RANGVARTA qrtly theatre & art magazine

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Saturday, January 28, 2012

अभिमंच में एंटीगनी


शुक्रवार को अभिमंच में प्राचीन ग्रीक नाटककार सोफोक्लीज के नाटक ‘एंटीगनी’ की प्रस्तुति की गई। इडीपस की बेटी एंटीगनी के जन्म में भी एक त्रासदी निहित थी और मृत्यु में भी। लेकिन उसके किरदार में निहित प्रतिरोध ने उसे विश्व रंगमंच का एक महत्वपूर्ण पात्रा बनाया। उसके दोनों भाई सत्ता के लिए हुए युद्ध में मारे गए। लेकिन मौजूदा राजा क्रेयान ने दोनों में से एक भाई पॉलिमिस को दुश्मन घोषित कर उसे दुनाने पर रोक लगा दी है। एंटीगनी को मंजूर नहीं कि उसके भाई को गिद्ध नोच-नोच कर खाएं। राजा क्रेयान के हुक्म के खिलाफ अपने भाई के शव का दफनाने वालली एंटीगनी के चेहरे पर यहां-वहां बेतरतीबी से रंग पुता हुआ है। तुर्की के स्टेट थिएटर की इस प्र्रस्तुति में क्रेयानए जो एंटीगनी का मामा भी है और होने वाला ससुर भी-एक तानाशाह की तरह दिखाई देता है। उसके बाल आधुनिक ढंक से कढ़े हुए है। उसे अपने फैसलों पर कोई संदेह नहीं है। निर्देशक केनान आइजिक इस तरह व्यक्ति और सत्ता के द्वंद्व को एक ऊंचाई पर ले जाते हैं।

एंटीगनी की गुस्ताखी के लिए क्रेयान ने उसे धरती के भीतर एक कंदरा में बंद करवा दिया है। वह अंधे जयोतिषी टेयरिसियस की भी एक नहीं सुनता और एंटीगनी को छोड़ देने ओर उसके भाई को दफनाने की उसकी सलाह के लिए उस राज्य का विश्वासघाती मान लेता है। उसके इस फैसले और अड़ियलपन से आहत उसका बेटा फिर कभी न लौट कर आने के लिए उसे छोड़ कर चला जाता है और एंटीगनी के फांसी लगा लेने के बाद अंततः खुद को ही खंजर भौंक कर मार लेता है। बेटे की मौत से आहत मां भी यही रास्ता चुनती है। और आखिर में रह गया है अपने प्रायश्चित को भोगने के लिए अकेला क्रेयान।

नाटक का व्यक्तिगत त्रासदी का क्लासिकल पाठ यहाँ सत्ता की निरंकुशता के पाठ में बदला हुआ है। इसीलिए क्रेयान मंच पर सबसे ज्यादा दिखता है। यह एक शब्दबहुल नाटक है। लगातार संवादों और एक स्थिर दृश्य संरचना में आगे बढ़ता हुआ। विंग्स को हटा कर मंच के पूरे स्पेस में यह दृश्य बनाया गया है। पीछे की ओर सक प्लेटफॉर्म है, जिस पर नाटक का कोरस उपस्थित है। यह एक भव्य दृश्य है, जिसमें वेषभूषा सबसे ज्यादा दिखती है। इस वेशभूषा में प्राचीन ग्रीम नाटकों की शास्त्राीयता के साथ समकालीनता का भी पुट है। क्रेयान के बैठने की बीच चेयर भी आज के जमाने की है। ग्रीक ट्रैजेडी का यह समकालीन पाठ है। क्रेयान एक मौके पर बिल्कुल ‘द ग्रेट डिक्टेटर’ के तानाशाह की तरह भाषण देता है। इस बीच आतिशबाजी की डिजिटल छवियां भी मंच को घेरे हुए हैं। इस तरह बिल्कुल शुरूआत के दृश्य में टेयरसियस एक बच्चें के साथ लंबे समय तक बिल्कुल निश्चल मूर्तिवत खड़ा है। चेहरे पर रंग पोते उसकी निश्चलता एक लाजवाब छवि है। बाद के दृश्य में वह एक गिद्ध लिए है। पूरी प्रस्तुति इसी तरह की कुछ युक्तियों से एकरसता को तोड़ती है। फिर भी उसका बाहरी पाठ भीतरी पाठ से बीच-बीच में कुछ छिटकता मालूम देता है।

