RANGVARTA qrtly theatre & art magazine

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Monday, September 17, 2012

जिंदगी से जुड़े बगैर अच्छा नाटक नहीं लिखा जा सकता


महेश दत्ताणी भारतीय नाटककारों में अग्रणी स्थान रखते हैं। 'फाइनल सॉल्यूशंस', 'डांस लाइक अ मैन', 'तारा' और 'थर्टी डेज इन सेप्टेंबर' जैसे नाटकों ने न सिर्फ उन्हें दुनिया भर में ख्याति दिलाई, बल्कि भारतीय रंग परिदृश्य पर गहरा असर भी डाला है। अभी कुछ दिनों पहले वह भोपाल नाट्य विद्यालय, मध्यप्रदेश के दीक्षांत समारोह में भाग लेने के लिए भोपाल गए थे। उनसे राजेश चन्द्र की बातचीत:

पिछले 20-25 वर्षों में आपकी नजर में भारतीय रंगमंच ने क्या खोया और क्या पाया है?

भारतीय रंगमंच एक बहुत बड़ा क्षेत्र है। हर प्रदेश में कई तरह के काम हो रहे हैं। मैं अपने नजरिए की बात करूंगा। इधर एक कोशिश रिवाइवल की मुझे जरूर दिखाई पड़ती है। जो फॉर्म लुप्त हो रहे हैं, उन्हें बचाने की कोशिश हो रही है, पर इतना करना ही काफी नहीं है। हम अपनी लोक नाट्य परंपराओं को आगे नहीं बढ़ा पा रहे। बैले जो पचास साल पहले था, हम उसमें किसी तरह का बदलाव नहीं ला सके। यह उनकी सेहत के लिए अच्छा नहीं है। परंपरा रिवाइव हो रही है, उसमें निरंतरता है, यह बात मुझे बहुत अच्छी लगती है।

पिछले 50 वर्षों के रंगमंच को भारतीयता की खोज का रंगमंच कहा जा रहा है। इस विषय में आप क्या सोचते हैं?

यह सब मुझे बहुत बनावटी नजर आता है। असल में भारतीयता की खोज एक राजनीतिक मुद्दा है। यह सांस्कृतिक मुद्दा नहीं है। भारत, अफगानिस्तान या पाकिस्तान की सांस्कृतिक पहचान क्या अलग-अलग है? मुझे यह विचारधारा काफी पिछड़ी हुई लगती है। आज दुनिया भर में देशों की सीमाएं खत्म हो रही हैं। असल में भारतीयता का नारा देश को हिंदुत्व की लाइन पर आगे बढ़ाने के मकसद से ही लगाया जा रहा है। और लोग हैं कि बिना उसकी असलियत को समझे ही उसकी रौ में बहे चले जा रहे हैं।

नाटक लिखते वक्त क्या आप किसी विशेष दर्शक वर्ग को ध्यान में रखते हैं? या सब स्वाभाविक ढंग से होता चला जाता है।

यह बहुत ही मुश्किल सवाल पूछा आपने। आप अगर यह सोचते हैं कि आप अपने दर्शक को सचमुच जानते-समझते हैं, तो यह आपकी एक बहुत बड़ी गलतफहमी है। यह कहना भी कि मैं तो सिर्फ अपने लिए लिखता हूं, बिलकुल गलत होगा। मेरी व्यक्तिगत इच्छा तो यह है कि मैं अपनी अभिव्यक्ति की आजादी का ज्यादा से ज्यादा जनता के मुद्दों को उठाने में उपयोग करूं। मुझे भी अच्छा लगता है जब मेरे नाटकों को देखने बड़ी संख्या में दर्शक पहुंचते हैं और उनकी सराहना भी करते हैं।

नाटक लिखना आपके लिए कविता, कहानी या उपन्यास जैसी दूसरी विधाओं में लिखने से किस तरह अलग है?

