RANGVARTA qrtly theatre & art magazine

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Sunday, June 3, 2012

नन्हें हाथों में दुनिया थमाने से पहले


अशोकनगर में इप्टा का आठवां बाल एवं किशोर रंग शिविर अशोकनगर: पिछले कुछ दिनों में देश भर में भारतीय जन नाट्य संघ (इप्टा) की विभिन्न इकाइयों ने 25 से अधिक बाल रंग शिविर का आयोजन किया। 20 दिन से लेकर एक महीने तक के इन शिविरों में ऐसा बहुत कुछ है कि इन्हें अपने आप में अनूठा, प्रयोगधर्मी, जरूरी और कला भविष्य के प्रति आश्वस्ति के रूप में देखा जा सकता है। कला और खासकर बच्चों के कलाकर्म को देखने का इधर जो नजरिया विकसित हुआ है, उसमें कुछ रियायतें और भावुकता भी शामिल होती है। इसलिए वे सच्चाइयां सामने नहीं आ पातीं, जो रंगशिविरों की अच्छाइयों और बुराइयों को नुमायां कर सकें। ज्यादातर मौकों पर बच्चों के थियेटर को आलोचना के बजाय आशीर्वाद की दृष्टि से देखा जा सकता है, क्या यह आने वाले दिनों के लिए खतरनाक हो सकता है? बहरहाल, अशोकनगर (मध्यप्रदेश) के आठवें बाल एवं रंग शिविर में 12 दिन गुजारने के साथ वे कारण साफ होते हैं, जो आने वाले दिनों के कस्बाई कला कर्म की रूपरेखा तय करने वाले हैं। कस्बों से कलाकारों का पलायन, संसाधनों की कमी, प्रतिबद्धता की छीजन और सार्वजनिक कला के द्वंद्व से जूझते हुए इप्टा की अशोकनगर ईकाई ने पहला रंग शिविर 1998 में लगाया था। बीच में कुछ व्यवधान के बाद बीते तीन साल से यह फिर लगातार जारी है। एक मई 2012 को महानतम अभिनेता बलराज साहनी का शताब्दी वर्ष शुरू हुआ यह रंग शिविर उन्हीं के कला कर्म को समर्पित था। 25 दिनों के इस शिविर के उद्घाटन और समापन समारोह में बाल कलाकारों ने कुल तीन नाटकों, 2 नृत्य और पांच जनगीतों की प्रस्तुति दी। साथ ही अपने 25 दिन के रचनात्मक कार्यों, डायरी और शहर की समस्याओं पर रिपोर्टिंग पर आधारित 24 प्रष्ठीय अखबार ‘‘बाल रंग संवाद’’ प्रकाशित किया। इससे पहले उद्घाटन अवसर पर भी बच्चों ने नाटक ‘‘आदमखोर’’ का मंचन किया। कार्यशाला में व्यायाम, संगीत, क्राफ्ट, पत्रकारिता, नृत्य, रंगमंच, चित्रकला की सैद्धांतिक और प्रायोगिक जानकारी विषय विशेषज्ञों ने दी। यह जानकारियां उन बच्चों को दी गई हैं, जो आने वाले समय के कला जगत को अपने अपने ढंग से आलोकित करेंगे। बीज रूप में दिए गए कला-विचारों के वृक्ष कैसे होंगे, इसका अनुमान प्रस्तुतियों से लगाया जा सकता है।
उद्घाटन के अवसर पर श्री विजयदान देथा की कहानी ‘‘आदमखोर’’ के श्री रोहित झा द्वारा किए गए नाट्य रूपांतरण को युवा रंगकर्मी सत्यभामा ने मंच पर उतारा। खुद सत्यभामा के अलावा अविनाश तिवारी, विनय खान, ऋषभ श्रीवास्तव, सारांश पुरी और कबीर राजोरिया ने मंच पर अभिनय किया। इस पहली प्रस्तुति के साथ ही यह तय हो गया था कि नाट्य शिविर अपनी पिछली परंपराओं से अलग साबित होगा। यह पहली बार था जब अशोकनगर इप्टा की ईकाई ने शिविर के उद्घाटन पर नाटक की प्रस्तुति की। खासबात यह रही कि मंचन की पूरी जिम्मेदारी पिछले शिविर में शरीक रहे बच्चों ने ही निभाई। संगीत की जिम्मेदारी सिद्धार्थ शर्मा ने निभाई और नेपथ्य के अन्य कार्य शिविरार्थी निवेदिता और संघमित्रा ने किए। प्रकाश संयोजन का कार्य इप्टा के वरिष्ठ सदस्य रतनलाल पटेल और श्याम वशिष्ठ ने किया। दूसरे दिन बच्चों को व्यायाम, संगीत और नाटक के बारे में शुरुआती जानकारी दी गई। तीसरे दिन बच्चों ने पार्टीशन कहानी का पाठ किया, जिसके बारे में तय किया गया कि इसका मंचन किया जाएगा। नाट्य रूपांतरण की जिम्मेदारी प्रगतिशील लेखक संघ की गुना ईकाई के वरिष्ठ साथी सत्येंद्र रघुवंशी को दी गई। सात मई को महाकवि रबीन्द्रनाथ टैगोर के जन्मदिवस पर शिविर संयोजक रतनलाल पटेल ने उनकी रचनाओं का पाठ किया और बच्चों से श्री टैगोर के साहित्यिक योगदान की चर्चा की। दस मई को जबलपुर से लोकनृत्य विशेषज्ञ इंद्र पांडे का शिविर में आगमन हुआ। उन्होंने बच्चों को लोकनृत्य राई, दादारिया, पंथी और कालबेलिया के बारे में जानकारी थी। आगामी दिनों में बच्चों को उन्होंने इन चार नृत्यों का प्रशिक्षण दिया और समापन के अवसर पर दादरिया और राई का प्रदर्शन किया गया। 