- संगम पांडेय

22 जनवरी 2012, जनसत्ता

सटीक अभिव्यक्तिवाद का रंग


भारतीय थिएटर में माया कृष्ण राव एक अलग ही शैली की कलाकार हैं। वे अकेली मंच पर होती हैं अपनी बहुत-सी तत्पर भंगिमाओं और मुद्राओं के साथ उनके संवाद ध्वनियों की शक्ल में होते हैं। कई बार फुसफुसाते हुए से। करीब एक दशक पहले जब उनकी पहली प्रस्तुति देखी थी, तो यह एक किंचित रूखा संयोजन था। लेकिन तब से अब तक उन्होंने अपनी शैली में क्रमशः काफी सुधार किए हैं

मंगलवार को भारत रंग महोत्सव में हुई प्रस्तुति ‘रावन्ना’ में उनका अभिव्यक्तिवाद ज्यादा व्यवस्थित दिखाई देता है। मंच पर प्रस्तोता के रूप में उनका आत्मविश्वास देखते ही बनता है। उनकी देहभाषा मे एक आक्रामक लय है। लेहकिन उसमें वे खालिस देहभाषा के भरोसे नहीं हैं, उन्होंने मंच पर ‘दृश्य’ के कुछ प्रावधान भी किए हैं। दाहिने छोर पर एक आलमारी जैसी चीज में कुछ छोटे-छोटे कपड़े लटके हैं। बीच-बीच में वे इन कपड़ों को अपने पहलने हुए कपड़ों में इस तरह खोंस लेती हैं। कि उसका अलंग रंग दृश्य के पूरे फ्रेम में एक छोटा सा प्रभाव लिए शामिल हो जाता है। एक दृश्य में वे अपने स्वेटर को ऊपर सिर तक ले जाती है। स्वेटर में से निकले सफेद बाल एक रहस्य की तरह दिखते हैं। पीछे की ओर एक दरवाजा है। प्रस्तुति के दौरान दो और दरवाजे लाकर खड़े कर दिए जाते हैं। बीच के दरवाजे से वे प्रस्तुति में दाखिल होती हैं, मंच की गहराई का शायद यह अंतिम छोर है। एक बार वहां से धुआं निकलता दिखाई देता है।

दृश्यों के इस संयोजन के अलावा स्वरों और ध्वनियों की भी एक अहम भूमिका है। वे स्वरों के अनुरूप ‘मूव’ लेती हैं। उनकी देहभाषा में कथकली की मौखिक-आंगिक व्यंजना से लकर पाश्चात्य ढंग से थिरकने का कौशल है। यह एक सटीक अभिव्यक्तिवाद है। इसमें रोशनियों के बहुतेरे प्रभाव हैं। माया अपने धवल केशों का दृश्यों में कई बार कंट्रास्ट के तौर पर अच्छा इस्तेमाल करती हैं। उनकी देहभाषा का आत्मविश्वास मानो सारे असमंजसों को धूल चटा चुका है। उसमें एक गहरी संलग्नता है। यह आत्मविश्वास किरदार में बहुत गहरी पैठ से बना मालूम देता है। माया की मुखमुद्राओं में दर्शकों के होने का कोई असर नहीं है। दर्शक ऊबें या सुखी हों-- यह कोई मसला नहीं है। वे बुदबुदाते हुए मंच के एक छोर की ओर जा रही हैं। यह बुदबुदाना रावण के किरदार की कभी-कभीसुनाई देने वाली कमेंट्री का एक हिस्सा है। सुनाई दे तो ठीक, न सुनाई दे तो भी क्या फर्क। यह सैकड़ों रामकथाओं में से किसी एक का प्रसंग है। सीता का रावण की मृत्यु का कारण बनना नियत है। क्योंकि रावण कुछ ऐसा भूल गया है, जिससे उसकी नियति जुड़ी है। माया पूछती है-- क्या यह स्मृतिविहीनता की कथा है। क्या रावण जैसे विद्वान और कलाप्रेमी की स्मृतिविहीनता एक रूपक है।