यह बहुत अलग है। सच बात यह है कि नाटक की अंतिम यात्रा कागज पर नहीं मंच पर है। यह याद रखना पड़ता है कि आपके बाद भी कई लोग आएंगे जो उसमें काफी कुछ जोड़ सकते हैं। इसलिए आप उसे किसी बंदरिया के बच्चे की तरह चिपटाकर नहीं रख सकते। नाटककार नाटक के लिए मां की तरह है, जिसकी सोच यही होती है कि उसका नाटक फले-फूले, विकसित हो, उसका निरंतर विकास होता रहे। नाटक लिखते समय इन चीजों का ध्यान रखा जाना जरूरी होता है।

पारंपरिक नाट्य रूपों के तेजी से बढ़ते इस्तेमाल पर क्या कहना चाहेंगे?

यह सब ग्रांट मिलने की वजह से हो रहा है। लोग अनुदान में मिलने वाले पैसों के कारण किसी परंपरागत नाट्य शैली को पकड़कर काम करना चाहते हैं। इसके मूल में सिर्फ व्यावसायिकता है। यह बात अलग है कि वे ऐसा भ्रम जरूर फैलाए रखते हैं मानो सांस्कृतिक परंपरा को बचाने का महान काम कर रहे हैं।

आज भी अच्छे और गंभीर नाटकों के लिए हमें दुनिया की दूसरी भाषाओं की तरफ जाना पड़ता है। नाटक की ओर हमारी हिंदी के लेखकों का झुकाव क्यों नहीं है?

मुझे यह कहते हुए शर्म आती है कि मैं अंग्रेजी में नाटक लिखता हूं। पर यह मेरी मजबूरी है। दूसरी भाषाओं में लिखने वालों को उतना महत्व नहीं मिलता। सामाजिक क्षेत्र में जो बाधाएं हैं, उन्हें मिलकर ही समाप्त किया जा सकता है। यह समझना होगा कि हमें जड़ों के साथ शाखों और पत्तों की भी उतनी ही जरूरत है। लेखक के लिए जरूरी है कि वह खुद को अपने समाज का साक्षी समझे, उसका भागीदार समझे, उसके संस्कारों से जुड़े। जब तक हम जनता की जिंदगी से, उस जिंदगी की सच्चाइयों से खुद को नहीं जोड़ेंगे, अच्छा नाटक कैसे लिख पाएंगे? गुफाओं में बैठकर कविता तो लिखी जा सकती है, नाटक नहीं।

अभी किस विषय पर काम कर रहे हैं?

इन दिनों दो नाटक लिखे हैं - एक लिंलेट दुबे को दिया है जो नवंबर में शुरू होगा। एक और नाटक है जो मैं खुद निर्देशित करूंगा। एक निर्देशक के तौर पर मुझे उसमें बहुत दिलचस्पी है। मुंबई में जो हालत है, लोग यह दिखाने की कोशिश करते हैं कि वे सफल हैं, पर असलियत कुछ और ही होती है। 'द बिग फैट सिटी' नाटक नवंबर में शुरू करूंगा, जिसे फरवरी तक मुंबई में ओपन करने की योजना है। मैं एक फ्रीलांसर हूं। मुझे किसी के साथ बंधने में घुटन होती है। बंधकर आप संगठन की सेवा कर सकते हैं, नाटक की नहीं।

(नवभारत टाइम्स | Sep 8, 2012 से साभार)

Sunday, August 26, 2012

भाजपाई विरोध के चलते भोपाल में ‘तमाशा न हुआ’


23 अगस्त, 2012: भारतीय जनता पार्टी की निगाह में जनतंत्र और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए कितनी जगह है, इसका अंदाजा भोपाल की ताजा घटना से लगाया जा सकता है। वहां भारत भवन में रंगमंडल थिएटर उत्सव के दौरान बीते शनिवार की शाम भानु भारती के निर्देशन में ‘तमाशा न हुआ’ नाटक का मंचन था। रवींद्रनाथ ठाकुर के प्रसिद्ध नाटक ‘मुक्तधारा’ पर आधारित इस नाटक में विभिन्न पात्रों के कुछ संवाद भाजपा के सांस्कृतिक प्रकोष्ठ के संयोजक को इतने आपत्तिजनक लगे कि उन्होंने उसे राष्ट्रविरोधी तक घोषित कर डाला और मामला उच्चाधिकारियों तक ले जाने की बात कही।