16 मई को उज्जैन से आए ख्यातिलब्ध चित्रकार मुकेश बिजौले ने बच्चों को चित्रकला की जानकारी दी। उन्होंने बच्चों को आधुनिक चित्रकला की सैद्धांतिक और प्रायोगिक जानकारी दी। बाद के दिनों में बच्चों ने खुद चित्र बनाए, जिनमें से चुनिंदा चित्रों को बाल रंग संवाद के अंक में प्रकाशित किया गया। 17 मई को मेरठ से आए युवा पत्रकार सचिन श्रीवास्तव ने बच्चों को पत्रकारिता के बारे में जानकारी दी। अशोकनगर ईकाई ने 2010 के शिविर में पहली बार 8 पन्ने का अखबार ‘‘बाल रंग संवाद’’ प्रकाशित किया था। 2011 में यह 20 पन्ने में प्रकाशित हुआ और इस बार 24 पन्ने का अखबार प्रकाशित किया गया। बीते दो अंकों के बजाय इस बार बच्चों ने शहर की समस्याओं पर रिपोर्टिंग की। इस बीच बच्चें प्रतिदिन डायरी भी लिख रहे थे, जिसे ‘‘बाल रंग संवाद’’ में शामिल किया गया। 20 मई को बीना से आए गजलकार श्री महेश कटारे ने बच्चों के बीच अपनी बुंदेली गजलों का पाठ किया। जिसके बारे में बच्चों ने अपनी डायरी में प्रतिक्रिया दी। 25 मई को हुए समापन समारोह की शुरुआत गजलकार श्री महेश कटारे, प्रलेस गुना के वरिष्ठ साथी श्री रामलखन भट्ट, वरिष्ठ पत्रकार श्री मनोज जैन और इप्टा के प्रदेश महासचिव श्री हरिओम राजोरिया के सानिध्य में ‘‘बाल रंग संवाद’’ के लोकार्पण से हुई। इसके बाद शिविर संयोजक रतनलाल पटेल और रामदुलारी शर्मा के मार्गदर्शन में तैयार जनगीतों की प्रस्तुति हुई। इसके बाद ईवा भार्गव, अणिमा जैन, रक्षिता जैन, मानसी जैन, सुरभि जैन, चारू जैन, स्नेहा गुप्ता और साक्षी पांडे ने ‘‘दादरिया’’ लोकनृत्य की प्रस्तुति दी। इंद्र पांडे, रतन लाल पटेल और सिद्धार्थ शर्मा ने थाप दी। इसके बाद अशोकनगर इप्टा की वरिष्ठ साथी और वर्तमान शिविर की संयोजक सीमा राजोरिया के निर्देशन में स्वयं प्रकाश की कहानी ‘‘पार्टीशन’’ के सत्येंद्र रघुवंशी द्वारा तैयार नाट्य आलेख का मंचन किया गया। नाटक की कहानी एक प्रगतिशील मुसलिम व्यापारी कुरबान अली के इर्द-गिर्द घूमती है, जो एक झगड़े में जलील होने के बाद इंसान से मुसलमान ठहरा दिया जाता है। कुरबाल अली के रूप में सत्यभामा ने अपने भावुक अभिनय से दर्शकों को बांधे रखा, तो लतीफ मियां के किरदार में कबीर राजोरिया ने अपनी संवाद अदायगी के बूते अलग छाप छोड़ी। ईमान अली के किरदार को बाल कलाकार अमित गुप्ता ने बिल्कुल पड़ोस का बना दिया और अमन खान ने प्रोफेसर के पात्र को जीवंत बनाया। रऊफ के रूप में ऋषभ श्रीवास्तव, शायर-कवि शिवानी शर्मा, भाई जी और दरोगा अनुपम तिवारी, गोटू का पात्र अखिल जैन ने बेहतरीन ढंग से निभाया। अन्य कलाकारों ने भी अपने छोटे-छोटे किरदार को खूबसूरती से अदा किया। खासबात यह रही कि नाटक में कोई भी पात्र हावी नहीं रहा। नाटक अपनी पूरी जटिलताओं के साथ जरूरी संदेश देने में कामयाब रहा। तालियां कम बजीं, लेकिन जहां बजनी चाहिए थीं, वहीं बजीं। यह निर्देशक की भी कामयाबी थी, और कलाकारों की भी। खासकर कुरबान अली के एक लंबे डाॅयलाॅग में, जब वह अपने इंसान होने और मुसलमान होने के बीच की टकराहट को सामने रखता है, दर्शकों में लंबा सन्नाटा था। नाटक में हास्य का पुट नहीं था, और बच्चों के साथ पूरी गंभीरता दिखाते हुए दर्शकों ने कहानी को आत्मसात किया। करीब सवा घंटे के इस नाटक में 12 दृश्य थे, और हरएक में प्रापर्टी को बदलना था, जिसे बच्चों ने खूबसूरती से अंजाम दिया। मुकेश बिजौले, आकांक्षा, अर्चना प्रसाद और संजय माथुर के मेकअप ने नाटक की खूबसूरती को तो बढ़ाया ही, भाव और किरदार दर्शाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। प्रकाश संयोजन रतनलाल और श्याम वशिष्ठ का था।