माया कृष्ण राव की रंग-शैली को लेकर नाक-भौं सिकोड़ने वाले दर्शक भी हैं। लेकिन माया इससे निस्संग रहते हुए निरंतर इसके भीतर कई प्रयोग करती रही हैं। मसलन, एक जगह कोई कपड़ा खोंसते हुए वे कुछ बोल रही हैं, और काफी तल्लीनता से अपना काम भी कर रही हैं। मानो यह काफी उपयोगी कोई काम हो। माया कृष्ण राव का अभिव्यक्ति के अपने तरीकों पर हमेशा भरोसा रहा है। इस प्रस्तुति में उनके इस भरोसे को दर्शकों का भी पूरा अनुमोदर हासिल हुआ।

- संगम पांडेय

जनसत्ता, 19 जनवरी, 2012

जुले वर्न का कल्पनालोक


थिएटर में कुछ भी नामुमकिन नहीं है। जुले वर्न के 19वीं शताब्दी में लिखे गए फ्रांसीसी उपन्यास ‘ट्वेंटी थउसेंड लीग अंडर द सी’ की प्रस्तुति इसे साबित करती है। रविवार को कमानी में हुई इस प्रस्तुति के पात्रा समुद्र के अंदर एक पनडुब्बी में हे, जिसे एक ऐसे शख्स ने दुनिया से छुपाकर बनाया है जो तत्कालीन सभ्यता से क्षुब्ध है। पनडुब्बी को समुद्री दैत्य समझा जा रहा है। अमेरिका ने इस दैत्य को मार गिराने के लिए एक दल को भेजा है। लेकिन कहानी के नैरेटर प्रोफेसर पियरे सहित दल के तीन लोग पनडुब्बी बनाने वाले कैप्टन नेमो की गिरफ्त में आ गए हैं।

मंच पर परदे को पूरा खोला नहीं गया है। इस तरह बीच की खुली जगह एक फ्रेमकी तरह इस्तेमाल की जा रही है। इस खाली जगह पर एक रूीना परदा है जिस पर समुद्र के अंदर एनिमेटेड संसार उभर रहा है। तरह-तरह की मछलियां और जीव। इस दौरान परदे के पीछे भीतर की ओर मौजूद पात्रा भी दिखते रहते हैं। पात्रागण कभी इस झीने परदे के आगे कभी उसके पीछे हाते हैं-- इस तरह पनडुब्बी के भीतर या बाहर की स्थितियों को दर्शाया गया है।

कुल मिलाकर यह डिजिटल तरीकों से तैयार किया गया एक जटिल और कल्पनाशील संयोजन है जिसमें एनिमेशन और कैमरे से शूट किए गए वास्तविक सचल चित्रों- दोनों का इस्तेमाल किया गया है। ध्वनि प्रभावों के जरिए इसे पुरअसर बनाने की कोशिश की ई है। पानी के बुलबुले कई बार इतरे करीब से और इतने विस्तार में है कि एक एक घेरने वाली दृश्यात्मकता बन जाती है।

