
‘भाषा कर रही है दावा’ का परफॉरमेंस रांची रंगमंच पर आदिवासी कथ्य, कलाकार और कृति का झारखंड व देश के सांस्कृतिक परिदृश्य में एक नयी दावेदारी रखता है। रांची विश्वविद्यालय के शहीद स्मृति केंद्रीय पुस्तकालय सभागार में झारखंडी भाषा साहित्य संस्कृति अखड़ा की नाट्य इकाई उलगुलान की यह प्रस्तुति झारखंड के हिंदी रंगमंच में एक उल्लेखनीय परिघटना है.
'फेविकॉल’ इन्डिजिनस पीपुल के सांस्कृतिक, सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक, धार्मिक आस्मिता एवं उनकी पहचान के मुद्दों को उठाता है. यह नाटक न केवल झारखण्ड़, छत्तीसगढ़, उड़ीसा या असम की बात कहता है बल्कि पूरे विश्व में जहां-जहां आदिवासी आदिकाल से रहते आये हैं वहां की बात कहता है.
भौगोलिक एवं सांस्कृतिक नजरिये से देखें तो सैलेरी ग्रांट बिहार के 5 उत्तरी जिलों में ही सबसे ज्यादा जा रहा है. कुल 194 में से सैलेरी ग्रांट पाने वाले 99 कलाकार बेगुसराय, पूर्णिया, फारबिसगंज, अररिया और समस्तीपुर से हैं. भोजपुर और मगध (पटना छोड़कर) पूरी तरह से इस लाभ से वंचित है.
The play deals with trust deficit among the Indian Muslim and revolve around the issue of agencies role regarding involvement of Muslim youth in terrorism.
अश्विनी कुमार पंकज ने सत्यव्रत राउत के नाटक ‘मत्ते एकलव्य’ पर सवाल उठाया है कि इस नाटक में आदिवासी एकलव्य को क्यों अछूत और दलित बताया गया है. उन्होंने कहा है कि किसी जातिविहीन चरित्र को सायास जाति का सिद्ध करना एक तरह से आदिवासियों का Cultural Genocide करना है.