इसके पहले भाजपा ने ‘नील डाउन ऐंड लिक माइ फीट’ नाटक पर भी आपत्ति जताते हुए उसे ‘पवित्र’ भारत भवन में मंचित होने से रोक दिया था। मध्यप्रदेश में भाजपा की सरकार है, इसलिए शायद उसके कार्यकर्ताओं को अपने मन-मुताबिक सांस्कृतिक पहरेदारी करने में सुविधा हो सकती है। लेकिन जिस तरह वे ‘तमाशा न हुआ’ नाटक को राष्ट्रविरोधी बता कर उसके खिलाफ वितंडा खड़ा करने में लगे हैं, वह किसी के गले नहीं उतर रहा। यह नाटक देश के अलग-अलग हिस्सों में कई बार मंचित हो चुका है और हर बार उसकी सराहना हुई है। इसमें ‘मुक्तधारा’ के पूर्वाभ्यास के बहाने गांधीवाद, मार्क्सवाद, रवींद्रनाथ ठाकुर के विचार, यांत्रिकता, मनुष्य, प्रकृति और विज्ञान के बीच संबंधों पर किसी भी खास विचारधारा में बंधे बिना निर्देशक और पात्रों के बीच गंभीर बहस होती है। कोई भी सुलझा हुआ व्यक्ति ऐसी बहस को एक स्वस्थ और जनतांत्रिक समाज की निशानी मानेगा। लेकिन भाजपा के सांस्कृतिक पहरुओं को केवल एक बात याद रह जाती है कि इसमें एक जगह भारत-बांग्लादेश सीमा पर फरक्का बांध और चिनाब नदी पर बगलिहार पनबिजली परियोजनाओं के कारण बांग्लादेश और पाकिस्तान के नागरिकों के सामने पैदा होने वाले संकट की चर्चा की गई है। सिर्फ इसी वजह से भाजपा ने इस नाटक को यहां के बजाय पाकिस्तान में मंचित करने की सलाह दे डाली।

विचित्र है कि जिन बहसों और बातचीत से एक प्रगतिशील समाज की बुनियाद मजबूत होती है, वे भाजपा के अनुयायियों को राष्ट्रविरोधी लगती हैं। सवाल है कि क्या वे ऐसा समाज चाहते हैं जहां विचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और बहस के लिए कोई जगह नहीं होगी? अब तक आमतौर पर आरएसएस से जुड़े बजरंग दल, विश्व हिंदू परिषद या श्रीराम सेना जैसे कट््टरपंथी धड़े ऐसी असहिष्णुता दर्शाते रहे हैं। मकबूल फिदा हुसेन के चित्रों की प्रदर्शनी से लेकर कला माध्यमों में मौजूद प्रगतिशील मूल्य उन्हें भारतीय संस्कृति के लिए खतरा नजर आते हैं और उनका विरोध करने के लिए वे हिंसा का सहारा भी लेते रहे हैं। लेकिन सच यह है कि खुद भाजपा भी भावनात्मक मसलों को अपनी राजनीति चमकाने के लिहाज से फायदेमंद मानती रही है, इसलिए उन्हें मुद्दा बनाने का वह कोई मौका नहीं चूकती। सत्ता में आने पर अपने एजेंडे पर अमल करना उसके लिए और सुविधाजनक हो जाता है।

गौरतलब है कि मध्यप्रदेश में संस्कृति की रक्षा के नाम पर सभी सरकारी और स्थानीय निकायों में ‘वंदे मातरम’ का गायन अनिवार्य कर दिया गया है, स्कूल-कॉलेजों में फैशन शो पर पाबंदी लगा दी गई है और करीब एक दर्जन शहरों को पवित्र घोषित करके वहां खाने-पीने की चीजों को लेकर कई तरह के फरमान जारी किए गए हैं। देश की जनतांत्रिक राजनीति में खुद को एक ताकतवर पक्ष मानने वाली भाजपा को यह सोचना चाहिए कि अभिव्यक्ति की आजादी का सम्मान करना उसका पहला दायित्व है।