इटली के टिएट्रो पॉटलैक थिएटर की इस अंग्रेजी प्रस्तुति में प्रभावशाली डिजिटल संयोजन के अलावा चरित्रांकन कुछ मजाकिया तरह का है। इसके पात्रा कॉमिक्स किरदारों की तरह दिखाई देते हैं। समुद्र के भीतर यहा-वहां गुजरते हुए वे अटलांटिक और प्रशांत महासागरों में पानी के घनत्व के फर्क को लेकर चर्चा करते हैं। उनकी चाल-ढाल में भी यह चीज है। यह ढंग एनिमेशन में दर्शाए गए जीवों के नक्श आदि में भी है। प्रस्तुति के निर्देशिक पुनो दि बूडो ने एक मुश्किल ढांचे में एक तरह की शैली का कुशल निबाह किया है। जुले वर्न का यह उपन्यास तब लिखा गया था, जब इस किस्म की पनडुब्बी एक काल्पनिक चीज थी। प्रस्तुति के दृश्यों में पानी के जहाज की छवि का इस्तेमाल भी किया गया है। इस तरह जुले वर्न के 140 साल पुराने कल्पनालोक को बूडो मंच पर संभव बनाते हैं।

कमानी में सोमवार को सई परांजपे लिखित और निर्देशित मराठी प्रस्तुति ‘जसवंदी’ का मंचन किया गया। यह एक यथाथर्ववादी प्रस्तुति है, जिसकी केंद्रीय पात्रा धनाढ्य घर की एक स्त्राी है। पति के पास अपनी व्यावसायिक व्यस्तताओं में उसके लिए समय नहीं है। एकाकीपन से जूझती नायिका का खुद को आंटी कहने वाले एक नौजवान स संबंध जुड़ता जाता है। घर के काम करने वाली रंगाबाई और ड्राइवर दो अन्य पात्रा हैं। रंगाबाई की पैतृक जायदाद के लिए वे एक हत्या करने पर चर्चा कर रहे हैं। इनके अलावा प्रस्तुति में दो बिल्ले भी है, जिनकी आपसी बातचीत और हरकतें निरंतर एक रोचकता बनाए रखती हैं।

प्रस्तुति की विशेषता है कि यथार्थ के दुर्द्धर्ष पक्ष भी उसमें दिखाई देते रहते हैं। हालांकि बिलौटों की उछलकूद कुछ मौकों पर प्रसतुतिको अनावश्यक लंबा बनाती है। घर के भीतर के दृश्य का यह एक सुंदर सेट डिजाइन था जिसमें आंगर के पेड़-पौधों के अलावा दो दरवाजों के जरिए भीतर के कमरों को दर्शाया गया है। बिलौटों का अभिनय करनेवाले पात्रों का कोई मेकअप नहीं किया गया है, सिर्फ उनहें अपनी हरकतों से ही खुद को बिलौटा साबित करना है। प्रस्तुति की यह युक्ति काफल चर्चित रही है।

- संगम पांडेय

जनसत्ता, 18 जनवरी 2012

उदास और रहस्मय सौंदर्य


भारत रंग महोत्सव में शनिवार को हुई प्रस्तुति ‘वाटर स्टेशन’ की विशेषता उसकी विलक्षण धीमी गति है। यह एक ऐसी गति है जो स्थिरता की दोस्त मालूम देती है मंच के बाएं छोर की ऊंचाई पर प्लेटफॉर्म से एक रास्ता शुरू होता है। एक मोड़ लेकर यह रास्ता स्टेज के मध्य तक पहुंचता है। यहां तक पहुंचता है। यहां एक नल लगा है जिससे लगातार पानी बह रहा है। यह जगह एक पड़ाव है। यात्रियों का रास्ते से आना और नल से पानी पीना- यही प्रस्तुति का कथ्य है।

