RANGVARTA qrtly theatre & art magazine

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Tuesday, June 12, 2012

हर शनिवार, 19 साल से चल रहा है नाटक


शहर गोरखपुर के रेलवे स्टेशन से बमुश्किल डेढ़ किमी दूर, गर्मियों की सुबह में किशोरवय के कुछ शौकिया रंगकर्मी बरगद के दो विशाल वृक्षों को जोड़कर बनाए गए मिट्टी के अस्थायी मंच पर झाड़ू लगा रहे हैं. पेड़ों के तनों से बांधकर परदा लगाया जा रहा है और मंच से नीचे खिचड़ी दाढ़ी और बालों वाला एक शख्स छोटी-सी मेज पर एक महिला की तस्वीर सजाते हुए अचानक अपनी नम आंखें साफ करने लगता है. पीछे से कोई लड़का पूछता है, ''दादा! ये तो रिकॉर्ड होगा. इतना लंबा टाइम तक कोई और नाटक थोड़े किया होगा?'' दादा घूमकर उसे देखते हैं, ''डायलॉग याद करो. ऐ चक्कर में मत पड़ो कि रिकॉर्ड बना है.'' दादा यानी 55 बरस के के.सी. सेन के लिए यह रिकॉर्ड भले ही रोमांच भर देने वाली बात न हो, लेकिन जरा सोचिए कि अगर कुछ रंगकर्मी पिछले 19 सालों से हर शनिवार सुबह बिना क्रमभंग के नाटक कर रहे हों तो क्या यह बड़ी बात नहीं है? कड़ाके की धूप, ठंड या बारिश कुछ भी हो, ये सिलसिला पिछले 1,000 हफ्तों से अनवरत जारी हो और वह भी इसलिए कि इस शहर को एक ऑडिटोरियम मिल जाए, जहां नाटक करने वाले अपनी प्रस्तुतियां कर सकें. क्या यह सचमुच 'कुछ खास' नहीं है? हालांकि सेन से पूछिए तो वे अनसुना कर देंगे. उनके लिए ये सिलसिला अब एक लड़ाई में बदल चुका है. इसे जारी रखने के लिए रेलकर्मी सेन ने प्रमोशन से इनकार कर दिया क्योंकि तब उन्हें शहर से बाहर जाना पड़ता. 19 साल पहले जब विश्व रंगमंच दिवस के मौके पर उन्होंने इस आंदोलन का संकल्प लिया, तब उनकी पत्नी माला अपने दो नन्हे बच्चों के साथ हौसला अफजाई के लिए हर शनिवार यहां आती थीं. अब बड़ा बेटा कल्याण सेन नाटकों में अभिनय और निर्देशन कर देशभर के नाट्य महोत्सवों में पुरस्कार जीत रहा है मगर कैंसर से लड़ते हुए माला गत वर्ष चल बसीं. 1986 में प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री (अब दिवंगत) वीरबहादुर सिंह ने गोरखपुर में 5.4 करोड़ रु. की लागत से एक अत्याधुनिक प्रेक्षागृह व आर्ट गैलरी के निर्माण की घोषणा की थी. काम शुरू भी हुआ, लेकिन उनकी अचानक मृत्यु के बाद वह ठप हो गया. अधूरे प्रेक्षागृह में जंगल उगने लगा. सेन और उनके साथियों ने 1993 में विश्व रंगमंच दिवस के मौके पर रंगाश्रम के जरिए प्रेक्षागृह के निर्माण होने तक हर शनिवार एक नाट्य प्रस्तुति करने का अनोखा संकल्प लिया था और शनिवार 19 मई को मुंशी प्रेमचंद की कहानी 'सवा सेर गेहूं' की प्रस्तुति इस रंगयात्रा की 1,000वीं कड़ी थी. इसमें बतौर मुख्य अतिथि मौजूद सांसद योगी आदित्यनाथ कहते हैं, ''मैंने ऐसे आंदोलन बहुत कम देखे हैं, जिसमें कुछ लोग शहर की जरूरतों के लिए खुद तपस्या कर रहे हों.'' योगी अब जमीन के स्वामियों और शासन से संवाद की नई कोशिश कर रहे हैं ताकि कानूनी गतिरोध दूर हो सके. मगर गोरखपुर विवि के ललित कला विभाग के एसोसिएट प्रो. डॉ. भारत भूषण सवाल करते हैं, ''क्या सारी जिम्मेदारी रंगाश्रम की ही है? उस शहर की जिम्मेदारी कुछ नहीं, जिसके लिए वे यह तपस्या कर रहे हैं?'' सेन और उनके सहयोगी विजय सिंह, पानमती शर्मा और सतीश वर्मा अगली प्रस्तुति की पटकथा पर बहस कर रहे हैं. कल्याण को पीलिया है, मगर 1,000वीं प्रस्तुति के लिए वह भी आया. विजय कहते हैं, ''दादा तो कबीर की तरह घर फूंककर अलख जगा रहे हैं.'' पर सवाल फिर भी वही है कि जिन लोगों के लिए अलख जगाई जा रही है, वे कहां हैं? (आज तक डॉट कॉम से साभार)