जनसत्ता, दिल्ली से साभार

Sunday, August 12, 2012

आईना ढूंढे है अपना चेहरा


संजय कृष्ण
एक सार्वकालिक प्रश्न यह है कि हिंदी लेखकों की तरह हिंदी का रंगकर्मी भी अपने ही समाज से दूर है। यह बात बांग्ला, मराठी, मणिपुरी या तमिल रंगमंचों के साथ नहीं हैं। जिन्होंने एक्सआइएसएस में तीन दिनों तक नाटकों को देखा होगा, उन्हें इस बात का बखूबी एहसास होगा कि रंगमंच विरोध का सबसे ताकतवर हथियार है।
रांची के रंगमंच पर बात करना आसान नहीं। रांची की जो बनावट और बुनावट है, संस्कृतियों का जो घालमेल है, उससे रांची का कोई अपना चेहरा नहीं बनता। आठ दशकों से ऊपर रंगमंच की यात्र में न जाने कितने पड़ाव आए, लेकिन कोई एक चेहरा मुक्कमल नहीं बन पाया है, जबकि आधा दर्जन नाट्य संस्थाएं रह-रह कर सक्रिय रही हैं। आज भी कुछ संस्थाएं सक्रिय हैं, जो रह-रहकर अपनी उपस्थिति दर्ज कराती हैं।
पांच-सालों के दौरान 2012 का यह साल इस मामले में काफी खुशकिस्मत रहा। अखड़ा ने मार्च में तीन दिनी नाट्योत्सव का आयोजन कराया। अजय मलकानी की संस्था युवा रंगमंच ने भी जून में तीन दिनों तक वैरागी मन हारा का मंचन किया। केंद्रीय पुस्तकालय में रंगवार्ता ने विभारानी की एकल प्रस्तुति का आयोजन कराया, लेकिन अजय मलकानी की प्रस्तुति में दर्शकों का टोटा रहा तो केंद्रीय पुस्तकालय में पहली बार लोगों ने सौ-सौ रुपये सहयोग देकर नाटक देखा। एक्सआइएसएस के हॉल में भी अखड़ा के तीन दिनी उत्सव में दर्शकों की कोई कमी नहीं रही। क्यों? रंगकर्मी बार-बार दर्शकों का रोना रोते हैं।
यह समस्या पूरे हिंदी पट्टी में है। रांची इससे अछूती नहीं है, लेकिन यह सवाल जरूर उठता है कि आखिर एक नाटक को देखने के लिए लोग पैसा देकर जाते हैं, दूसरे में नहीं। मलकानी ने तीन दिनों तक एक ही नाटक का मंचन किया। लेकिन उसका व्यापक प्रचार-प्रसार नहीं किया। दूसरे, जो विषय था, वह अब अप्रासंगिक है। जो दर्शकों को अपनी ओर खींच नहीं पाया।
रांची में दर्शकों की कमी नहीं हैं, क्योंकि रांची के एक कोने में विभा रानी के प्ले को देखने के लिए पूरा हॉल भर जाता है। एक सार्वकालिक प्रश्न यह है कि हिंदी लेखकों की तरह हिंदी का रंगकर्मी भी अपने ही समाज से दूर है। यह बात बांग्ला, मराठी, मणिपुरी या तमिल रंगमंचों के साथ नहीं हैं।
जिन्होंने एक्सआइएसएस में तीन दिनों तक नाटकों को देखा होगा, उन्हें इस बात का बखूबी एहसास होगा कि रंगमंच विरोध का सबसे ताकतवर हथियार है। पिछले दिनों मजलिस ने मेकॉन में एक नाटक पद्मा नदीर मांझी का मंचन कराया था। कोलकाता से टीम आई थी। आयोजक उदयन बसु ने बताया कि देखने के लिए पास सुविधा दी गई है, लेकिन सबको हिदायत भी दी गई है कि वे अपने साथ किसी और को लेकर न आएं।
उन्होंने चार सौ पास बांटे थे और इतनी ही बैठने की व्यवस्था की गई थी। नाटक संध्या छह बजे शुरू होने वाला था और हॉल सवा छह बजे भर गया। नाटक मछुआरों की जिंदगी को उकेरता है। क्या हिंदी का रंगमंच अपने लोगों की आवाज बन पाया है? क्या वह अपने लोगों को अपने साथ जोड़ पाया है? हिंदी लेखकों-आलोचकों की तरह वायवीय होकर अपना चेहरा नहीं ढूंढ सकता है।

