ष मानने वाली भाजपा को यह सोचना चाहिए कि अभिव्यक्ति की आजादी का सम्मान करना उसका पहला दायित्व है।

जनसत्ता, दिल्ली से साभार

Sunday, August 12, 2012

आईना ढूंढे है अपना चेहरा


संजय कृष्ण
एक सार्वकालिक प्रश्न यह है कि हिंदी लेखकों की तरह हिंदी का रंगकर्मी भी अपने ही समाज से दूर है। यह बात बांग्ला, मराठी, मणिपुरी या तमिल रंगमंचों के साथ नहीं हैं। जिन्होंने एक्सआइएसएस में तीन दिनों तक नाटकों को देखा होगा, उन्हें इस बात का बखूबी एहसास होगा कि रंगमंच विरोध का सबसे ताकतवर हथियार है।
रांची के रंगमंच पर बात करना आसान नहीं। रांची की जो बनावट और बुनावट है, संस्कृतियों का जो घालमेल है, उससे रांची का कोई अपना चेहरा नहीं बनता। आठ दशकों से ऊपर रंगमंच की यात्र में न जाने कितने पड़ाव आए, लेकिन कोई एक चेहरा मुक्कमल नहीं बन पाया है, जबकि आधा दर्जन नाट्य संस्थाएं रह-रह कर सक्रिय रही हैं। आज भी कुछ संस्थाएं सक्रिय हैं, जो रह-रहकर अपनी उपस्थिति दर्ज कराती हैं।
पांच-सालों के दौरान 2012 का यह साल इस मामले में काफी खुशकिस्मत रहा। अखड़ा ने मार्च में तीन दिनी नाट्योत्सव का आयोजन कराया। अजय मलकानी की संस्था युवा रंगमंच ने भी जून में तीन दिनों तक वैरागी मन हारा का मंचन किया। केंद्रीय पुस्तकालय में रंगवार्ता ने विभारानी की एकल प्रस्तुति का आयोजन कराया, लेकिन अजय मलकानी की प्रस्तुति में दर्शकों का टोटा रहा तो केंद्रीय पुस्तकालय में पहली बार लोगों ने सौ-सौ रुपये सहयोग देकर नाटक देखा। एक्सआइएसएस के हॉल में भी अखड़ा के तीन दिनी उत्सव में दर्शकों की कोई कमी नहीं रही। क्यों? रंगकर्मी बार-बार दर्शकों का रोना रोते हैं।
यह समस्या पूरे हिंदी पट्टी में है। रांची इससे अछूती नहीं है, लेकिन यह सवाल जरूर उठता है कि आखिर एक नाटक को देखने के लिए लोग पैसा देकर जाते हैं, दूसरे में नहीं। मलकानी ने तीन दिनों तक एक ही नाटक का मंचन किया। लेकिन उसका व्यापक प्रचार-प्रसार नहीं किया। दूसरे, जो विषय था, वह अब अप्रासंगिक है। जो दर्शकों को अपनी ओर खींच नहीं पाया।
रांची में दर्शकों की कमी नहीं हैं, क्योंकि रांची के एक कोने में विभा रानी के प्ले को देखने के लिए पूरा हॉल भर जाता है। एक सार्वकालिक प्रश्न यह है कि हिंदी लेखकों की तरह हिंदी का रंगकर्मी भी अपने ही समाज से दूर है। यह बात बांग्ला, मराठी, मणिपुरी या तमिल रंगमंचों के साथ नहीं हैं।
जिन्होंने एक्सआइएसएस में तीन दिनों तक नाटकों को देखा होगा, उन्हें इस बात का बखूबी एहसास होगा कि रंगमंच विरोध का सबसे ताकतवर हथियार है। पिछले दिनों मजलिस ने मेकॉन में एक नाटक पद्मा नदीर मांझी का मंचन कराया था। कोलकाता से टीम आई थी। आयोजक उदयन बसु ने बताया कि देखने के लिए पास सुविधा दी गई है, लेकिन सबको हिदायत भी दी गई है कि वे अपने साथ किसी और को लेकर न आएं।
उन्होंने चार सौ पास बांटे थे और इतनी ही बैठने की व्यवस्था की गई थी। नाटक संध्या छह बजे शुरू होने वाला था और हॉल सवा छह बजे भर गया। नाटक मछुआरों की जिंदगी को उकेरता है। क्या हिंदी का रंगमंच अपने लोगों की आवाज बन पाया है? क्या वह अपने लोगों को अपने साथ जोड़ पाया है? हिंदी लेखकों-आलोचकों की तरह वायवीय होकर अपना चेहरा नहीं ढूंढ सकता है।

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