Friday, February 3, 2012

अगाथा क्रिस्टी दिलों पर राज करता है एक नाम..


अगाथा..यही नाम था आज से दो साल पहले केंद्र सरकार में मंत्री पद की शपथ ले रही उस छोटे से कद की और किसी बच्ची की तरह दिखने वाली युवा लड़की का। वह वरिष्ठ राजनीतिज्ञ एवं केंद्रीय मंत्री रह चुके पी.ए. संगमा की बेटी थी। संगमा ने अपनी बेटी का नाम महान ब्रिटिश उपन्यासकार अगाथा क्रिस्टी के नाम पर रखा था, जिनका नाम गिनीज बुक में अब तक की सबसे ज्यादा बिकने वाली किताबों के लेखक के रूप में दर्ज है। इसकी बानगी इस तथ्य से मिल जाती है कि उनकी लिखी किताबों की 400 करोड़ से ज्यादा प्रतियां बिक चुकी हैं और उनके उपन्यासों, नाटकों व कहानियों का दुनिया की 103 भाषाओं में अनुवाद हुआ है।

अनुवाद के सूचकांक ‘इंडेक्स ट्रांसलेशनम’ के मुताबिक, दुनिया के किसी भी लेखक की रचनाओं का इतना अनुवाद नहीं हुआ, जितना अगाथा क्रिस्टी के लेखन का।

अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है कि दुनिया में संगमा अकेले ऐसे व्यक्ति नहीं होंगे, जो अगाथा क्रिस्टी के लिए इतनी दीवानगी रखते हों कि बेटी का नाम भी उनके नाम पर रख दें। यह संख्या कई करोड़ में है। क्या कहेंगे उस लेखक के बारे में, जिसके लिखे नाटक ‘माउसट्रैप’ का मंचन लंदन के एम्बेसडर थिएटर में 25 नवंबर, 1952 को शुरू हुआ, जो 60 साल बाद आज भी जारी है और जिसका वहां पर अब तक 23 हजार बार मंचन हो चुका है। मौत के 25 साल बाद भी अगाथा लोगों के दिलोदिमाग में जिंदा हैं। लोग उन्हें ‘मर्डर मिस्ट्री क्वीन’ कहते हैं। उनके लेखन की खास बात यह कि यह साफ-सुथरा है, शालीन है। अगाथा ने कथानक में कहीं भी उत्तेजक दृश्य या संवाद नहीं रखे हैं, जैसा कि अधिकतर मर्डर मिस्ट्री लेखक करते हैं। अगाथा का लिखा हुआ इसलिए पढ़ा जाता है कि वह पढ़ने वाले के दिमाग को झिंझोड़ कर रख देता है, उसे मशक्कत करने पर मजबूर करता है। पाठक अंदाजा लगाता रह जाता है, लेकिन वहां तक नहीं पहुंच पाता, जहां तक अगाथा सोच चुकी होती है। अगाथा का लिखा बार-बार पढ़ो तो भी पुराना नहीं लगता। उनके दोनों मुख्य पात्र मिस मार्पल और हरक्यूल पोयरो इतने जीवंत हैं कि पाठक को अपने आसपास नजर आते हैं।