दूसरा नाटक व्यंग्यकार हरिशंकर परसाई की कहानी ‘‘इंस्पेक्टर मातादीन चांद पर’’ के तपन बनर्जी द्वारा किए गए नाट्य रूपांतरण पर आधारित था। इसका निर्देशन विनोद शर्मा ने किया, निर्देशन में सहयोग किया रामबाबू कुशवाह ने। नुक्कड़ शैली के इस नाटक में मातादीन की प्रमुख भूमिका के साथ आर्यन अरोरा ने ईमानदार व्यवहार किया और उनका साथ दिया, विनय खान, प्रियांशु शेखर, दर्श दुबे, अनिकेत, आशीष, सौरभ और कबीर खान ने। अभिनय के लिहाज से आर्यन और प्रियांशु ने दर्शकों की वाहवाही बटोरी। प्रापर्टी की कमी के बावजूद कलाकारों ने चांद के दृश्य और पुलिस की कार्यप्रणाली को खूबसूरती से बेपर्दा किया। संवादों में तीक्ष्णता अपने पूरे वेग से हाॅल में पहुंच रही थी, जिसका सबूत बीच-बीच में उठा रहे ठहाके थे। दोनों नाटकों के बीच के अंतराल में दीक्षा जैन, श्वास्ती, संघमित्रा, प्रज्ञा, पारूल, कविता, प्रियंका, सौम्या, आशी और आस्था ने बुंदेलखंड के लोकनृत्य ‘‘राई’’ की प्रस्तुति दी। ‘‘राई’’ के गंभीर दर्शकों ने भी इसकी सराहना की और एक दर्शक की यह टिप्पणी नृत्य की तारीफ के लिए काफी है कि, ‘‘हम चाहते थे कि यह नृत्य पूरी रात चलता रहे।’’ वैसे भी ‘‘राई’’ नृत्य अपने पारंपरिक रूप में पूरी रात चलता है, यह बच्चे की पैदाइश और विवाह के अवसर पर होता है, जिसे मिथक में लव-कुश की पैदाइश से जोड़कर देखा जाता है। समापन समारोह के अंत में पीडब्ल्यूडी के एसडीओ श्री ज्ञानवर्धन मिश्रा, वरिष्ठ कवि निरंजन श्रोत्रिय, वरिष्ठ पत्रकार अतुल लुंबा और गजलकार महेश कटारे ने बच्चों को सुनहरे भविष्य की उम्मीदों के साथ प्रमाण-पत्र वितरित किए गए। इस लंबे किंतु बेहद सधे हुए कार्यक्रम का संचालन ख्यातिलब्ध चित्रकार और अशोकनगर इप्टा के वरिष्ठ साथी पंकज दीक्षित ने किया। शिविर के सफल संचालन में संयोजक और इप्टा अशोकनगर की अध्यक्ष सीमा राजोरिया, सचिव राकेश विश्वकर्मा के अलावा वरिष्ठ साथी विनोद शर्मा और रतनलाल पटेल की महत्वपूर्ण भूमिका रही। इस रंग शिविर से कला कर्म के भविष्य की जो तस्वीर सामने आती है, वह किसी नाट्य क्रांति को रेखांकित नहीं करती, लेकिन कला के सामाजिक दायरे को बढ़ाती है। अच्छे और बुरे के फर्क की तमीज पैदा करने वाले शिविरों में इप्टा के इस शिविर को अलग से रेखांकित भले न किया जाए, लेकिन इसे खारिज नहीं किया जा सकता। यह तब है जब अशोकनगर जैसे शहर बनते कस्बे में इसी दरम्यान क्रिकेट से लेकर आधुनिक नृत्य तक की कार्यशालाएं समानांतर रूप से चल रही थीं। ऐसे में 60 से अधिक बच्चे हर साल तपती धूप में नाट्य कर्म और कुछ अन्य जरूरी कलाओं का प्रशिक्षण ले रहे हैं, तो आश्वस्त हुआ जा सकता है कि कस्बों में थियेटर बचाने के लिए किसी सरकारी पहल की जरूरत नहीं है। इस कार्यशाला के उद्घाटन अवसर पर वरिष्ठ पत्रकार श्री अतुल लुंबा ने कहा था कि ‘‘अशोकनगर में बच्चों के थियेटर पर जो काम हो रहा है, उसकी पहचान प्रदेश ही नहीं, बल्कि राष्ट्रीय स्तर हो रही है।’’ दिलचस्प है कि राष्ट्रीय सवाल भी कस्बों तक पहुंच रहे हैं, इसलिए यह जरूरी भी है कि कस्बे राष्ट्रीय फलक पर जवाबदेही निभाएं। इस लिहाज से अशोकनगर का कला जगत अपनी जिम्मेदारी निभा रहा है, ठीक वैसे ही जैसे भिलाई से लेकर डोंगरगढ़ तक के अन्य समूह अपने-अपने ढंग से हस्तक्षेप कर रहे हैं। - सचिन श्रीवास्तव