इसमें एक उपकथा भी है दाएं किनारे पर कबाड़ का ढेर है, जहां एक किरदार बिल्कुल स्थिर खड़ा ये गतिविधियां देख रहा हैं प्रस्तुति में कोई संवाद नहीं है। दर्शक कुछ न होने को देख रहे हैं। कुछ न होना शायद उन्हें किंकर्तव्यविमूढ़ बना रहा हो, पर इसमें एक बड़ी राहत है। हर गतिविधि को पूरे विस्तार से महसूस करने का इत्मीनान। निर्देशकीय से शब्द उधार लें तो ‘यह खामोशी’ धीमापन और स्तब्धता- ये सब मिलकर एक उदास और रहस्यमय सौंदर्य की रचना
करते हैं, जो हमें अपने जीवन और अस्तित्व को देखने के लिए एक नई दृष्टि देता है।’

स्लोमोशन दर्शक को अचानक एक नए समय बोध में ले जाता है। समय के हर टुकड़े की बहुत सी कोशिकाएं हैं। नल की ओर हाथ धीरे-धीरे आगे बढ़ रहा है। धार मुंह में जाने से गिर रहे पानी की आवाज रुक गई हैं। आवाज का रुकना भी दृश्य की एक गतिविधि है।.... कई तरह के पात्रा रह-कर उपस्थित होते हैं। एक औरत आती है, एक बच्चागीड़ी लिए दंपत्ति,... पीठ पर टोकरी बांधे एक कामगार औरत।

जापानी नाटककार शोगो ओटो लिखित यह प्रस्तुति एक त्रायी का हिस्सा है। शेगो के बारे में उल्लेखनीय है कि वे 14वीं सदी के जापानी सौंदर्यर्शास्त्राी जियामी मोटोकियो की अकर्मकता की अवधारणा से प्रेरणा लेते रहे हैं। केरल के थिएटर ग्रुप थिएटर रूट्स एंड विंग्स के लिए इस प्रस्तुति का निर्देशन शंकर वेंकटेश्वरन ने किया है। उनके मुताबिक इस प्रस्तुति में धीमापन ‘पात्रों की आदि छवियों’ और ‘मानव अस्तित्व के सार’ को समझने में मददगार है। एक दृश्य में पति-पत्नी के अंतरंग क्षणों का एक टुकड़ा भी है, जो धीमेपन को थोड़ा बाधित करता है’

शनिवार को ही कमानी प्रेक्षागृह में बांग्ला प्रस्तुति ‘ब्योमकेश’ का मंचन किया गया। ब्योमकेश शारदेंदु बंद्योपाध्याय रचित बांग्ला साहित्य का प्रसिद्ध जासूसी किरदार है। इस प्रस्तुति में वह एक हत्या की गुत्थी को सुलझाता है। हत्यारे ने बहुत तरकीब से जायदाद के लिए हत्या की, लेकिन कुछ हल्की-फुल्की चूकें उसे ले डूबी। नाटक की विधा में यह जासूसी का एक सीधा-सादा नैरेटिव है। साहित्यिक उत्सुकता थिएटर के लिए कोई बहुत उपयोगी चीज नहीं मानी जाती।

ब्योमकेश के रहस्योदघाटनों में कोई बड़ा रोमांच नहीं है। बल्कि अपनी सादगी में यह प्रस्तुति एक नॉस्टैल्जिक रूमान पैदा करती है। बृत्य बसु निर्देशित इस प्रस्तुति मेें कुछ अपने किस्म के खांटी किरदार है, और हत्या उसमें सिर्फ लालच की वजह से नहीं बल्कि नफरत की वजह से भी की गई है।