तीन भाई-बहनों में सबसे छोटी अगाथा मैरी क्लारिसा मिलर 15 सितंबर, 1890 को ब्रिटिश काउंटी डेवशनर के टॉर्क शहर में पैदा हुईं। उनके पिता फ्रेडरिक मिलर न्यूयॉर्क में स्टॉक ब्रोकर थे, लेकिन अगाथा ने अमेरिकी नागरिकता कभी नहीं चाही और न ही खुद को कभी अमेरिकी बताया। वे अंत तक ब्रिटिश नागरिक रहीं। अगाथा ने आत्मकथा में लिखा है कि उनका बचपन बहुत खुशहाल बीता। बहुत कम लोग जानते हैं कि अगाथा कभी स्कूल नहीं गईं। घर पर ही उनकी शिक्षा दीक्षा हुई और इसके स्तर से कोई समझौता नहीं किया गया। उनकी मां का मानना था कि बच्चों को आठ साल की उम्र तक पढ़ना लिखना नहीं सीखना चाहिए, लेकिन अगाथा ने चार साल की उम्र में ही पढ़ना सीख लिया था। उनके पिता कहानियों में पहेलियां बुझाकर उन्हें गणित सिखाया करते, वहीं पूरा परिवार सवाल जवाब वाले गेम्स खेलता। अगाथा बचपन में ही कहानियां गढ़ने लगी थीं। उन्होंने अपनी कल्पना में कई सहेलियां बना ली थीं, जो अलग-अलग स्वभाव की थीं। इसी तरह उनकी कल्पनाओं में एक स्कूल भी था। बड़ी होने के बाद भी ये कल्पनाएं उनके दिमाग में चलती रहीं और उनके उपन्यासों के पात्रों का आधार बनीं।

जीवन के हर मोड़ पर सफल रहने वाली अगाथा का पहला वैवाहिक जीवन उतना सफल नहीं रहा। उन्होंने प्रेम विवाह किया था। हालांकि उनका प्रेम प्रसंग भी बेहद अशांति भरा रहा, लेकिन हर बात को अनदेखा करते हुए 1914 में उन्होंने रॉयल एयरफोर्स के पायलट आर्चीबाल्ड क्रिस्टी का हाथ थाम लिया। 1926 में अगाथा को पता चला कि उनके पति का किसी से अफेयर चल रहा है। अगाथा यह धोखा सहन नहीं कर पाईं और इसके दो साल बाद अपनी बेटी रोजालिंड को लेकर आर्चीबाल्ड क्रिस्टी से अलग हो गईं, लेकिन पहले पति का नाम उन्होंने अपने नाम के साथ हमेशा लगाए रखा। यहां तक कि अपने दूसरे विवाह के बाद भी।

अगाथा के लेखन में खास बात यह है कि उनके अपने जीवन के हालात एवं घटनाओं की छवि उनके कथानकों एवं पात्रों में नजर आती है। उनकी रचनाओं में सेटिंग्स अक्सर ऐसी हैं, जिनसे वह खुद परिचित रहीं। जैसे, आर्चीबाल्ड से अलग होने के बाद अगाथा ने 1930 में मैक्स मैलोवन नाम के पुरातत्वशास्त्री से विवाह किया था। उनका दूसरा वैवाहिक जीवन बेहद सुखी रहा, खासकर शुरुआती दौर में, जब वे पति के साथ कई बार आर्कियोलॉजिकल साइट्स पर इराक, तुर्की व मिस्र जैसे देशों में गईं। उनके कई उपन्यास व कहानियां ऐसी हैं, जिनमें सेटिंग्स इन्हीं इलाकों की हैं। उनका बेहद चर्चित उपन्यास ‘मर्डर ऑन द ओरिएंट एक्सप्रेस’ तुर्की के एक होटल में बैठकर लिखा गया था।