Sunday, May 27, 2012

'बकासुर' के साथ आठवें बलराज साहनी स्‍मृति राष्‍ट्रीय नाट्य समारोह का समापन


रायगढ़ इप्टा का नाटक ‘बकासुर’ समारोह की अंतिम प्रस्तुति थी। प्रकाश व्यवस्था को दुरूस्त करने में कुछ समय लग रहा था। इससे पहले कि नाटक प्रारंभ होता तेज बारिश की आशंका के साथ बूंदा-बांदी शुरू हो गयी, लेकिन नाटक देखने की ललक में लोग कुर्सियों पर जमे रहे। हिंदी पट्टी में जहाँ नाटकों के दर्शकों की कमी का रोना रोया जाता हो वहाँ भीषण गर्मियों में पंखों के बगैर पूरे तीन दिनों तक सभागार का खचाखच भरा रहना यह संकेत देता है कि नाटक मंडली केवल कलाकर्म के प्रति नहीं बल्कि सरोकारों के लिये भी प्रतिबद्ध हो तो उसके समक्ष  खाली कुर्सियों का वह संकट उत्पन्न नहीं हो सकता जो शहरी थियेटर में आम प्रवृत्ति है। समारोह की सफलता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि ‘‘ऑल्टरनेटिव लिविंग थियेटर’’, कोलकाता द्वारा नाटक ‘‘घर वापसी का गीत’’ के मंचन के बाद सुविख्यात निर्देशक व रंगकर्मी प्रोबीर गुहा ने दर्शकों को संबोधित करते हुए कहा कि ‘‘ आप लोग धन्य हैं जो देर रात तक इतनी शांति से बैठकर इतना गंभीर नाटक देख रहे हैं।’’ नाट्य संस्था ‘इप्टा’ व ‘सामाजिक संस्था ‘विकल्प’ द्वारा आयोजित बलराज साहनी स्मृति 8 वें राष्ट्रीय नाट्य समारोह का समापन रायगढ़ ‘इप्टा’ के नाटक ‘बकासुर’ के मंचन के साथ हुआ। लोक व आधुनिक शैली के मिश्रण के साथ तकनीक के विवेकपूर्ण इस्तेमाल ने इस उद्देश्यपूर्ण नाटक को अत्यंत रोचक भी बना दिया। मूलतः मराठी में यह नाटक ‘निर्भय बनो आंदोलन’ के लिये रत्नाकर मटकरी द्वारा लिखा गया था। महाभारत की एक कथा भीम-बकासुर युद्ध के एक प्रसंग को लेकर इसे वर्तमान परिस्थितियों में देखने की कोशिश की गयी व इसमें पंडवानी का प्रयोग करते हुए लोक शैली के तत्वों का रोचक इस्तेमाल किया गया। नाटक का छत्तीसगढ़ी में अनुवाद उषा आठले ने किया है तथा निर्देशन व प्रकाश अजय आठले का था। इससे पूर्व भिलाई इप्टा द्वारा स्वर्गीय शरीफ अहमद के नाटक ‘‘मंथन’’ का मंचन किया, जिसमें केवल दो ही पात्र थे जो पाप व पुण्य को अपने-अपने ढंग से परिभाषित करते हैं। अस्तित्ववाद से लेकर सदियों से समाज में उपस्थित जटिल समस्याओं व विसंगतियों पर ये पात्र आपसी संवाद के जरिये गहन ‘मंथन’ करते हैं और दर्शक के जेहन में कुछ गंभीर सवाल छोड़ जाते हैं। ‘मंथन’ साथी शरीफ अहमद की रंगयात्रा का भी मंथन है। शरीफ ने नाटक लेखन की शुरूआत ‘परिंदे’ नाटक से की और यह यात्रा आगे चलकर ‘समर’, ‘परत दर परत‘ व ‘पंचलैट’ से होती हुई और ‘मंथन’ पर आकर असमय थम गयी। शरीफ भाई अपने इस नाटक में संवादों की सरलता के साथ पूरे दृश्य की जीवंत उपस्थिति दर्ज कराते हैं। पात्रों के आपसी संवाद के बीच सदियों से समाज में उपस्थित जटिल समस्याओं को रेखांकित करते हुए दर्शकों के मानस पटल पर अंकित करते हैं..क्या? क्यों? और कब तक? दो पात्रों के इस नाटक में केवट के रूप में संजीव मुखर्जी व पंडित की भूमिका में राजेश श्रीवास्तव ने बेहतरीन अदाकारी की। निर्देशन त्रिलोक तिवारी का था व सह-निर्देशक थे अशफाक खान व  रणदीप अधिकारी। ‘‘मुझे लगता है कि भाग्य और भगवान किसी बहुत ही चालाक व्यक्ति के मन की उपज है। उसने दुनिया को अपने ढंग से चलाने के लिये ही इन शब्दों को जन्म दिया है। लेकिन तभी मन के किसी कोने से आवाज आती है कि कोई तो है जो सबको देख रहा है, सबके कर्मो का हिसाब -किताब कर रहा है। उससे कुछ भी छिपा नहीं है।’’ समारोह के दूसरे दिन हरिशंकर परसाई की रचनाओं पर आधारित अरूण पाण्डेय के कोलाज ‘निठल्ले की डायरी’ को दर्शकों ने बेहद पसंद किया। नाटक देखते हुए परसाई जी का रचना संसार ‘फ्लैशबैक’ की तरह परत दर परत खुलता चला जाता है और लगता है कि नाटक के केंद्रीय पात्र अपने ही मोहल्ले के ‘कक्काजी’ हैं जो हर जरूरी-गैर जरूरी बात पर अपनी राय देना आवश्यक समझते हैं। नाटक की प्रस्तुति बेहद चुस्त व कसी हुई थी तथा यह समारोह के सबसे उम्दा नाटकों में से एक था। नाटक की परिकल्पना व निर्देशन अरूण पाण्डेय का है। इस नाटक के पश्चात मेजबान इकाई ‘इप्टा’ डोंगरगढ़ ने भारतेंदु के कालजयी नाटक ‘‘अंधेर नगरी, चौपट राजा’’ पर आधारित एक प्रस्तुति छत्तीसगढ़ी में दी। संगीतप्रधान नाटक होने के कारण यह प्रस्तुति वैसे ही काफी सरस थी और छतीसगढ़ी बोली में देशज तत्वों के सम्मिलन के साथ इसका आनंद दूना हो गया, पर कलाकारों की देहभाषा आयोजन की व्यस्तता व थकान की चुगली कर रही थी। नाटक का निर्देशन किया था राधेश्याम तराने ने व संगीत निर्देशन मनोज गुप्ता का था। समारोह के प्रथम दिन दो नाटकों का मंचन किया गया। भिलाई इप्टा का नाटक फांसी के बाद जहां हास्य व व्यंग्य के बेजोड़ शिल्प में एक कारखाने के बेकार हो गये कामगार की दस्तान बयान करता है। नाटक सिर्फ एक घटना को लेकर आगे बढता है। ईश्वर प्रसाद ने अपनी बीबी का खून किया है। अदालत उसे दोषी मानती है, लेकिन नाटककार और निर्देशक उसे खूनी नहीं मानते और यह सवाल अंततः दर्शक के पाले में डाल दिया जाता है, जिसकी पूरी सहानुभूति हालात के मद्देनजर ईश्वर प्रसाद के साथ होती है। नाटक हँसते-हँसाते हुए भी कुछ बेहद गंभीर सवाल छोड़ जाता है। निर्देशन पंकज सुधीर मिश्र का था और संगीत दिया था भारत भूषण परगनिहा व सुनील मिश्रा ने। भूमिकायें मणिमय मुखर्जी , राजेश  श्रीवास्तव, अशफाक खान , रणदीप अधिकारी संदीप कृष्ण गोखले,  मनोज जोशी, अत्ताउर रहमान, श्याम  वानखेड़े, जगनाथ साहू व शेलेश  कोडापे की थीं। नाटक ‘‘घर वापसी का गीत’’ गांवों के उन असंख्य लोगों की कहानी है जो आजादी के इतने सालों बाद भी विस्थापन के लिये व शहरों की ओर पलायन के लिये अभिशप्त हैं। नाट्य परिकल्पना व निर्देशन प्रोबीर गुहा का था।सहायक निर्देशक  तपन दास का था। संगीत व प्रकाश था शुभादीप गुहा का व भूमिकायें थीं तपन, पन्ना, अफ्तर, अवि, शिल्पी, प्रतीक, तनिमा, मोहन, अरूण, साग्निक, अरूप व अन्य की। "दो देशों के विभाजन के साथ केवल स्वतंत्रता नहीं आती है,बल्कि वह हाशिये पर पड़े करोड़ों लोगों के लिये बेघर हो जाने का पैगाम भी लेकर आती है। इसके पीछे बहुत से कारण हो सकते हैं - सांप्रदायिक दंगे, भय, असुरक्षित भविष्य, बेरोजगारी व अंततः भूमंडलीकरण के साथ औद्योगीकरण। बेशुमार लोग शहरों की ओर भागने लगते हैं। वे मनुष्यों की तरह दिखते तो हैं पर कभी भी सामान्य मनुष्य की तरह जी नहीं पाते।  अपनी जड़ों से उखड़े व बिखरे इन लोगों का भटकाव कभी खत्म नहीं होता। वे एक नये पते के लिये, एक नयी नियति के लिये आजादी के 63 साल बाद भी भटकने के लिये अभिशप्त हैं।" इससे पूर्व नाट्य समारोह का उद्घाटन करते हुए इंदिरा कला व संगीत विश्वविद्याल की कुलपति प्रोफेसर डॉक्टर माण्डवी सिह ने कहा कि यह हर्ष व गौरव की बात है कि डोंगरगढ़ इप्टा इतने कम संसाधनों के साथ लगातार इतने अच्छे कार्यक्रमों का आयोजन कर रही है। उन्होंने आश्वस्त किया कि वे भविष्य में भी डोंगरगढ़ इप्टा के आयोजनों में शामिल होंगी। निर्देशन के लिये राष्ट्रपति द्वारा संगीत नाटक अकादमी सम्मान से विभूषित अंतरराष्ट्रीय ख्याति के निर्देशक श्री प्रोबीर गुहा ने कहा कि ‘विकल्प’ व ‘इप्टा’ का बेहतीन आयोजन कलाकारों व आयोजकों की प्रतिब़द्वता का परिणाम है। नाटकों का उद्देश्य केवल दर्शकों का मनोरंजन करना नहीं है बल्कि सामाजिक विसंगतियों को दूर करने के लिये एक औजार की तरह काम करता है। उन्होंने कहा कि नाटकों के इस सामाजिक पहलू को ध्यान में रखते हुए इस आंदोलन को और भी ज्यादा विकेंद्रित करते हुए गांव-गांव तक फैलाया जाना चाहिये। कहीं ऐसा न हो कि यह आंदोलन केवल शहरी क्षेत्रों में सिमट कर रह जाये। अतिथिद्वय ने छत्तीसगढ के मशहूर नाटककार प्रेम साइमन के लोकप्रिय नाटकों की एक किताब का विमोचन भी किया। किताब का संपादन दिनेश चौधरी ने किया है। इस अवसर पर  शालेय छात्रों के लिये एक चित्रकला स्पर्धा भी आयोजित की गयी थी व छात्रों द्वारा बनायी गयी कृतियों को समारोह-स्थल पर प्रदर्शित किया गया है। (इप्टानामा से साभार)