- संगम पांडेय

जनसत्ता, 17 जनवरी 12012

नाट्य प्रस्तुतियों में कौंध और गूंज


गुरुवार को अभिमंच में त्रिपुरारी शर्मा निर्देशित प्रस्तुति ‘बीच शहर’ का मंचन किया गया। निर्देशिका के मुताबिक यह प्रस्तुति अधूरे वाक्यों, छवियों, कौंध, कविता, चीखों और चुप्पियों से बनी हैं कुछ अर्थों में यह एक नाटक नहीं हैं, इसमें स्मृति, अहसास, आवेग, अवधारणा और घटनाओं के अंशों को एक जगह इकट्ठा किया गया है और प्रस्तुति में वास्तविक और अवास्तविक, स्वप्न और अस्तित्व, सजीव और निर्जीव की कार्रवाइयां समय के एक ही स्पेस और परिदृश्य का हिस्सा है और किसी निश्चित फ्रेम के लिए बाधा खड़ी करती हैं। मंच पर बहुत से ब्लॉक्स हैं। दर्शकों के बीच से गुजरने वाला एक प्लेटफॉर्म हैं, जहां से रह-रह कर पात्रा प्रकट हाते हैं। बहुत सारे पात्रा हैं पर उनके आपसी संवादों के सूत्रा जोड़ना दर्शकों के लिए आसान नहीं है। मंच के दोनों छोरों पर दो परदे लगे हैं जिन पर उभरी वीडियो छवि में लिखा है, 1984, फिर कुछ कटे हुए बाल गिरते हैं। इसके कुछ देर बाद एक तारीख उभरती है, 6.6.2002, आशय की इसी सूत्रा के सहारे दर्शक को कड़ियां जोड़नी हैं। यह गुजरात दंगों के दौरान एक आम आदमी की कहानी है, जिसने मुसीबत में पड़े लोगों की हिफाजत की। मंच पर बहुत सारा सूक्ष्म और स्थूल एक साथ मौजूद हैं। कुछ पात्रा मंच पर बातचीत में लगे हैं,। उसका इस तरह वहां होना एक औचक उपस्थिति है। प्रस्तुति में मंच सज्जा में एक नियोजन और डिजाइन दिखता है लेकिन स्थितियों के किसी व्यावहारिक समीकरण में नहीं होने से मंच पर बहुत कुछ फालतू भरा हुआ दिखता है। निरंतर संवाद बोले जा रहे हैं, पर यह सारा कुछ संप्रेषित भी हो रहा हो ऐसा नहीं है।

शुक्रवार को ही प्रदर्शित एक अन्य प्रस्तुति ‘मेईध्वनि’ में तरह-तरह की देहगतियों का प्रदर्शन किया गया है। शरीर के ज्यामितीय लय। तीन गागर लिए स्त्रिायां गागर एक सहयोगी हैं। वे कभी उसके ऊपर होती हैं कभी उनके पैर गागर में। लेकिन उनकी गतियों में एक सभ्यता है जिससे एक लय बनती हैं। मेईध्वनि का अर्थ है शरीर की गूंज। इसके निर्देशक जयचंद्रन पालझी हैं। निर्देशकीय के मुताबिक ब्रह्मांड और मानव शरीर के वास्तुशिल्पीय और ज्यामितीय अमूर्त प्रत्ययों से सूत्रा लेकर यह प्रस्तुति प्रयास करती हैं अशांत परिस्थितियों में बंदियों द्वारा अनुभव किए गए बाध्यकारी एकाककीपन को समझने की। भारतीय चिंतन में उपस्थित ब्रह्मांडीय घटकों- शरीर और द्रव-की अवस्थाओं के इतिहास में खोज करते हुए यह नाटक उनकी मूर्ति सदृश आकृतियों, स्मृतियों और मनोभावों में निहित गुणों की एक यात्रा है। इसके मुताबिक प्रस्तुति में दिखाए गए धातु कलशों क आकृति एक संयमित मगर फिर भी अयोध्य स्त्रिायोचित अनंतता की ओर इशारा करती है। ऐसे गूढ़ भावों से भरी इस प्रस्तुति को बंगलूरू की अट्टाकलरी रेपर्टरी ने तैयार किया है।

- संगम पांडेय

(जनसत्ता, 16 जनवरी 2012 से साभार)

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