इसी तरह, उनकी अधिकतर रचनाओं में हत्याएं जहर देकर अंजाम दी गई हैं। इसकी बड़ी वजह यह कि जीवन में दो बार अगाथा का वास्ता ऐसे रसायनों से पड़ा था। पहले विश्वयुद्ध के दौरान उन्होंने एक अस्पताल में नर्स की नौकरी की थी, जिसे वे अपनी ज़िन्दगी का सबसे संतोषप्रद काम बताती थीं। दूसरे विश्वयुद्ध में उन्होंने एक अस्पताल की फार्मेसी में नौकरी की। इस दौरान दवाओं एवं रसायनों के बारे में मिली जानकारी उनके लेखन कार्य में सहायक बनी। एक और उदाहरण चेशर काउंटी स्थित एबनी हॉल का है, जो उनके जीजा का घर था। वहां वे कई बार रहने जाती थीं। उनके दो कथानकों में सेटिंग्स उसी घर की हैं। अगाथा ने सिर्फ रहस्य रोमांच का लेखन किया हो, ऐसा नहीं है। उन्होंने छह रोमांटिक उपन्यास भी लिखे, लेकिन मैरी वेस्टमाकॉट के छद्म नाम से। अपना असली नाम उन्होंने सिर्फ मर्डर मिस्ट्रीज में ही इस्तेमाल किया। और यही वो नाम था जो दुनियाभर में चमका। वो नाम, जो अमेरिका के रहस्य लेखकों के सबसे बड़े सम्मान ‘ग्रैंड मास्टर अवॉर्ड’ का सबसे पहला हकदार बना। वो नाम, जिसकी लिखी अधिकतर रचनाओं पर फिल्में बन चुकी हैं और उनमें से कुछ पर तो एक बार नहीं, बल्कि कई कई बार फिल्में बनी हैं। वो नाम, जिसे उसकी साहित्यिक उपलिधयों के लिए कमांडर ऑफ द ऑर्डर ऑफ द ब्रिटिश एम्पायर जैसे सम्मान से नवाजा गया.. बतौर लेखिका एक शानदार ज़िन्दगी जीने और लोकप्रियता के चरम पर पहुंचने के बाद 12 जनवरी, 1976 को अगाथा ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया।

अहा! ज़िंदगी के जनवरी अंक से साभार

Wednesday, January 4, 2012

जिनसे बढ़ा मराठी रंगमंच


दीनानाथ मंगेशकर, इस नाम के बारे में आज का शायद ही कोई युवा झट से बता पाए। लेकिन उनके पांच बच्चों के नाम आज भारतीय फिल्मोद्योग के जरिए विश्व भर में प्रसिद्ध हैं। लता मंगेशकर, मीना मंगेशकर, आशा भोसले, उषा मंगेशकर और पुत्र हृदयनाथ मंगेशकर के पिता दीनानाथ मंगेशकर पिछली शताब्दी के आरंभिक वर्षो में मराठी रंगमंच के एक सुपरिचित हस्ती थे।

अपने जमाने में मास्टर के रूप में मशहूर दीनानाथ मंगेशकर का जन्म गोवा के नजदीक मंदिरों के लिए मशहूर एक कस्बा पोंडा में 29 दिसंबर 1900 को हुआ था। उस शहर की विशेषताओं ने शुरू से ही उनके भीतर पारंपरिक कलाओं के संस्कार डाल दिए थे। वे अपने शुरुआती दौर में एक गायक के रूप में जाने गए। उस जमाने में किर्लोस्कर नाटक कंपनी का पूरे महाराष्ट्र में डंका बजता था। इस कंपनी के मालिकों ने किशोरावस्था में ही दीनानाथ मंगेशकर को अपनी संस्था में शामिल कर लिया। यह वही नाटक कंपनी थी, जिसमें बाल गंधर्व जैसे मशहूर रंगकर्मी काम किया करते थे।