Friday, December 30, 2011

लोकतांत्रिक शक्तियां एकजुट हों - इप्टा


भिलाई घोषणा पत्र, नई कार्यकारिणी का गठन और विविध सांस्कृतिक प्रस्तुतियों के साथ इप्टा का 13वां राष्ट्रीय सम्मेलन संपन्न

तीन दिवसीय आयोजन के आखिरी दिन बुधवार की सुबह विभिन्न इकाइयों ने ट्विन सिटी के अलग-अलग हिस्सों में नुक्कड़ नाटक किया और जन गीत पेश किए। जम्मू कश्मीर इप्टा ने नेहरू नगर पार्क भिलाई और सफदर हाशमी चौक दुर्ग में ‘जागो बंधु जागो रे भइया’, पंजाब इप्टा ने नेहरू हाउस और आजाद चौक रामनगर में ‘खड्डा’, बोरिया गेट के पास आगरा इप्टा ने अपना नाटक ‘हक के लिए’, बिहार इप्टा ने नेहरू हाउस के शरीफ अहमद मुक्ताकाशी मंच में ‘ए स्टूपिड किंग इन द सिटी’, झारखंड इप्टा ने सेक्टर-7 मार्केट में सफदर हाशमी लिखित ‘राजा का बाजा’ खेला। आजमगढ़ इप्टा ने आकाशगंगा सुपेला और चौहान काम्पलेक्स में लोकनृत्य प्रस्तुत किया। महाराष्ट्र इप्टा ने जूते को आधार बना व्यंग्यपूर्ण नाटक खेला। नेहरू हाउस में असम के कलाकार शिरोमोनी डोले ने अपने मुंह में चम्मच लेकर रेत से एक कागज पर चित्र बनाया। शाम 7 बजे से कला मंदिर सिविक सेंटर में छत्तीसगढ़ इप्टा द्वारा लोकगीत असम इप्टा द्वारा झूमर नृत्य, बिहू एवं सत्रीय नृत्य प्रस्तुत किया गया। आजमगढ़ इप्टा द्वारा लोकनृत्य, पंजाब इप्टा द्वारा मालवयी गिद्दा, जम्मू-कश्मीर इप्टा द्वारा डोगरी नृत्य एवं कश्मीरी नृत्य और राजस्थान इप्टा द्वारा कालबेलिया नृत्य प्रस्तुत किया गया। नेहरू हाउस में बिहार इप्टा ने ‘वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति’ नाटक प्रस्तुत की प्रस्तुति दी। क्लैरिनेट पर माधव ने ‘ए मेरे वतन के लोगों’ और रंभा ने ‘नफस-नफस कदम-कदम’ पेश किया। पश्चिम बंगाल के कलाकारों ने बाउल गीती और असम के कलाकारों ने जन गीत प्रस्तुत किए।

हंगल को फिर से इप्टा की कमान

94 साल के अभिनेता अवतार कृष्ण हंगल को भारतीय जन नाट्य संघ (इप्टा) ने दूसरी बार तीन साल के लिए अध्यक्ष चुन लिया है। भिलाई में बुधवार की शाम हुई राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में देश भर के प्रतिनिधियों के बीच से नए पदाधिकारी चुन लिए गए। छत्तीसगढ़ से दो प्रतिनिधियों को ओहदा दिया गया है। आज ही भिलाई घोषणा पत्र जारी कर दिया गया। नेहरू सांस्कृतिक सदन सेक्टर-1 में 13 वें राष्ट्रीय सम्मेलन व सांस्कृतिक महोत्सव के अंतिम दिन नई राष्ट्रीय कार्यकारिणी का चुनाव हुआ। जिसमें अध्यक्ष श्री हंगल के अलावा, कार्यकारी अध्यक्ष रणवीर सिंह, महासचिव जितेंद्र रघुवंशी, उपाध्यक्ष-एमएस सथ्यू, शमिक बंदोपाध्याय, पी. गोपाल कृष्णन, जावेद सिद्दीकी, डॉ. एम. नरसिंह, अंजन श्रीवास्तव, के. प्रताप रेड्डी, सीताराम सिंह, सचिव राकेश, हिमांशु राय, तनवीर अख्तर, अमिताभ चक्रबर्ती, पी. संबा शिव राव, सह-सचिव डॉ. ऊषा आठवले, राजेश श्रीवास्तव (दोनों छत्तीसगढ़ से), फिरोज अशरफ खान, मनीष श्रीवास्तव, प्रमोद भुइयां व कोषाध्यक्ष ओम ठाकुर चुने गए। महासचिव जितेंद्र रघुवंशी की रिपोर्ट पर चर्चा के बाद उपाध्यक्ष शमिक बंदोपाध्याय ने भिलाई घोषणा पत्र जारी किया गया, जिसमें धर्मनिरपेक्षता और लोकतांत्रिक मूल्य के लिए काम कर रही शक्तियों को एकजुट करने का आह्वान किया गया।