Friday, July 27, 2012

चायकोवस्की आज भी क्लीन में रहते हैं


प्योतर चायकोवस्की रूस के ऐसे महान् संगीतकार हैं, जिनका नाम पूरी दुनिया में प्रसिद्ध है। जैसे दुनिया भर के लोग रूसी कवि अलेक्सान्दर पूश्किन और रूसी लेखकों लेव तलस्तोय और फ़्योदर दस्तायेवस्की को जानते हैं, वैसे ही चायकोवस्की को भी जानते हैं। लेव तलस्तोय और प्योतर चायकोवस्की भी एक-दूसरे को अच्छी तरह जानते थे। वे मित्र थे और अक्सर कला सम्बन्धी चर्चाएँ और बहसें किया करते थे। लेव तलस्तोय अक्सर चायकोवस्की की संगीत रचनाओं को अपने घर पर पियानो पर बजाया करते थे। तलस्तोय और चायकोवस्की के एक और मित्र थे —अन्तोन चेख़व। चेख़व और चायकोवस्की के बीच लम्बे समय तक पत्र-व्यवहार भी हुआ। अन्तोन चेख़व ने अपना एक कहानी-संग्रह भी उन्हें समर्पित किया था। कभी चेख़व ने चायकोवस्की के बारे में कहा था — मैं उनका इतना ज़्यादा सम्मान करता हूँ कि मैं उनके घर के दरवाज़े पर दिन और रात खड़ा रह सकता हूँ ताकि प्योतर चायकोवस्की की एक झलक पा सकूँ। अगर पूरी रूसी संस्कृति की बात की जाए तो मैं उन्हें लेव तलस्तोय के बाद दूसरे नम्बर पर रूसी कला और संस्कृति का प्रतिनिधि मानता हूँ।

19 वीं शताब्दी में चायकोवस्की के जीवनकाल में ही रूस के अन्य कलाकार, नाटककार, लेखक, अभिनेता, संगीतकार और कवि आदि भी प्योतर चायकोवस्की का बड़ा सम्मान करते थे। इसका कारण शायद यह है कि उनका संगीत श्रोता के मन की गहराइयों में पूरी तरह से प्रवेश कर जाता है और उनकी संगीत-रचना का श्रोता अपने आसपास की दुनिया को भूलकर उसी संगीत में डूब जाता है। व्यक्ति का अपना दुख, अपना सुख, अपनी पीड़ा, अपनी ख़ुशी सब चायकोवस्की के संगीत के साथ एक-मेक हो जाती हैं।

प्योतर चायकोवस्की का जन्म मई 1840 में हुआ था। उनके पिता एक खदान में इंजीनियर थे। जब चायकोवस्की सिर्फ़ पाँच वर्ष के ही थे तो उनकी माँ ने उन्हें पियानो बजाना सिखाना शुरू कर दिया और फिर पियानो ही उनका जीवन हो गया। लेकिन उनके पिता उन्हें वकील बनाना चाहते थे, इसलिए स्कूली शिक्षा समाप्त करने के बाद उन्हें कानून की पढ़ाई करनी पड़ी। सेंट पीटर्सबर्ग में वे वकालत पढ़ने के साथ-साथ संगीत में भी डूबे रहे। कानून की शिक्षा पाने के बाद वे रूस के न्याय और कानून मंत्रालय में काम करने लगे।