दीनानाथ मंगेशकर ने इसी कंपनी में अभिनय करना आरंभ किया। कलकत्ता में उर्दू नाटक ताज-ए-वफा में अभिनय करने के लिए उन्हें काफी सराहना मिली। इस नाटक कंपनी ने द्वितीय विश्वयुद्ध के जमाने में मराठी शैलियों और उर्दू रंगमंच के मिश्रित प्रयोगों से जो लोकप्रियता अर्जित की, उसमें दीनानाथ मंगेशकर के अभिनय से और भी निखार आया।

बाद में दीनानाथ मंगेशकर अपने सहयोगियों के साथ इस नाटक कंपनी से अलग हो गए और उन्होंने संगीत नाटक मंडली बनाई। 1921 में बंबई में इस संस्था का गठन किया गया। इस मंडली की पहली प्रस्तुति शकुंतला थी, जिसे बेहद सराहना मिली। इस नाटक कंपनी की प्रमुख नाट्य भूमिकाएं दीनानाथ स्वयं करते थे।

यह वह जमाना था, जब हिन्दुस्तानी संगीत का गायन और मंचीय गायन को दीनानाथ मंगेशकर ने शास्त्रीय सम्मान दिया। अपने रंगमंचीय जीवन के अलावा उनका झुकाव उस जमाने के नए सिनेमा की ओर भी हो रहा था। उन्होंने बलवंत फिल्म कंपनी की स्थापना की। अपनी मृत्यु के कुछ वर्ष पूर्व ही उन्होंने इस फिल्म कंपनी के माध्यम से भक्त पुंडलिक नामक मराठी फिल्म पूरी की। इस फिल्म में उन्होंने स्वयं एक साधु की भूमिका निभाई थी। इस फिल्म कंपनी के साथ-साथ उनका रंगमंचीय जीवन भी चलता रहा। वे कुछ समय के लिए ऐसे हो गए जैसे पूरी दुनिया उनकी मुठ्ठी में हो। पैसे खूब आते थे, लेकिन फिल्मों के आने के बाद नाटक कंपनियां खत्म होने लगीं। फिर एक दिन वह भी आया जब नाटकों के दर्शक कम ही नहीं खत्म हो गए। ऐसा होने की वजह से दीनानाथ मंगेशकर का आखिरी वक्त बड़ा कठिन गुजरा। इस समय वे बच्चों को पढ़ाकर अपना गुजारा चला रहे थे। पांच बच्चों का साथ और परिवार का बोझ चलाना कठिन हो गया था। आखिर में वे कम समय में ही, मात्र 41 वर्ष की उम्र में 24 अप्रैल 1942 को उनका निधन हो गया। हालांकि उनके निधन के बाद परिवार का सारा बोझ बड़ी बेटी लता मंगेशकर ने उठा लिया। उनकी मृत्यु के बाद उनकी नाटक कंपनी और फिल्म कंपनी दोनों खत्म हो गई। लता ने अपने युवावस्था के दिनों में उनकी स्मृतियों को संजोने का अपने स्तर से प्रयास किया।

दीनानाथ मंगेशकर एक अच्छे गायक के रूप में मराठी रंगमंच की परवर्ती परंपरा में लंबे समय तक जीवित रहे। उनकी गायन शैली का प्रभाव बाद के रंगमंचीय गायकों के ऊपर भी लगातार पड़ा, बाद के लोग उस शैली को अपनाते हुए गर्व महसूस करते थे। उनकी आखिरी रंगमंचीय प्रस्तुति 1933 में सांगली में हुई। ब्रह्मकुमारी नामक इस नाटक की उस जमाने में काफी चर्चा हुई थी। बाद में इसी सांगली में मराठी रंगमंच के लिए समर्पित यह कलाकार आखिरी नींद सो गया। दीनानाथ को मराठी रंगमंच कभी नहीं भूलेगा..।

-रतन

दैनिक जागरण, 1 जनवरी 2012 अंक से साभार

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