‘मदर’ को जी रहे हैं 33 साल से
मैक्सिम गोर्की लिखित क्लासिक उपन्यास ‘मदर’ को मंच व नुक्कड़ व मंचीय नाटकों में पिछले 33 साल से जीवंत कर रहे हैं गौतम मुखर्जी ने। इतने लंबे अरसे से एक महिला पात्र को निभा रहे गौतम का कहना है कि इसे स्त्री या पुरुष पात्र के नजरिए से नहीं देखा जाना चाहिए बल्कि ‘मदर’ यानि मां तो इस सृष्टि का आधार है। श्री मुखर्जी का दावा है कि वह पूरी दुनिया में एकमात्र कलाकार हैं जिन्होंने अभिनय के हर माध्यम में ‘मदर’ को जिया है। पिछले साल ‘मदर’ पर बांग्ला फिल्म भी बन चुकी है,जिसमें भी मुख्य भूमिका उन्हीं की है। मूलतरू उत्तर 24 परगना जिले के रहने वाले और इप्टा के एक अंग के तौर पर ‘शौभिक सांस्कृतिक चक्र’ संगठन चला रहे गौतम मुखर्जी ने बताया कि दो साल बाद उन्हें इप्टा से जुड़े पूरे 50 साल हो जाएंगे।

चौलेंजिंग तो है मणिपुर में थियेटर करना - पी. खगेंद्र सिंह
नार्थ इस्ट के संवेदनशील राज्य मणिपुर के हालात इस कदर बिगड़े हुए हैं कि सामाजिक-आर्थिक नाकेबंदी की वजह से आम लोगों का आना-जाना बंद है। मणिपुर इप्टा की ओर से एकमात्र प्रतिनिधि प्रांतीय महासचिव पी. खगेंद्र सिंह हवाई सफर की वजह से रायपुर होते हुए भिलाई पहुंच पाए हैं। खगेंद्र का कहना है कि नाकेबंदी तो आज की बात है, मणिपुर इसके पहले से ही विपरीत आंतरिक हालात झेल रहा है। ऐसे में वहां थियेटर हो चाहे कोई भी दूसरी सामान्य गतिविधियां, सब कुछ वहां चौलेंजिंग है। मणिपुर चूंकि सांस्कृतिक तौर पर एक समृद्ध राज्य है इसलिए वहां थियेटर को लेकर बेहद जागरूकता है। खगेंद्र के मुताबिक फिलहाल वहां विधानसभा चुनाव घोषित होने की वजह से ज्यादातर लोग चुनाव में व्यस्त हैं। इसलिए फिलहाल स्थिति थोड़ी सामान्य है। हालांकि अभी भी वहां पेट्रोल 200 रुपए लीटर मिल रहा है।

भूपेन-मामोनी के जाने से सूना हो गया हमारा असम - मीनाक्षी डेका
असम इप्टा से आई मीनाक्षी डेका जीवटता की अद्भुत मिसाल है। शादी को साल नहीं बीता था कि हादसे में पति चल बसे। फिर कोख में पल रहे बच्चे को परवान चढ़ाने और अपना जीवन संघर्ष जारी रखने में मीनाक्षी ने कोई कसर नहीं छोड़ी। आज वह असम दूरदर्शन-आकाशवाणी की स्थापित कलाकार है। संगीत उनकी रग-रग में इस कदर बसा है कि वो बातें भी संगीत की बंदिशों की तरह करती है। भिलाई आते वक्त ट्रेन में कुछ असामाजिक तत्वों से झड़प हुई तो मीनाक्षी ने उन्हें बाउल गीत सुना दिया। बस फिर क्या था झड़प खत्म। बुधवार को मीनाक्षी यह सब बताते हुए गा भी रही थी और मुस्कुरा भी रही थी। भूपेन हजारिका और मामोनी राइसोम (इंदिरा) गोस्वामी के बेहद करीब रही मीनाक्षी के पास इन लोगों से जुड़े ढेर सारे संस्मरण और गीत हैं। ये सब बताते हुए वह कुछ उदास होकर कहती हैं इस साल ने हम लोगों को सूना कर दिया। दोनों के जाने का सदमा मैं भूलना चाहती हूं इसलिए यहां भिलाई तुरंत चली आई।

(दैनिक भास्कर, भिलाई से साभार)

Tuesday, December 27, 2011

राजनीति और मीडिया ने अपनी प्रतिष्ठा खोई है - इप्टा



भारतीय जन नाट्य संघ (इप्टा) के 13 वें राष्ट्रीय सम्मेलन और सांस्कृतिक महोत्सव का दूसरा दिन नुक्कड़ नाटकों और बहसों के नाम रहा। शाम को विविध भाषी रंगमंच की छटा शहर के अलग-अलग रंगमंचों पर बिखरी।