परन्तु 22 वर्ष की उम्र में उन्होंने कानून-मंत्रालय की अपनी नौकरी छोड़ दी और सेंट पीटर्सबर्ग के संगीत महाविद्यालय में प्रवेश ले लिया। बस, उनके जीवन में आए इसी मोड़ ने उन्हें संगीतकार बना दिया। उन्होंने नया से नया संगीत रचना शुरू कर दिया। उनकी धुनें लोकप्रिय होने लगीं और लोग उन्हें पहचानने लगे। बस, इसी तरह धीरे-धीरे वे प्रसिद्ध होते चले गए।

प्योतर चायकोवस्की ने दस ओपेरा नाटिकाओं को संगीतबद्ध किया है। उन्होंने तीन बैले-नाटिकाओं का संगीत रचा है। सात सिम्फ़नियाँ रची हैं। उनकी और भी सैंकड़ों संगीत-रचनाएँ हैं। चायकोवस्की के संगीत पर आधारित नाटिकाएँ न केवल रूस और यूरोप में, बल्कि अमरीका, जापान और चीन जैसे देशों में भी बड़ी लोकप्रिय हैं। उन्हें संगीतकारों का संगीतकार कहा जाता है।

प्योतर चायकोवस्की ज़्यादातर सेंट पीटर्सबर्ग या मास्को में रहते थे या फिर वे विदेशों के दौरे करते रहते थे। लेकिन मास्को से सौ किलोमीटर दूर क्लीन नगर में उनका अपना घर था, जहाँ पर वे एकान्त में संगीत-रचना किया करते थे। इसी क्लीन नगर में आज चायकोवस्की संग्रहालय बना हुआ है। उस घर में जहाँ वे रहा करते थे, आज भी सब कुछ वैसा का वैसा है, जैसा उनके जीवनकाल में था। सारी दुनिया के संगीतप्रेमी चायकोवस्की से मिलने और उनका घर देखने के लिए आज भी क्लीन पहुँचते हैं।

इस घर में आज चायकोवस्की नहीं रहते, लेकिन जैसे उनकी आत्मा इस घर में बसी हुई है। हर पाँच साल में एक बार मास्को में प्योतर चायकोवस्की संगीत-प्रतियोगिता का आयोजन किया जाता है, जिसमें दुनिया भर के युवा और किशोर संगीतकार भाग लेते हैं।

सन् 2015 में प्योतर चायकोवस्की की 175 वीं जयन्ती मनाई जाएगी। दुनिया भर के संगीत-प्रेमी यह चाहते हैं कि सन् 2015 के साल को 'प्योतर चायकोवस्की वर्ष' घोषित कर दिया जाए।

http://hindi.ruvr.ru/2012_07_22/82490792/ से साभार

Thursday, July 26, 2012

जहां रंगमंच पानी में बहता है


जर्मनी के हर्जोगटम लाऊएनबर्ग जिले, जिसे डची ऑफ लाऊएनबर्ग के नाम से भी जाना जाता है, में ग्रीष्म ऋतु हर साल अपने साथ उत्सवों का माहौल लेकर आती है। इन उत्सवों का संस्कृति तथा प्रकृति से गहरा संबंध है। ‘कुलतरसोमर एम कनाल’ नामक एक उत्सव वर्ष 2006 से यहां हर वर्ष आयोजित किया जा रहा है।

इस उत्सव का खास आकर्षण एक रोविंग थिएटर (पानी में बहता रंगमंच) है जिसमें दर्शकों को स्कालसी नहर में एक दृश्य से दूसरे दृश्य तक नाव को खेते हुए जाना पड़ता है। यह स्थान ऐतिहासिक कस्बे रात्जबर्ग के दक्षिण-पूर्व में स्थित है। फैस्टीवल के डायरैक्टर फ्रैंक डयूवैल के अनुसार, ‘‘यह उत्सव केवल लाऊएनबर्ग में ही आयोजित हो सकता है क्योंकि यहां प्रकृति तथा भूदृश्य उत्सव की विषय वस्तु को तय करते हैं। झीलें, जंगल तथा स्थान हर चीज अपनी कहानी कहती है जबकि संगीत, रंगमंच तथा चित्र उन्हें जरा विस्तार से समझाते हैं।’’