सुबह नेहरू हाउस के शरीफ अहमद मुक्तांगन में इप्टा जेएनयू नई दिल्ली के साथियों ने नुक्कड़ नाटक ‘खतरा’ खेला। यह नाटक बयान करता है कि किस प्रकार शासन और प्रशासन अपनी नीतियों और हरकतों से संविधान में दिए अधिकारों की अवहेलना कर रहा है। इसके पहले सुबह के सत्र की शुरुआत झारखंड इप्टा के जन गीत से हुई। प्रतिनिधि सत्र का संचालन राकेश ने किया। मंच पर महासचिव जितेंद्र रघुवंशी , रणवीर सिंह, प्रसन्ना, शमीम फैजी और हिमांशु राय ने। इस सत्र में इप्टा की विभिन्न इकाइयों के प्रतिनिधियों- प्रमुख वक्ताओं में के.प्रताप रेड्डी(आंध्र प्रदेश), विकास (दिल्ली), एम. अधि रमन (पुडुचेरी), शैलेंद्र (झारखंड) और अमिताभ चक्रवर्ती (पश्चिम बंगाल) आदि ने अपनी बातें रखीं। दोपहर के सत्र में तीन राष्ट्रीय संगोष्ठी अलग-अलग विषयों पर हुई। रंगमंच विषय पर प्रसन्ना, रणवीर सिंह, राकेश, डॉ. जावेद अख्तर और प्रभाकर चौबे ने अपनी बात रखते हुए कहा कि नाटक अभिनय प्रधान है और फिल्में दृश्य प्रधान। नुक्कड़ नाटक अगर नहीं हो रहे हैं तो सिर्फ इसलिए क्योंकि हम कर नहीं रहे हैं। अगर हम दर्शकों के बीच नुक्कड़ नाटक लेकर जाएंगे तो लोग जरूर देखेंगे। फिल्म एवं मीडिया पर हुई संगोष्ठी में जितेंद्र रघुवंशी, के. प्रताप रेड्डी, सुधीर, अजय आठले, विनीत तिवारी व समीक बंदोपाध्याय ने कहा कि आज के समय में राजनीति और मीडिया ने अपनी प्रतिष्ठा खोई है। ऐसे समय में जरूरत समानांतर मीडिया खड़ा करने की है, जो लोगों के संघर्ष के साथ खड़े हो सके। नृत्य एवं संगीत विषय पर हुई संगोष्ठी में सीताराम सिंह (बिहार), उपासना तिवारी, मणिमय मुखर्जी, आशुतोष मिश्रा, मधुर दामले, अतीक राम दास और बेदा राकेश ने इस बात पर जोर दिया कि संगीत एवं नृत्य की विधा को मात्र शास्त्रीय विधानों से निकालकर समस्यामूलक बातों को नृत्य एवं संगीत के माध्यम से आम जन की समझ के लायक बनाकर प्रस्तुत करे। गोष्ठी के दौरान तमिलनाडु से आई वनिला ने बताया कि उनके राज्य में इप्टा के अंतर्गत महिलाओं की तादाद पुरुषों से कहीं ज्यादा है। तमिलनाडु की कुल 12 इकाइयों में 6 हजार सदस्य हैं, जिनमें महिलाओं की संख्या 5 हजार के करीब है। गोष्ठी में उन्होंने रंगमंच की समस्याओं के कारण कलाकारों को हो रही दिक्कतों का खुलासा करते हुए सुझाव दिया कि इप्टा के अंदर संचार को और भी बेहतर बनाने की जरूरत है। शाम को विभिन्न भाषाओं के सांस्कृतिक कार्यक्रम हुए।



भाषाई रंगमंच की छटा बिखेरी, वाहवाही मिली छाया नाटक को

मंगलवार की शहर इस्पात नगरी के विभिन्न हिस्सों में भाषाई रंगमंच की छटा बिखरी। हबीब तनवीर कला मंच (नेहरू हाउस) में मध्यप्रदेश इप्टा का छाया नाटक (शैडो प्ले) दर्शकों ने काफी पसंद किया। इसमें परदे पर उभरती आकृतियों के माध्यम से अन्याय के खिलाफ स्त्री की एकजुटता को दर्शाया गया। राजस्थान इप्टा ने जन गीत पेश किए। इसके बाद ‘तमाशा’ में गोपीचंद का गायन और उरई इप्टा ने बुंदेली लोक गीत प्रस्तुत किया। मध्यप्रदेश इप्टा ने जन गीत पेश किए।

महाराष्ट्र धूलिया से आए इप्टा के कलाकारों ने चक्की पीसती महिलाओं के लोकगीतों की प्रस्तुति दी। जगन्नाथ मंदिर सेक्टर-4 में ओडीशा इप्टा का कार्यक्रम नहीं हो पाया। कालीबाड़ी सेक्टर-6 में पश्चिम बंगाल इप्टा के कलाकारों ने रंग जमाया। रविंद्र संगीत के बाद भूपेन हजारिका को श्रद्धांजलि देते हुए समूह गीत प्रस्तुत किए गए। गोकुल दास बाऊल का बाउल नृत्य, अमित पाल का मूक अभिनय, निर्देशक गौतम मुखर्जी का नाटक ‘कैनो ना मानुष’ यानि क्यों कि हम मनुष्य हैं की प्रस्तुति हुई।

नवेंदु राय और अतिक्रम दास के निर्देशन में गीत प्रस्तुत किए गए। गुरुनानक हायर सेकंडरी स्कूल सेक्टर-6 में ‘एक शाम पंजाब के नाम’ में पंजाब व हिमाचल इप्टा से आए कलाकारों की टीम ने रंग जमाया। इसमें शहीद भगत सिंह पर आधारित ओपेरा व नाटक ‘जिप्सी’, पटियाला से 30 महिलाओं का मालवा गिद्दा , साथ ही भांगड़ा व पंजाबी लोक संगीत भी हुआ। मुख्य अतिथि बीएसपी के ईडी फाइनेंस एसके गुलाटी थे व अध्यक्षता गुरुनानक स्कूल के चेयरमैन तारा सिंह ने की।

आयोजन में पंजाबी पंचशील समाज, गुरु गोविंद सिंह स्टडी सर्किल, नौजवान सिख्र सभा, हिमाचल कल्चरल एसोसिएशन, सिख्र यूथ फोरम और समस्त पंजाबी कलाकार संघ दुर्ग-भिलाई का सहयोग रहा। इसी तरह भिलाई क्लब में झारखंड इप्टा ने छाउ नृत्य व अन्य सांस्कृतिक प्रस्तुति दी। मंगलवार की देर रात कैंप व खुर्सीपार में तेलुगु नाटक का मंचन किया गया।

(दैनिक भारूकर से साभार)

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