1300 वर्ग किलोमीटर में फैले हर्जोगटम लाऊएनबर्ग जिले का नाम मध्यकाल के डची (सामंती इलाका) ऑफ साक्स-लाऊएनबर्ग पर पड़ा है। 1864 में दूसरे स्क्लेसविग युद्ध के पश्चात इस पर फारस का कब्जा हो गया और 1876 में इसे जर्मनी के उत्तरी राज्य स्क्लेसविच-होल्सटाइन में शामिल कर लिया गया। हैम्बर्ग शहर के करीब स्थित डची ऑफ लाऊएनबर्ग की 48 झीलें तथा साकसेनवाल्ड का विशाल जंगली क्षेत्र प्रकृति की सुंदरता को निहारने के इच्छुक पर्यटकों में बेहद लोकप्रिय है।

हालांकि ग्रीष्म ऋतु में यहां की रईस संस्कृति की झलक पेश करते विभिन्न स्थानों को भी देखा जा सकता है। इनमें वोटरसन का किला भी शामिल है। लाऊएनबर्ग जिले की राजधानी रात्जबर्ग की स्थापना 1143 में हुई थी। जल्द ही यह कस्बा हैनरी द लायन के शासन का हिस्सा बन गया जिन्होंने 1165 में यहां रोमनेस्क्यू गिरजाघर का निर्माण करवाया। यह ऐतिहासिक गिरजाघर पुराने कस्बे के उत्तरी हिस्से में स्थित है। इसी गिरजाघर के प्रांगण में ए.पॉल वैबर म्यूजियम भी स्थित है। इस म्यूजियम में 300 लिथोग्राफ्स (पाषाण से उकेरे चित्र या लेख), ड्राइंग्स तथा ऑयल पेंटिंग्स प्रदर्शित हैं।

म्यूजियम में प्रदर्शित ऑयल पेंटिंग्स के कलाकारों में से अधिकतर को रात्जबर्ग के निकट स्थित एक छोटे से गांव स्करेत्सटेकेन में रहते थे। जुलाई महीने के अंत में यहां आयोजित होने वाला रासेसबर्ग बाइलाग मिडेवियल नामक रंगारंग उत्सव पर्यटकों का खूब मनोरंजन करता है जहां वाइकिंग, रोमन, नोर्मन तथा अन्य लड़ाकू वेशभूषाओं में सजे कलाकार लड़ाइयों के नकली दृश्य पेश करते हैं। यहीं एक कस्बे मोएलन में टिल यूलैनस्पीगल नामक एक मसखरा बहुत लोकप्रिय है। कुछ का मानना है कि यह महज एक काल्पनिक व्यक्तित्व है परंतु आज भी यहां के कई लोग मानते हैं कि यह नटखट तथा शरारती व्यक्ति वास्तव में हुआ करता था।

मान्यता के अनुसार सन् 1350 में मोएलन में उसकी मौत प्लेग के कारण हुई थी। वह लोगों का मजाक उड़ाने का कोई मौका हाथ से जाने नहीं देता था जिसमें वह उनकी बुराइयों, लालच तथा मूर्खता को उजागर करता था। मोएलन में वह हर कहीं दिखता है जहां टिल यूलैनस्पीगल म्यूजियम भी स्थित है। यहां एक स्थान पर उसकी प्रतिमा भी स्थापित है। मान्यता है कि इसे एक साथ दोनों तरफ से रगडऩे पर भाग्योदय होता है। इस कस्बे में प्रत्येक तीन साल पर यूलैनस्पीगल उत्सव का आयोजन भी होता है। यह उत्सव इस साल भी आयोजित हो रहा है जो 9 से 18 अगस्त तक चलेगा।

पंजाब केसरी से साभार

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